बालकाण्ड · 29
प्रतापभानु की कथा
बालकाण्ड का प्रकरण 29: प्रतापभानु की कथा। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
चौपाई · 1
सुनु मुनि कथा पुनीत पुरानी। जो गिरिजा प्रति संभु बखानी॥ बिस्व बिदित एक कैकय देसू। सत्यकेतु तहँ बसइ नरेसू॥1॥
चौपाई · 2
धरम धुरंधर नीति निधाना। तेज प्रताप सील बलवाना॥ तेहि कें भए जुगल सुत बीरा। सब गुन धाम महा रनधीरा॥2॥
चौपाई · 3
राज धनी जो जेठ सुत आही। नाम प्रतापभानु अस ताही॥ अपर सुतहि अरिमर्दन नामा। भुजबल अतुल अचल संग्रामा॥3॥
चौपाई · 4
भाइहि भाइहि परम समीती। सकल दोष छल बरजित प्रीती॥ जेठे सुतहि राज नृप दीन्हा। हरि हित आपु गवन बन कीन्हा॥4॥
दोहा · 153
जब प्रतापरबि भयउ नृप फिरी दोहाई देस। प्रजा पाल अति बेदबिधि कतहुँ नहीं अघ लेस॥153॥
चौपाई · 1
नृप हितकारक सचिव सयाना। नाम धरमरुचि सुक्र समाना॥ सचिव सयान बंधु बलबीरा। आपु प्रतापपुंज रनधीरा॥1॥
चौपाई · 2
सेन संग चतुरंग अपारा। अमित सुभट सब समर जुझारा॥ सेन बिलोकि राउ हरषाना। अरु बाजे गहगहे निसाना॥2॥
चौपाई · 3
बिजय हेतु कटकई बनाई। सुदिन साधि नृप चलेउ बजाई॥ जहँ तहँ परीं अनेक लराईं। जीते सकल भूप बरिआईं॥3॥
चौपाई · 4
सप्त दीप भुजबल बस कीन्हे। लै लै दंड छाड़ि नृप दीन्हे॥ सकल अवनि मंडल तेहि काला। एक प्रतापभानु महिपाला॥4॥
दोहा · 154
स्वबस बिस्व करि बाहुबल निज पुर कीन्ह प्रबेसु। अरथ धरम कामादि सुख सेवइ समयँ नरेसु॥154॥
चौपाई · 1
भूप प्रतापभानु बल पाई। कामधेनु भै भूमि सुहाई॥ सब दुख बरजित प्रजा सुखारी। धरमसील सुंदर नर नारी॥1॥
चौपाई · 2
सचिव धरमरुचि हरि पद प्रीती। नृप हित हेतु सिखव नित नीती॥ गुर सुर संत पितर महिदेवा। करइ सदा नृप सब कै सेवा॥2॥
चौपाई · 3
भूप धरम जे बेद बखाने। सकल करइ सादर सुख माने॥ दिन प्रति देइ बिबिध बिधि दाना। सुनइ सास्त्र बर बेद पुराना॥3॥
चौपाई · 4
नाना बापीं कूप तड़ागा। सुमन बाटिका सुंदर बागा॥ बिप्रभवन सुरभवन सुहाए। सब तीरथन्ह विचित्र बनाए॥4॥
दोहा · 155
जहँ लजि कहे पुरान श्रुति एक एक सब जाग। बार सहस्र सहस्र नृप किए सहित अनुराग॥155॥
चौपाई · 1
हृदयँ न कछु फल अनुसंधाना। भूप बिबेकी परम सुजाना॥ करइ जे धरम करम मन बानी। बासुदेव अर्पित नृप ग्यानी॥1॥
चौपाई · 2
चढ़ि बर बाजि बार एक राजा। मृगया कर सब साजि समाजा॥ बिंध्याचल गभीर बन गयऊ। मृग पुनीत बहु मारत भयऊ॥2॥
चौपाई · 3
फिरत बिपिन नृप दीख बराहू। जनु बन दुरेउ ससिहि ग्रसि राहू॥ बड़ बिधु नहिं समात मुख माहीं। मनहुँ क्रोध बस उगिलत नाहीं॥3॥
चौपाई · 4
कोल कराल दसन छबि गाई। तनु बिसाल पीवर अधिकाई॥ घुरुघुरात हय आरौ पाएँ। चकित बिलोकत कान उठाएँ॥4॥
