krishna · bhajan
दर्शन दो घनश्याम नाथ — विरह भजन
प्रार्थना-भजन जो घनश्याम से मुखदर्शन और हृदय-दीप माँगता है — संध्या कीर्तन और जन्माष्टमी पर गाया जाता है।
अंतिम अद्यतन: 2026-09-14

कक्ष मंद रखें। प्रत्येक पद के बाद अँखियाँ प्यासी रे पर लौटें; नरसी की अंतिम बिनती में जल्दबाजी न करें।
यह प्यास की बैठक है, प्रदर्शन की नहीं। छोटे कृष्ण मंत्र के बाद टेक गाएँ, फिर मंदिर में सूरत न दिखने वाला पद। आरती तब हो जब विनती एक बार ईमान से कह दी गई हो।
भजन के बोल
दर्शन दो घनश्याम नाथ मोरी, अँखियाँ प्यासी रे
मन मंदिर की जोत जगा दो, घट घट वासी रे
मंदिर मंदिर मूरत तेरी, फिर भी न दीखे सूरत तेरी
युग बीते ना आई मिलन की, पूरनमासी रे
द्वार दया का जब तू खोले, पंचम सुर में गूंगा बोले
अंधा देखे लंगड़ा चलकर, पँहुचे काशी रे
पानी पी कर प्यास बुझाऊँ, नैनन को कैसे समझाऊं
आँख मिचौली छोड़ो अब तो, मन के वासी रे
निबर्ल के बल धन निधर्न के, तुम रखवाले भक्त जनों के
तेरे भजन में सब सुख पाऊं, मिटे उदासी रे
नाम जपे पर तुझे ना जाने, उनको भी तू अपना माने
तेरी दया का अंत नहीं है, हे दुःख नाशी रे
आज फैसला तेरे द्वार पर, मेरी जीत है तेरी हार पर
हर जीत है तेरी मैं तो, चरण उपासी रे
द्वार खडा कब से मतवाला, मांगे तुम से हार तुम्हारी
नरसी की ये बिनती सुनलो, भक्त विलासी रे
लाज ना लुट जाए प्रभु तेरी, नाथ करो ना दया में देरी
तिन लोक छोड़ कर आओ, गंगा निवासी रे
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
- क्या यह जन्माष्टमी की अर्धरात्रि का गीत है?
हो सकता है। कई घर इसे किसी भी थकी संध्या पर रखते हैं। अंत में कृष्ण आरती जोड़ें।
आज का पंचांग
इस पाठ के लिए तिथि, मुहूर्त और आज के पर्व।
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