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जितिया पूजा विधि — जीवित्पुत्रिका व्रत (नहाय-खाय से पारण)
आश्विन कृष्ण अष्टमी का तीन दिवसीय जितिया (जीवित्पुत्रिका) गाइड: नहाय-खाय, निर्जला खुर जितिया, जीमूतवाहन संध्या पूजा और सूर्योदय पारण।
अंतिम अद्यतन: 2026-09-21
समय: तीन दिवसीय व्रत

जितिया — जीवित्पुत्रिका व्रत — माताएँ संतान की दीर्घायु और कल्याण हेतु रखती हैं। 2026 में मुख्य निर्जला दिन शनिवार, 3 अक्टूबर (आश्विन कृष्ण अष्टमी) है; नहाय-खाय 2 अक्टूबर, पारण 4 अक्टूबर स्थानीय सूर्योदय और अष्टमी समाप्ति के बाद। अपना नगर पंचांग देखें; मैथिल और भोजपुरी घरों में पारण का घड़ी समय थोड़ा भिन्न हो सकता है।
सामग्री
- भगवान जीमूतवाहन हेतु स्वच्छ कुश; चील और सियारिन की आकृति हेतु मिट्टी या ताजा गोबर
- झिङ्गी (तोरी/नेनुआ) के पत्ते, बाँस के पत्ते और ताज़ी दूर्वा की माला
- लाल या पीला जितिया धागा (रक्षा सूत्र), रोली, अक्षत, सिंदूर, चंदन
- घी का दीप, धूप, कपूर, फूल, पान और सुपारी
- कुल रीति अनुसार भोग: गुलगुला, पुआ, धुस्का, भीगे काले चने, मौसमी मिष्ठान्न
- बिहार–मिथिला में प्रचलित नहाय-खाय / पारण भोजन: नोनी साग, मड़ुआ रोटी, तोरई/नेनुआ — कुछ मैथिल घर नहाय-खाय में माछ-मरुआ भी लेते हैं
2026 तिथि एक दृष्टि में
दैनिक पंचांग और बिहार के प्रमुख कैलेंडर 2026 के अनुसार: नहाय-खाय शुक्रवार 2 अक्टूबर; जितिया निर्जला व्रत और प्रदोषकाल जीमूतवाहन पूजा शनिवार 3 अक्टूबर (आश्विन कृष्ण अष्टमी बहुत से नगरों में 3 अक्टूबर प्रातः आरंभ, 4 अक्टूबर सूर्योदय के निकट समाप्त); पारण रविवार 4 अक्टूबर सूर्योदय के बाद अष्टमी समाप्ति पर। मिथिला में कुछ ज्योतिष नवमी आरंभ की प्रतीक्षा भी बताते हैं — एक देशव्यापी घड़ी नहीं, अपना कुल पंचांग मानें।
तीन दिन के नियम
- 1
दिन 1 — नहाय-खाय (शुद्धि भोजन)
प्रातः उठें, स्वच्छ नदी-तालाब या घर में स्नान करें, और एक सात्विक भोजन लें। बिहार के कई घरों में नोनी साग, मड़ुआ रोटी और तोरई रहती है। मिथिला में नहाय-खाय पर माछ-मरुआ जीवंत परंपरा है — कुल आचार रखें। रसोई और पूजा स्थान साफ करें; क्रोध और बासी अन्न दूर रखें।
- 2
ओठगन (निर्जला आरंभ से पहले)
मिथिला और आसपास कई माताएँ पक्षियों के जागने से पहले ओठगन (उठगन) करती हैं — कुल रीति अनुसार दही-चूड़ा, मिठाई या नहाय-खाय का अवशेष — फिर कठोर व्रत आरंभ। जिस कुल में यह चरण नहीं, उसे न जोड़ें।
- 3
दिन 2 — खुर जितिया (निर्जला व्रत और संध्या पूजा)