दोहा · 156
नील महीधर सिखर सम देखि बिसाल बराहु। चपरि चलेउ हय सुटुकि नृप हाँकि न होइ निबाहु॥156॥
चौपाई · 1
आवत देखि अधिक रव बाजी। चलेउ बराह मरुत गति भाजी॥ तुरत कीन्ह नृप सर संधाना। महि मिलि गयउ बिलोकत बाना॥1॥
चौपाई · 2
तकि तकि तीर महीस चलावा। करि छल सुअर सरीर बचावा॥ प्रगटत दुरत जाइ मृग भागा। रिस बस भूप चलेउ सँग लागा॥2॥
चौपाई · 3
गयउ दूरि घन गहन बराहू। जहँ नाहिन गज बाजि निबाहू॥ अति अकेल बन बिपुल कलेसू। तदपि न मृग मग तजइ नरेसू॥3॥
चौपाई · 4
कोल बिलोकि भूप बड़ धीरा। भागि पैठ गिरिगुहाँ गभीरा॥ अगम देखि नृप अति पछिताई। फिरेउ महाबन परेउ भुलाई॥4॥
दोहा · 157
खेद खिन्न छुद्धित तृषित राजा बाजि समेत। खोजत ब्याकुल सरित सर जल बिनु भयउ अचेत॥157॥
चौपाई · 1
फिरत बिपिन आश्रम एक देखा। तहँ बस नृपति कपट मुनिबेषा॥ जासु देस नृप लीन्ह छड़ाई। समर सेन तजि गयउ पराई॥1॥
चौपाई · 2
समय प्रतापभानु कर जानी। आपन अति असमय अनुमानी॥ गयउ न गृह मन बहुत गलानी। मिला न राजहि नृप अभिमानी॥2॥
चौपाई · 3
रिस उर मारि रंक जिमि राजा। बिपिन बसइ तापस कें साजा॥ तासु समीप गवन नृप कीन्हा। यह प्रतापरबि तेहिं तब चीन्हा॥3॥
चौपाई · 4
राउ तृषित नहिं सो पहिचाना। देखि सुबेष महामुनि जाना॥ उतरि तुरग तें कीन्ह प्रनामा। परम चतुर न कहेउ निज नामा॥4॥
दोहा · 158
भूपति तृषित बिलोकि तेहिं सरबरु दीन्ह देखाइ। मज्जन पान समेत हय कीन्ह नृपति हरषाइ॥158॥
चौपाई · 1
गै श्रम सकल सुखी नृप भयऊ। निज आश्रम तापस लै गयऊ॥ आसन दीन्ह अस्त रबि जानी। पुनि तापस बोलेउ मृदु बानी॥1॥
चौपाई · 2
को तुम्ह कस बन फिरहु अकेलें। सुंदर जुबा जीव परहेलें॥ चक्रबर्ति के लच्छन तोरें। देखत दया लागि अति मोरें॥2॥
चौपाई · 3
नाम प्रतापभानु अवनीसा। तासु सचिव मैं सुनहु मुनीसा॥ फिरत अहेरें परेउँ भुलाई। बड़ें भाग देखेउँ पद आई॥3॥
चौपाई · 4
हम कहँ दुर्लभ दरस तुम्हारा। जानत हौं कछु भल होनिहारा॥ कह मुनि तात भयउ अँधिआरा। जोजन सत्तरि नगरु तुम्हारा॥4॥
दोहा
निसा घोर गंभीर बन पंथ न सुनहु सुजान। बसहु आजु अस जानि तुम्ह जाएहु होत बिहान॥159 (क)॥
दोहा
तुलसी जसि भवतब्यता तैसी मिलइ सहाइ। आपुनु आवइ ताहि पहिं ताहि तहाँ लै जाइ॥159(ख)॥
चौपाई · 1
भलेहिं नाथ आयसु धरि सीसा। बाँधि तुरग तरु बैठ महीसा॥ नृप बहु भाँति प्रसंसेउ ताही। चरन बंदि निज भाग्य सराही॥1॥
चौपाई · 2
पुनि बोलेउ मृदु गिरा सुहाई। जानि पिता प्रभु करउँ ढिठाई॥ मोहि मुनीस सुत सेवक जानी। नाथ नाम निज कहहु बखानी॥2॥
चौपाई · 3
