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प्रदोष व्रत कथा — वह संध्या जिसने जीवन घुमाया
पारंपरिक प्रदोष कथा: दरिद्रता, मंदिर की संध्या, शिव–पार्वती की कृपा, और राजकुमार की बाद की विजय जिसे व्रत-फल कहा गया।

प्रदोष त्रयोदशी संध्या है। यह कथा इसलिए पढ़ी जाती है कि छोटी सायंकाल बैठक द्वार लगे, प्रदर्शन नहीं।
एक दरिद्र पुजारी का परिवार जब बन पड़ता प्रदोष रखता — जल, बेल, संध्या दीप। छिपता राजकुमार, सौभाग्य से गिरा, उसी संध्या बैठा और शिव–पार्वती के नाम ऐसे सीखा जैसे वे रोटी हों।
वर्षों बाद राजकुमार, पुनः स्थापित, गंधर्व सेना से विदर्भ जीतकर पुजारी की पत्नी-पुत्र को सुरक्षित लाया। अंशुमती ने रहस्य पूछा तो उसने पहले सेना नहीं कही। उस त्रयोदशी दीप की बात कही जिसने सिखाया संध्या शिकायत में न बिताना।
स्त्री-पुरुष दोनों क्यों रखते हैं
उस कथन से व्रत फैला। कोई प्रत्येक त्रयोदशी, कोई केवल सोम प्रदोष। कथा का फल राजप्रासाद नहीं; वह घर है जो भारी दिन के बाद भी दीप जलाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
- क्या गुरु प्रदोष भिन्न है?
- त्रयोदशी गुरुवार पड़े तो गुरु प्रदोष कहते हैं और विशेष प्रिय मानते हैं। कथा और संध्या बैठक वही रहती है।
आज का पंचांग
इस पाठ के लिए तिथि, मुहूर्त और आज के पर्व।
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