किष्किन्धाकाण्ड · 04
श्री रामजी का मित्र लक्षण वर्णन और सुग्रीव का वैराग्य
किष्किन्धाकाण्ड का प्रकरण 4: श्री रामजी का मित्र लक्षण वर्णन और सुग्रीव का वैराग्य। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
चौपाई · 1
जे न मित्र दुख होहिं दुखारी। तिन्हहि बिलोकत पातक भारी॥ निज दुख गिरि सम रज करि जाना। मित्रक दुख रज मेरु समाना॥1॥
चौपाई · 2
जिन्ह कें असि मति सहज न आई। ते सठ कत हठि करत मिताई॥ कुपथ निवारि सुपंथ चलावा। गुन प्रगटै अवगुनन्हि दुरावा॥2॥
चौपाई · 3
देत लेत मन संक न धरई। बल अनुमान सदा हित करई॥ बिपति काल कर सतगुन नेहा। श्रुति कह संत मित्र गुन एहा॥3॥
चौपाई · 4
आगें कह मृदु बचन बनाई। पाछें अनहित मन कुटिलाई॥ जाकर चित अहि गति सम भाई। अस कुमित्र परिहरेहिं भलाई॥4॥
चौपाई · 5
सेवक सठ नृप कृपन कुनारी। कपटी मित्र सूल सम चारी॥ सखा सोच त्यागहु बल मोरें। सब बिधि घटब काज मैं तोरें॥5॥
चौपाई · 6
कह सुग्रीव सुनहु रघुबीरा। बालि महाबल अति रनधीरा॥ दुंदुभि अस्थि ताल देखराए। बिनु प्रयास रघुनाथ ढहाए॥6॥
चौपाई · 7
देखि अमित बल बाढ़ी प्रीती। बालि बधब इन्ह भइ परतीती॥ बार-बार नावइ पद सीसा। प्रभुहि जानि मन हरष कपीसा॥7॥
चौपाई · 8
उपजा ग्यान बचन तब बोला। नाथ कृपाँ मन भयउ अलोला॥ सुख संपति परिवार बड़ाई। सब परिहरि करिहउँ सेवकाई॥8॥
चौपाई · 9
ए सब राम भगति के बाधक। कहहिं संत तव पद अवराधक॥ सत्रु मित्र सुख, दुख जग माहीं। मायाकृत परमारथ नाहीं॥9॥
चौपाई · 10
बालि परम हित जासु प्रसादा। मिलेहु राम तुम्ह समन बिषादा॥ सपनें जेहि सन होइ लराई। जागें समुझत मन सकुचाई॥10॥
चौपाई · 11
अब प्रभु कृपा करहु एहि भाँति। सब तजि भजनु करौं दिन राती॥ सुनि बिराग संजुत कपि बानी। बोले बिहँसि रामु धनुपानी॥11॥
चौपाई · 12
जो कछु कहेहु सत्य सब सोई। सखा बचन मम मृषा न होई॥ नट मरकट इव सबहि नचावत। रामु खगेस बेद अस गावत॥12॥
चौपाई · 13
लै सुग्रीव संग रघुनाथा। चले चाप सायक गहि हाथा॥ तब रघुपति सुग्रीव पठावा। गर्जेसि जाइ निकट बल पावा॥13॥
चौपाई · 14
सुनत बालि क्रोधातुर धावा। गहि कर चरन नारि समुझावा॥ सुनु पति जिन्हहि मिलेउ सुग्रीवा। ते द्वौ बंधु तेज बल सींवा॥14॥
चौपाई · 15
कोसलेस सुत लछिमन रामा। कालहु जीति सकहिं संग्रामा॥15॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।