किष्किन्धाकाण्ड · 03
सुग्रीव का दुःख सुनाना, बालि वध की प्रतिज्ञा
किष्किन्धाकाण्ड का प्रकरण 3: सुग्रीव का दुःख सुनाना, बालि वध की प्रतिज्ञा। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
दोहा · 4
तब हनुमंत उभय दिसि की सब कथा सुनाइ। पावक साखी देइ करि जोरी प्रीति दृढ़ाइ॥4॥
चौपाई · 1
कीन्हि प्रीति कछु बीच न राखा। लछिमन राम चरित् सब भाषा॥ कह सुग्रीव नयन भरि बारी। मिलिहि नाथ मिथिलेसकुमारी॥1॥
चौपाई · 2
मंत्रिन्ह सहित इहाँ एक बारा। बैठ रहेउँ मैं करत बिचारा॥ गगन पंथ देखी मैं जाता। परबस परी बहुत बिलपाता॥2॥
चौपाई · 3
राम राम हा राम पुकारी। हमहि देखि दीन्हेउ पट डारी॥ मागा राम तुरत तेहिं दीन्हा। पट उर लाइ सोच अति कीन्हा॥3॥
चौपाई · 4
कह सुग्रीव सुनहु रघुबीरा। तजहु सोच मन आनहु धीरा॥ सब प्रकार करिहउँ सेवकाई। जेहि बिधि मिलिहि जानकी आई॥4॥
दोहा · 5
सखा बचन सुनि हरषे कृपासिंधु बलसींव। कारन कवन बसहु बन मोहि कहहु सुग्रीव॥5॥
चौपाई · 1
नाथ बालि अरु मैं द्वौ भाइ। प्रीति रही कछु बरनि न जाई॥ मयसुत मायावी तेहि नाऊँ। आवा सो प्रभु हमरें गाऊँ॥1॥
चौपाई · 2
अर्ध राति पुर द्वार पुकारा। बाली रिपु बल सहै न पारा॥ धावा बालि देखि सो भागा। मैं पुनि गयउँ बंधु सँग लागा॥2॥
चौपाई · 3
गिरिबर गुहाँ पैठ सो जाई। तब बालीं मोहि कहा बुझाई॥ परिखेसु मोहि एक पखवारा। नहिं आवौं तब जानेसु मारा॥3॥
चौपाई · 4
मास दिवस तहँ रहेउँ खरारी। निसरी रुधिर धार तहँ भारी॥ बालि हतेसि मोहि मारिहि आई। सिला देइ तहँ चलेउँ पराई॥4॥
चौपाई · 5
मंत्रिन्ह पुर देखा बिनु साईं। दीन्हेउ मोहि राज बरिआईं॥ बाली ताहि मारि गृह आवा। देखि मोहि जियँ भेद बढ़ावा॥5॥
चौपाई · 6
रिपु सम मोहि मारेसि अति भारी। हरि लीन्हसि सर्बसु अरु नारी॥ ताकें भय रघुबीर कृपाला सकल भुवन मैं फिरेउँ बिहाला॥6॥
चौपाई · 7
इहाँ साप बस आवत नाहीं। तदपि सभीत रहउँ मन माहीं॥ सुन सेवक दुःख दीनदयाला फरकि उठीं द्वै भुजा बिसाला॥7॥
दोहा · 6
सुनु सुग्रीव मारिहउँ बालिहि एकहिं बान। ब्रह्म रुद्र सरनागत गएँ न उबरिहिं प्रान॥6॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।