किष्किन्धाकाण्ड · 02

श्री रामजी से हनुमानजी का मिलना और श्री राम-सुग्रीव की मित्रता

किष्किन्धाकाण्ड का प्रकरण 2: श्री रामजी से हनुमानजी का मिलना और श्री राम-सुग्रीव की मित्रता। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।

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दोहा · 1

जग कारन तारन भव भंजन धरनी भार। की तुम्ह अखिल भुवन पति लीन्ह मनुज अवतार॥1॥

चौपाई · 1

कोसलेस दसरथ के जाए, हम पितु बचन मानि बन आए॥ नाम राम लछिमन दौउ भाई, संग नारि सुकुमारि सुहाई॥1॥

चौपाई · 2

इहाँ हरी निसिचर बैदेही। बिप्र फिरहिं हम खोजत तेही॥ आपन चरित कहा हम गाई। कहहु बिप्र निज कथा बुझाई॥2॥

चौपाई · 3

प्रभु पहिचानि परेउ गहि चरना। सो सुख उमा जाइ नहिं बरना॥ पुलकित तन मुख आव न बचना। देखत रुचिर बेष कै रचना॥3॥

चौपाई · 4

पुनि धीरजु धरि अस्तुति कीन्ही। हरष हृदयँ निज नाथहि चीन्ही॥ मोर न्याउ मैं पूछा साईं। तुम्ह पूछहु कस नर की नाईं॥4॥

चौपाई · 5

तव माया बस फिरउँ भुलाना। ता ते मैं नहिं प्रभु पहिचाना॥5॥

दोहा · 2

एकु मैं मंद मोहबस कुटिल हृदय अग्यान। पुनि प्रभु मोहि बिसारेउ दीनबंधु भगवान॥2॥

चौपाई · 1

जदपि नाथ बहु अवगुन मोरें। सेवक प्रभुहि परै जनि भोरें॥ नाथ जीव तव मायाँ मोहा। सो निस्तरइ तुम्हारेहिं छोहा॥1॥

चौपाई · 2

ता पर मैं रघुबीर दोहाई। जानउँ नहिं कछु भजन उपाई॥ सेवक सुत पति मातु भरोसें। रहइ असोच बनइ प्रभु पोसें॥2॥

चौपाई · 3

अस कहि परेउ चरन अकुलाई। निज तनु प्रगटि प्रीति उर छाई॥ तब रघुपति उठाई उर लावा। निज लोचन जल सींचि जुड़ावा॥3॥

चौपाई · 4

सुनु कपि जियँ मानसि जनि ऊना। तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना॥ समदरसी मोहि कह सब कोऊ। सेवक प्रिय अनन्य गति सोऊ॥4॥

दोहा · 3

सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत। मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत॥3॥

चौपाई · 1

देखि पवनसुत पति अनुकूला। हृदयँ हरष बीती सब सूला॥ नाथ सैल पर कपिपति रहई। सो सुग्रीव दास तव अहई॥1॥

चौपाई · 2

तेहि सन नाथ मयत्री कीजे। दीन जानि तेहि अभय करीजे॥ सो सीता कर खोज कराइहि। जहँ तहँ मरकट कोटि पठाइहि॥2॥

चौपाई · 3

एहि बिधि सकल कथा समुझाई। लिए दुऔ जन पीठि चढ़ाई॥ जब सुग्रीवँ राम कहुँ देखा। अतिसय जन्म धन्य करि लेखा॥3॥

चौपाई · 4

सादर मिलेउ नाइ पद माथा। भेंटेउ अनुज सहित रघुनाथा॥ कपि कर मन बिचार एहि रीती। करिहहिं बिधि मो सन ए प्रीती॥4॥

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गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।