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वट सावित्री व्रत कथा — सावित्री और सत्यवान
स्कन्द पुराण की सावित्री कथा, जिन्होंने यम के पीछे चलकर सत्यवान का जीवन लौटाया — अखंड सौभाग्य हेतु वट-वृक्ष व्रत की कथा।
अंतिम अद्यतन: 2026-09-14

जब सनत्कुमार ने शिव से ऐसा व्रत पूछा जो स्त्रियों को अखंड सौभाग्य और सुखी दांपत्य दे, तब शिव ने वट के नीचे सावित्री की कथा कही।
मद्र देश में धर्मात्मा राजा अश्वपति राज्य करते थे। वेदज्ञ होकर भी वे संतान-सुख से रहित थे। राजा-रानी ने देवी सावित्री की जप-हवन से आराधना की, तब माँ ने दुर्लभ बुद्धि वाली कन्या दी। नाम सावित्री रखा गया।
सत्यवान का चुनाव
सयानी होकर सावित्री ने अंधे वनवासी राजा द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को चुना। नारद ने चेताया कि युवक एक वर्ष में प्राण त्यागेगा। सावित्री नहीं मुड़ी। विवाह किया, सास-श्वसुर की सेवा की, और शांत मन से दिन गिने।
यम के पीछे पदचाप
निर्धारित दिन व्रत रखकर वह सत्यवान के संग काष्ठ लेने गई, और उसके मूर्छित होने पर बैठी। जब यम सूक्ष्म शरीर ले चले, सावित्री पीछे चली। उसने धर्म ऐसा सत्य कहा कि मृत्यु ने वर दिए: द्युमत्सेन को दृष्टि और राज्य, वंश को सौ पुत्र — और अंत में सत्यवान का जीवन। वे वट की छाया लौटे; भय का वर्ष कर्तव्य का जीवन बना।
शिव ने सनत्कुमार से कहा कि जो स्त्रियाँ वट पर धागा, दीप और इस कथा से व्रत करती हैं, वे दीर्घायु सहचर और अटूट घर माँगती हैं। वृक्ष साक्षी है, सौदा नहीं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
- वट सावित्री कब रखते हैं?
कई क्षेत्र ज्येष्ठ अमावस्या रखते हैं, कुछ ज्येष्ठ पूर्णिमा। कुल पंचांग अपनाएँ; सकें तो वट के नीचे या उसकी ओर बैठें।
आज का पंचांग
इस पाठ के लिए तिथि, मुहूर्त और आज के पर्व।
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