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कृष्णपिंगल संकष्टी कथा — आषाढ़ कृष्ण पक्ष गणेश
आषाढ़ कृष्ण चतुर्थी का रूप कृष्णपिंगल क्यों कहा जाता है, और कृष्ण ने युधिष्ठिर से कैसे कहा कि यह व्रत विघ्न उठाता है।
अंतिम अद्यतन: 2026-09-14

प्रत्येक मासिक संकष्टी गणेश के एक स्वरूप का स्मरण है। आषाढ़ कृष्ण पक्ष में रूप कृष्णपिंगल है — श्याम-पिंगल, उग्र कोमलता का नाम।
एक बार पार्वती ने पुत्र से आषाढ़ कृष्ण चतुर्थी का अर्थ पूछा। गणेश ने उत्तर उस शिक्षा में बाँधा जिसे आगे कृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा: उस तिथि वह कृष्णपिंगल रूप में पूजे जाते हैं। सच्चा व्रत, दीप और यह कथा वे गांठें खोलती हैं जिन्हें केवल प्रयास नहीं खोलता।
युधिष्ठिर, वन के विलंब से थके, सुनते रहे: पहले गणेश, विषम दूर्वा, चंद्रोदय पारण, उस दिन वाणी में क्रूरता नहीं। लोमश मुनि ध्यान में व्रत की पुष्टि करते स्मरण हैं। पांडव ने रखा; मार्ग कठिन रहा, शापित नहीं लगा।
कथा जादू का वचन नहीं देती। वह पुनः आरंभ कर सकने वाले मन का वचन देती है। यही कृष्णपिंगल का दान: विघ्न देखा, नाम लिया, मूर्ति के आगे रख दिया।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
- क्या कृष्णपिंगल केवल आषाढ़ में हैं?
वह नाम आषाढ़ संकष्टी से बँधा है। अन्य मासों के अन्य रूप हैं। मासिक चंद्रोदय व्रत एक ही रीढ़ है।
आज का पंचांग
इस पाठ के लिए तिथि, मुहूर्त और आज के पर्व।
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