तेहि न जान नृप नृपहि सो जाना। भूप सुहृद सो कपट सयाना॥ बैरी पुनि छत्री पुनि राजा। छल बल कीन्ह चहइ निज काजा॥3॥
चौपाई · 4
समुझि राजसुख दुखित अराती। अवाँ अनल इव सुलगइ छाती॥ ससरल बचन नृप के सुनि काना। बयर सँभारि हृदयँ हरषाना॥4॥
दोहा · 160
कपट बोरि बानी मृदल बोलेउ जुगुति समेत। नाम हमार भिखारि अब निर्धन रहित निकेत॥160॥
चौपाई · 1
कह नृप जे बिग्यान निधाना। तुम्ह सारिखे गलित अभिमाना॥ सदा रहहिं अपनपौ दुराएँ। सब बिधि कुसल कुबेष बनाएँ॥1॥
चौपाई · 2
तेहि तें कहहिं संत श्रुति टेरें। परम अकिंचन प्रिय हरि केरें॥ तुम्ह सम अधन भिखारि अगेहा। होत बिरंचि सिवहि संदेहा॥2॥
चौपाई · 3
जोसि सोसि तव चरन नमामी। मो पर कृपा करिअ अब स्वामी॥ सहज प्रीति भूपति कै देखी। आपु बिषय बिस्वास बिसेषी॥3॥
चौपाई · 4
सब प्रकार राजहि अपनाई। बोलेउ अधिक सनेह जनाई॥ सुनु सतिभाउ कहउँ महिपाला। इहाँ बसत बीते बहु काला॥4॥
दोहा
अब लगि मोहि न मिलेउ कोउ मैं न जनावउँ काहु। लोकमान्यता अनल सम कर तप कानन दाहु॥161 क॥
सोरठा
तुलसी देखि सुबेषु भूलहिं मूढ़ न चतुर नर। सुंदर केकिहि पेखु बचन सुधा सम असन अहि॥161 ख॥
चौपाई · 1
तातें गुपुत रहउँ जग माहीं। हरि तजि किमपि प्रयोजन नाहीं॥ प्रभु जानत सब बिनहिं जनाए। कहहु कवनि सिधि लोक रिझाएँ॥1॥
चौपाई · 2
तुम्ह सुचि सुमति परम प्रिय मोरें। प्रीति प्रतीति मोहि पर तोरें॥ अब जौं तात दुरावउँ तोही। दारुन दोष घटइ अति मोही॥2॥
चौपाई · 3
जिमि जिमि तापसु कथइ उदासा। तिमि तिमि नृपहि उपज बिस्वासा॥ देखा स्वबस कर्म मन बानी। तब बोला तापस बगध्यानी॥3॥
चौपाई · 4
नाम हमार एकतनु भाई। सुनि नृप बोलेउ पुनि सिरु नाई॥ कहहु नाम कर अरथ बखानी। मोहि सेवक अति आपन जानी॥4॥
दोहा · 162
आदिसृष्टि उपजी जबहिं तब उतपति भै मोरि। नाम एकतनु हेतु तेहि देह न धरी बहोरि॥162॥
चौपाई · 1
जनि आचरजु करहु मन माहीं। सुत तप तें दुर्लभ कछु नाहीं॥ तप बल तें जग सृजइ बिधाता। तप बल बिष्नु भए परित्राता॥1॥
चौपाई · 2
तपबल संभु करहिं संघारा। तप तें अगम न कछु संसारा॥ भयउ नृपहि सुनि अति अनुरागा। कथा पुरातन कहै सो लागा॥2॥
चौपाई · 3
करम धरम इतिहास अनेका। करइ निरुपन बिरति बिबेका॥ उदभव पालन प्रलय कहानी। कहेसि अमित आचरज बखानी॥3॥
चौपाई · 4
सुनि महीप तापस बस भयऊ। आपन नाम कहन तब लयउ॥ कह तापस नृप जानउँ तोही। कीन्हेहु कपट लाग भल मोही॥4॥
सोरठा · 163
सुनु महीस असि नीति जहँ तहँ नाम न कहहिं नृप। मोहि तोहि पर अति प्रीति सोइ चतुरता बिचारि तव॥163॥
चौपाई · 1
नाम तुम्हार प्रताप दिनेसा। सत्यकेतु तव पिता नरेसा॥ गुर प्रसाद सब जानिअ राजा। कहिअ न आपन जानि अकाजा॥1॥
चौपाई · 2
