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surya · stories

छठ व्रत कथा — राजा प्रियव्रत और छठी मईया

निःसंतान राजा को षष्ठी देवी ने संतान कैसे दी — और कार्तिक शुक्ल षष्ठी सूर्य के चार दिवसीय अर्घ्य कैसे बनी।

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चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स

छठ सूर्य और छठी मईया का स्मरण है। यह कथा इसलिए कही जाती है कि सूप कृतज्ञता से उठे, दिखावे से नहीं।

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प्रियव्रत नामक राजा धर्म से राज्य करता था, पर उत्तराधिकारी नहीं था। लंबी प्रार्थना के बाद षष्ठी देवी — छठी मईया — प्रकट हुईं और कहा: जो कार्तिक शुक्ल षष्ठी पर स्वच्छ रसोई और सूर्य को सच्चे अर्घ्य से मेरा सम्मान करे, उसे मैं संतान देती हूँ।

राजा-रानी ने चार दिन रखे — स्नान और सात्विक अन्न, संध्या खरना, अस्त सूर्य पर जल में खड़े अर्घ्य, और पुनः उषा। पुत्र जन्म हुआ। सभा ने जाना: व्रत की शक्ति शुद्धि है — रसोई में बासी क्रोध नहीं, नदी में असावधान अर्पण नहीं।

द्रौपदी और लोकस्मृति

अन्य कथाएँ द्रौपदी का पांडव-कल्याण हेतु छठ, और गाँव की माताओं का ठेकुआ — बच्चे की श्वास सरल रहे — स्मरण करती हैं। कथा का अंत एक है: सूर्य की ओर मुख, हाथ खाली, जल में कोई तमाशा नहीं।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या चारों दिन कथा पढ़ते हैं?
कई घर संध्या अर्घ्य या उषा अर्घ्य के बाद कहते हैं। एक सच्ची कथा पर्याप्त है।

आज का पंचांग

इस पाठ के लिए तिथि, मुहूर्त और आज के पर्व।

पंचांग गणना हो रही है…

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