प्रातः स्नान-संकल्प के बाद स्वास्थ्य हो तो दिन-रात निर्जला रहें (अन्न-जल नहीं)। मुख्य जीमूतवाहन पूजा सूर्यास्त के बाद प्रदोषकाल में होती है। वृद्धा या चिकित्सक-निषेध वाली माता हल्का व्रत रख सकती हैं — जितिया का हृदय मातृ श्रद्धा है, शरीर को दंड नहीं।
- 4
संध्या जीमूतवाहन पूजा
वेदी स्वच्छ करें। कुश से जीमूतवाहन बनाएँ; पास में चील और सियारिन की मिट्टी/गोबर आकृति रखें। घी दीप और धूप जलाएँ। जीमूतवाहन को रोली–चंदन तिलक; चील-सियारिन को सिंदूर। झिङ्गी पत्तों पर भोग रखें। फूल-अक्षत लेकर व्रत कथा सुनें, फिर प्रसादित जितिया धागा संतान के गले या कलाई बाँधें।
- 5
दिन 3 — पारण (व्रत समापन)
अष्टमी समाप्त होने के दिन सूर्योदय के बाद सूर्य को अर्घ्य दें, फिर कोमलता से पारण करें। कई घर पहले संतान को प्रसाद देते हैं, फिर माता भोजन लेती हैं। जहाँ परंपरा हो, फिर नोनी साग, मड़ुआ रोटी और तोरई प्रथम भोजन रहती है।
पूजा के संग प्रचलित मंत्र
समाचार और विधि गाइड जितिया के संग यह शिव ध्यान (कर्पूरगौरं) जोड़ते हैं। आरती से पहले ॐ जीमूतवाहनाय नमः भी जपते हैं।
ॐ जीमूतवाहनाय नमः।
कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्। सदा बसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥
कथा के बाद
जितिया आरती गाएँ (ॐ जय कश्यप नन्दन — इसी सूर्य आरती को व्रत हेतु व्यापक रूप से छापा जाता है), फिर प्रसाद बाँटें। जीमूतवाहन और चील–सियारिन की पूर्ण कथा कथा पृष्ठ पर पढ़ें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
- 2026 में जितिया कब है?
मुख्य व्रत: शनिवार 3 अक्टूबर 2026 (आश्विन कृष्ण अष्टमी)। नहाय-खाय: 2 अक्टूबर। पारण: 4 अक्टूबर सूर्योदय और स्थानीय अष्टमी समाप्ति के बाद — अपना नगर पंचांग देखें।
- क्या व्रत सदैव 36 घंटे निर्जला होता है?
पारंपरिक खुर जितिया लगभग दिन-रात का कठोर निर्जला है। स्वास्थ्य पहले: गर्भवती, रुग्ण और चिकित्सक-निषेध वाले उसी प्रार्थना भाव से हल्का व्रत रखें।
- जितिया पर किसकी पूजा होती है?
लोक में भगवान जीमूतवाहन (कुश रूप) के संग चील-सियारिन पूजे जाते हैं। शास्त्रीय उल्लेख में वासुदेव पूजा भी है; संध्या आरती प्रायः सूर्य स्तुति ॐ जय कश्यप नन्दन, और पारण सूर्य अर्घ्य से आरंभ होता है।
- क्या नहाय-खाय में मछली अनिवार्य है?
नहीं। माछ-मरुआ मिथिला की परंपरा है। बिहार–उत्तर प्रदेश के कई घर नोनी साग और मड़ुआ रोटी वाला शाकाहारी सात्विक नहाय-खाय रखते हैं। अपनी कुल रीति मानें।
- जितिया धागा कब बाँधते हैं?
व्रत दिन संध्या पूजा और कथा के बाद प्रसादित लाल या पीला धागा कुल रीति अनुसार संतान के गले या कलाई बाँधते हैं।
आज का पंचांग
इस पाठ के लिए तिथि, मुहूर्त और आज के पर्व।
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