देखि तात तव सहज सुधाई। प्रीति प्रतीति नीति निपुनाई॥ उपजि परी ममता मन मोरें। कहउँ कथा निज पूछे तोरें॥2॥
चौपाई · 3
अब प्रसन्न मैं संसय नाहीं। मागु जो भूप भाव मन माहीं॥ सुनि सुबचन भूपति हरषाना। गहि पद बिनय कीन्हि बिधि नाना॥3॥
चौपाई · 4
कृपासिंधु मुनि दरसन तोरें। चारि पदारथ करतल मोरें॥ प्रभुहि तथापि प्रसन्न बिलोकी। मागि अगम बर होउँ असोकी॥4॥
दोहा · 164
जरा मरन दुख रहित तनु समर जितै जनि कोउ। एकछत्र रिपुहीन महि राज कलप सत होउ॥164॥
चौपाई · 1
कह तापस नृप ऐसेइ होऊ। कारन एक कठिन सुनु सोऊ॥ कालउ तुअ पद नाइहि सीसा। एक बिप्रकुल छाड़ि महीसा॥1॥
चौपाई · 2
तपबल बिप्र सदा बरिआरा। तिन्ह के कोप न कोउ रखवारा॥ जौं बिप्रन्ह बस करहु नरेसा। तौ तुअ बस बिधि बिष्नु महेसा॥2॥
चौपाई · 3
चल न ब्रह्मकुल सन बरिआई। सत्य कहउँ दोउ भुजा उठाई॥ बिप्र श्राप बिनु सुनु महिपाला। तोर नास नहिं कवनेहुँ काला॥3॥
चौपाई · 4
हरषेउ राउ बचन सुनि तासू। नाथ न होइ मोर अब नासू॥ तव प्रसाद प्रभु कृपानिधाना। मो कहुँ सर्बकाल कल्याना॥4॥
दोहा · 165
एवमस्तु कहि कपट मुनि बोला कुटिल बहोरि। मिलब हमार भुलाब निज कहहु त हमहि न खोरि॥165॥
चौपाई · 1
तातें मैं तोहि बरजउँ राजा। कहें कथा तव परम अकाजा॥ छठें श्रवन यह परत कहानी। नास तुम्हार सत्य मम बानी॥1॥
चौपाई · 2
यह प्रगटें अथवा द्विजश्रापा। नास तोर सुनु भानुप्रतापा॥ आन उपायँ निधन तव नाहीं। जौं हरि हर कोपहिं मन माहीं॥2॥
चौपाई · 3
सत्य नाथ पद गहि नृप भाषा। द्विज गुर कोप कहहु को राखा॥ राखइ गुर जौं कोप बिधाता। गुर बिरोध नहिं कोउ जग त्राता॥3॥
चौपाई · 4
जौं न चलब हम कहे तुम्हारें। होउ नास नहिं सोच हमारें॥ एकहिं डर डरपत मन मोरा। प्रभु महिदेव श्राप अति घोरा॥4॥
दोहा · 166
होहिं बिप्र बस कवन बिधि कहहु कृपा करि सोउ। तुम्ह तजि दीनदयाल निज हितू न देखउँ कोउ॥166॥
चौपाई · 1
सुनु नृप बिबिध जतन जग माहीं। कष्टसाध्य पुनि होहिं कि नाहीं॥ अहइ एक अति सुगम उपाई। तहाँ परन्तु एक कठिनाई॥1॥
चौपाई · 2
मम आधीन जुगुति नृप सोई। मोर जाब तव नगर न होई॥ आजु लगें अरु जब तें भयऊँ। काहू के गृह ग्राम न गयऊँ॥2॥
चौपाई · 3
जौं न जाउँ तव होइ अकाजू। बना आइ असमंजस आजू॥ सुनि महीस बोलेउ मृदु बानी। नाथ निगम असि नीति बखानी॥3॥
चौपाई · 4
बड़े सनेह लघुन्ह पर करहीं। गिरि निज सिरनि सदा तृन धरहीं॥ जलधि अगाध मौलि बह फेनू। संतत धरनि धरत सिर रेनू॥4॥
दोहा · 167
अस कहि गहे नरेस पद स्वामी होहु कृपाल। मोहि लागि दुख सहिअ प्रभु सज्जन दीनदयाल॥167॥
चौपाई · 1
जानि नृपहि आपन आधीना। बोला तापस कपट प्रबीना॥ सत्य कहउँ भूपति सुनु तोही। जग नाहिन दुर्लभ कछु मोही॥1॥
