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जितिया व्रत कथा — जीमूतवाहन, चील और सियारिन
जीवित्पुत्रिका की दो आवश्यक कथाएँ: नागों हेतु राजा जीमूतवाहन का बलिदान, और सत्य व्रत की चील–सियारिन कथा।
अंतिम अद्यतन: 2026-09-21

आश्विन कृष्ण अष्टमी की संध्या माताएँ आरती से पहले ये कथाएँ सुनती हैं। शिक्षा है: संतान की रक्षा करुणा और बिना छल के व्रत निभाने पर टिकी है।
कथा 1 — जीमूतवाहन और शंखचूड़
जीमूतवाहन करुणामय गंधर्व राजकुमार थे। राजसिंहासन की आस छोड़ भाइयों को राज्य सौंप, वृद्ध माता-पिता की सेवा हेतु वन गए। वहीं राजकुमारी मलयवती से विवाह हुआ।
एक दिन मार्ग पर रोती नाग माता मिलीं। उन्होंने कहा — नाग जाति ने पक्षीराज गरुड़ को प्रतिदिन एक सर्प आहार देने की प्रतिज्ञा की है। आज बारी उनके एकमात्र जीवित पुत्र शंखचूड़ की है।
दुख देख जीमूतवाहन ने लाल वस्त्र ओढ़ शंखचूड़ के स्थान पर वध्य-शिला पर लेट गए। गरुड़ उन्हें उठा ले गए — फिर रुक गए, यह देख विस्मित कि शिकार शांत और मुसकुरा रहा है। सत्य जान गरुड़ श्रद्धा से भर गए। उन्होंने जीमूतवाहन को जीवन दान दिया और वचन दिया कि अब नाग बलि नहीं लेंगे। तभी से जीमूतवाहन संतान रक्षक माने जाते हैं, और माताएँ उनके सम्मान में जितिया रखती हैं।
कथा 2 — चील और सियारिन
नर्मदा तट पर एक झरबेरी वृक्ष था। ऊपर चील रहती थी; जड़ों की कोटर में सियारिन। मनुष्यों की कठोर जितिया देख दोनों सखियों ने अपनी भावी संतति हेतु साथ व्रत रखने का संकल्प लिया।
उसी रात पास एक व्यापारी पुत्र का दाह संस्कार हुआ। चिता की गंध से भूखी सियारिन विवश हुई; छिपकर खाई और व्रत तोड़ दिया। चील भूख-प्यास सह उषा तक व्रत पूरा किया।
अगले जन्म में दोनों धनी घर में बहनें बनीं। निष्ठायुक्त चील ज्येष्ठा शीलवती हुईं — सात दीर्घायु पुत्रों का वर। सियारिन कपूरवंती बनीं, जिनकी संतान जीवित नहीं रही। घर इसीलिए कथा सुनाते हैं कि निर्जला दिन केवल बाह्य रूप नहीं — अनुशासन और शुद्ध हृदय से निभे।
कथा कैसे सुनें
जलते दीप के संग जीमूतवाहन रूप के समक्ष बैठें। फूल और अक्षत हाथ में रखें। दोनों कथाएँ सुनें या पढ़ें, फिर जितिया आरती गाकर धागा बाँधें। पूर्ण संध्या चरण पूजा विधि पृष्ठ पर हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
- क्या दोनों कथाएँ सुननी आवश्यक हैं?
बिहार–झारखंड–पूर्वी उत्तर प्रदेश के अधिकांश घर जीमूतवाहन कथा सुनते हैं; कई चील–सियारिन भी रखते हैं। समय कम हो तो पहले जीमूतवाहन, फिर छोटी दूसरी कथा।
- पूजा में चील-सियारिन क्यों बनाते हैं?
ये दूसरी कथा का स्मरण हैं — निष्ठायुक्त व्रत बनाम टूटा व्रत — और जीमूतवाहन के संग सिंदूर तिलक पाते हैं।
आज का पंचांग
इस पाठ के लिए तिथि, मुहूर्त और आज के पर्व।
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