किष्किन्धाकाण्ड · 05
बालि-सुग्रीव युद्ध और बालि उद्धार
किष्किन्धाकाण्ड का प्रकरण 5: बालि-सुग्रीव युद्ध और बालि उद्धार। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
दोहा · 7
कह बाली सुनु भीरु प्रिय समदरसी रघुनाथ। जौं कदाचि मोहि मारहिं तौ पुनि होउँ सनाथ॥7॥
चौपाई · 1
अस कहि चला महा अभिमानी। तृन समान सुग्रीवहि जानी॥ भिरे उभौ बाली अति तर्जा। मुठिका मारि महाधुनि गर्जा॥1॥
चौपाई · 2
तब सुग्रीव बिकल होइ भागा। मुष्टि प्रहार बज्र सम लागा॥ मैं जो कहा रघुबीर कृपाला। बंधु न होइ मोर यह काला॥2॥
चौपाई · 3
एक रूप तुम्ह भ्राता दोऊ तेहि भ्रम तें नहिं मारेउँ सोऊ॥ कर परसा सुग्रीव सरीरा। तनु भा कुलिस गई सब पीरा॥3॥
चौपाई · 4
मेली कंठ सुमन कै माला। पठवा पुनि बल देइ बिसाला॥ पुनि नाना बिधि भई लराई। बिटप ओट देखहिं रघुराई॥4॥
दोहा · 8
बहु छल बल सुग्रीव कर हियँ हारा भय मानि। मारा बालि राम तब हृदय माझ सर तानि॥8॥
दोहा · 1
परा बिकल महि सर के लागें। पुनि उठि बैठ देखि प्रभु आगे॥ स्याम गात सिर जटा बनाएँ। अरुन नयन सर चाप चढ़ाएँ॥1॥
दोहा · 2
पुनि पुनि चितइ चरन चित दीन्हा। सुफल जन्म माना प्रभु चीन्हा॥ हृदयँ प्रीति मुख बचन कठोरा। बोला चितइ राम की ओरा॥2॥
दोहा · 3
धर्म हेतु अवतरेहु गोसाईं। मारेहु मोहि ब्याध की नाईं॥ मैं बैरी सुग्रीव पिआरा। अवगुन कवन नाथ मोहि मारा॥3॥
दोहा · 4
अनुज बधू भगिनी सुत नारी। सुनु सठ कन्या सम ए चारी॥ इन्हहि कुदृष्टि बिलोकइ जोई। ताहि बधें कछु पाप न होई॥4॥
दोहा · 5
मूढ़ तोहि अतिसय अभिमाना। नारि सिखावन करसि न काना॥ मम भुज बल आश्रित तेहि जानी। मारा चहसि अधम अभिमानी॥5॥
दोहा · 9
सुनहु राम स्वामी सन चल न चातुरी मोरि। प्रभु अजहूँ मैं पापी अंतकाल गति तोरि॥9॥
चौपाई · 1
सुनत राम अति कोमल बानी। बालि सीस परसेउ निज पानी॥ अचल करौं तनु राखहु प्राना। बालि कहा सुनु कृपानिधाना॥1॥
चौपाई · 2
जन्म जन्म मुनि जतनु कराहीं। अंत राम कहि आवत नाहीं॥ जासु नाम बल संकर कासी। देत सबहि सम गति अबिनासी॥2॥
चौपाई · 3
मम लोचन गोचर सोई आवा। बहुरि कि प्रभु अस बनिहि बनावा॥3॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।