चौपाई · 2
अवसि काज मैं करिहउँ तोरा। मन तन बचन भगत तैं मोरा॥ जोग जुगुति तप मंत्र प्रभाऊ। फलइ तबहिं जब करिअ दुराऊ॥2॥
चौपाई · 3
जौं नरेस मैं करौं रसोई। तुम्ह परुसहु मोहि जान न कोई॥ अन्न सो जोइ जोइ भोजन करई। सोइ सोइ तव आयसु अनुसरई॥3॥
चौपाई · 4
पुनि तिन्ह के गृह जेवँइ जोऊ। तव बस होइ भूप सुनु सोऊ॥ जाइ उपाय रचहु नृप एहू। संबत भरि संकलप करेहू॥4॥
दोहा · 168
नित नूतन द्विज सहस सत बरेहु सहित परिवार। मैं तुम्हरे संकलप लगि दिनहिं करबि जेवनार॥168॥
चौपाई · 1
एहि बिधि भूप कष्ट अति थोरें। होइहहिं सकल बिप्र बस तोरें॥ करिहहिं बिप्र होममख सेवा। तेहिं प्रसंग सहजेहिं बस देवा॥1॥
चौपाई · 2
और एक तोहि कहउँ लखाऊ। मैं एहिं बेष न आउब काऊ॥ तुम्हरे उपरोहित कहुँ राया। हरि आनब मैं करि निज माया॥2॥
चौपाई · 3
तपबल तेहि करि आपु समाना। रखिहउँ इहाँ बरष परवाना॥ मैं धरि तासु बेषु सुनु राजा। सब बिधि तोर सँवारब काजा॥3॥
चौपाई · 4
गै निसि बहुत सयन अब कीजे। मोहि तोहि भूप भेंट दिन तीजे॥ मैं तपबल तोहि तुरग समेता। पहुँचैहउँ सोवतहि निकेता॥4॥
दोहा · 169
मैं आउब सोइ बेषु धरि पहिचानेहु तब मोहि। जब एकांत बोलाइ सब कथा सुनावौं तोहि॥169॥
चौपाई · 1
सयन कीन्ह नृप आयसु मानी। आसन जाइ बैठ छलग्यानी॥ श्रमित भूप निद्रा अति आई। सो किमि सोव सोच अधिकाई॥1॥
चौपाई · 2
कालकेतु निसिचर तहँ आवा। जेहिं सूकर होइ नृपहि भुलावा॥ परम मित्र तापस नृप केरा। जानइ सो अति कपट घनेरा॥2॥
चौपाई · 3
तेहि के सत सुत अरु दस भाई। खल अति अजय देव दुखदाई॥ प्रथमहिं भूप समर सब मारे। बिप्र संत सुर देखि दुखारे॥3॥
चौपाई · 4
तेहिं खल पाछिल बयरु सँभारा। तापस नृप मिलि मंत्र बिचारा॥ जेहिं रिपु छय सोइ रचेन्हि उपाऊ। भावी बस न जान कछु राऊ॥4॥
दोहा · 170
रिपु तेजसी अकेल अपि लघु करि गनिअ न ताहु। अजहुँ देत दुख रबि ससिहि सिर अवसेषित राहु॥170॥
दोहा · 1
तापस नृप निज सखहि निहारी। हरषि मिलेउ उठि भयउ सुखारी॥ मित्रहि कहि सब कथा सुनाई। जातुधान बोला सुख पाई॥1॥
दोहा · 2
अब साधेउँ रिपु सुनहु नरेसा। जौं तुम्ह कीन्ह मोर उपदेसा॥ परिहरि सोच रहहु तुम्ह सोई। बिनु औषध बिआधि बिधि खोई॥2॥
दोहा · 3
कुल समेत रिपु मूल बहाई। चौथें दिवस मिलब मैं आई॥ तापस नृपहि बहुत परितोषी। चला महाकपटी अतिरोषी॥3॥
दोहा · 4
भानुप्रतापहि बाजि समेता। पहुँचाएसि छन माझ निकेता॥ नृपहि नारि पहिं सयन कराई। हयगृहँ बाँधेसि बाजि बनाई॥4॥
दोहा · 171
राजा के उपरोहितहि हरि लै गयउ बहोरि। लै राखेसि गिरि खोह महुँ मायाँ करि मति भोरि॥171॥
चौपाई · 1
