vishnu · stories
प्रह्लाद और होलिका — होली की अग्नि कथा
हिरण्यकशिपु का अहंकार, होलिका का आवरण, और वह बालक जो नारायण कहना नहीं छोड़ा — होलिका दहन के पीछे की कथा।

रंग से पहले अग्नि आती है। यह कथा उस आग का अर्थ है: बालक जलाने को नहीं, इस झूठ को जलाने को कि अत्याचारी ईश्वर है।
हिरण्यकशिपु ने ऐसा वर जीता जो मृत्यु के द्वार बंद करता लगा — न नर न पशु, न दिन न रात, न भीतर न बाहर। उसने विष्णु नाम वर्जित किया। पुत्र प्रह्लाद नहीं माना। स्तंभ, शिखर, सर्प हारे; बालक का जप नहीं हारा।
बुआ का आवरण
होलिका, जिसे अग्नि न खाए ऐसा आवरण मिला, बालक के संग चिता बैठी। आवरण उसे छोड़ गया; प्रह्लाद नारायण कहते निकला। आगे प्रभु नरसिंह हुए — न नर न पशु, संध्या, देहरी — वर का पहेली-द्वार खुला। होली की आग पहला अध्याय स्मरण करती है: जो गर्व बालक को ईंधन बनाए, वही ईंधन है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
- क्या यह ब्रज की कृष्ण होली है?
- ब्रज की रंग-क्रीड़ा दूसरा आनंद है। उससे पहले होलिका दहन यह पुरानी अग्नि-कथा रखता है। घर दोनों रख सकते हैं।
आज का पंचांग
इस पाठ के लिए तिथि, मुहूर्त और आज के पर्व।
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