आपु बिरचि उपरोहित रूपा। परेउ जाइ तेहि सेज अनूपा॥ जागेउ नृप अनभएँ बिहाना। देखि भवन अति अचरजु माना॥1॥
चौपाई · 2
मुनि महिमा मन महुँ अनुमानी। उठेउ गवँहिं जेहिं जान न रानी॥ कानन गयउ बाजि चढ़ि तेहीं। पुर नर नारि न जानेउ केहीं॥2॥
चौपाई · 3
गएँ जाम जुग भूपति आवा। घर घर उत्सव बाज बधावा॥ उपरोहितहि देख जब राजा। चकित बिलोक सुमिरि सोइ काजा॥3॥
चौपाई · 4
जुग सम नृपहि गए दिन तीनी। कपटी मुनि पद रह मति लीनी॥ समय जान उपरोहित आवा। नृपहि मते सब कहि समुझावा॥4॥
दोहा · 172
नृप हरषेउ पहिचानि गुरु भ्रम बस रहा न चेत। बरे तुरत सत सहस बर बिप्र कुटुंब समेत॥172॥
चौपाई · 1
उपरोहित जेवनार बनाई। छरस चारि बिधि जसि श्रुति गाई॥ मायामय तेहिं कीन्हि रसोई। बिंजन बहु गनि सकइ न कोई॥1॥
चौपाई · 2
बिबिध मृगन्ह कर आमिष राँधा। तेहि महुँ बिप्र माँसु खल साँधा॥ भोजन कहुँ सब बिप्र बोलाए। पद पखारि सादर बैठाए॥2॥
चौपाई · 3
परुसन जबहिं लाग महिपाला। भै अकासबानी तेहि काला॥ बिप्रबृंद उठि उठि गृह जाहू। है बड़ि हानि अन्न जनि खाहू॥3॥
चौपाई · 4
भयउ रसोईं भूसुर माँसू। सब द्विज उठे मानि बिस्वासू॥ भूप बिकल मति मोहँ भुलानी। भावी बस न आव मुख बानी॥4॥
दोहा · 173
बोले बिप्र सकोप तब नहिं कछु कीन्ह बिचार। जाइ निसाचर होहु नृप मूढ़ सहित परिवार॥173॥
चौपाई · 1
छत्रबंधु तैं बिप्र बोलाई। घालै लिए सहित समुदाई॥ ईश्वर राखा धरम हमारा। जैहसि तैं समेत परिवारा॥1॥
चौपाई · 2
संबत मध्य नास तव होऊ। जलदाता न रहिहि कुल कोऊ॥ नृप सुनि श्राप बिकल अति त्रासा। भै बहोरि बर गिरा अकासा॥2॥
चौपाई · 3
बिप्रहु श्राप बिचारि न दीन्हा। नहिं अपराध भूप कछु कीन्हा॥ चकित बिप्र सब सुनि नभबानी। भूप गयउ जहँ भोजन खानी॥3॥
चौपाई · 4
तहँ न असन नहिं बिप्र सुआरा। फिरेउ राउ मन सोच अपारा॥ सब प्रसंग महिसुरन्ह सुनाई। त्रसित परेउ अवनीं अकुलाई॥4॥
दोहा · 174
भूपति भावी मिटइ नहिं जदपि न दूषन तोर। किएँ अन्यथा दोइ नहिं बिप्रश्राप अति घोर॥174॥
चौपाई · 1
अस कहि सब महिदेव सिधाए। समाचार पुरलोगन्ह पाए॥ सोचहिं दूषन दैवहि देहीं। बिरचत हंस काग किए जेहीं॥1॥
चौपाई · 2
उपरोहितहि भवन पहुँचाई। असुर तापसहि खबरि जनाई॥ तेहिं खल जहँ तहँ पत्र पठाए। सजि सजि सेन भूप सब धाए॥2॥
चौपाई · 3
घेरेन्हि नगर निसान बजाई। बिबिध भाँति नित होइ लराई॥ जूझे सकल सुभट करि करनी। बंधु समेत परेउ नृप धरनी॥3॥
चौपाई · 4
सत्यकेतु कुल कोउ नहिं बाँचा। बिप्रश्राप किमि होइ असाँचा॥ रिपु जिति सब नृप नगर बसाई। निज पुर गवने जय जसु पाई॥4॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।