बालकाण्ड · 28
श्री मनु-शतरूपा जी का तप एवं वरदान
बालकाण्ड का प्रकरण 28: श्री मनु-शतरूपा जी का तप एवं वरदान। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
दोहा · 139
एक कलप एहि हेतु प्रभु लीन्ह मनुज अवतार। सुर रंजन सज्जन सुखद हरि भंजन भुमि भार॥139॥
चौपाई · 1
एहि बिधि जनम करम हरि केरे। सुंदर सुखद बिचित्र घनेरे॥ कलप कलप प्रति प्रभु अवतरहीं। चारु चरित नानाबिधि करहीं॥1॥
चौपाई · 2
तब-तब कथा मुनीसन्ह गाई। परम पुनीत प्रबंध बनाई॥ बिबिध प्रसंग अनूप बखाने। करहिं न सुनि आचरजु सयाने॥2॥
चौपाई · 3
हरि अनंत हरि कथा अनंता। कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता॥ रामचंद्र के चरित सुहाए। कलप कोटि लगि जाहिं न गाए॥3॥
चौपाई · 4
यह प्रसंग मैं कहा भवानी। हरिमायाँ मोहहिं मुनि ग्यानी॥ प्रभु कौतुकी प्रनत हितकारी। सेवत सुलभ सकल दुखहारी॥4॥
सोरठा · 140
सुर नर मुनि कोउ नाहिं जेहि न मोह माया प्रबल। अस बिचारि मन माहिं भजिअ महामाया पतिहि॥140॥
चौपाई · 1
अपर हेतु सुनु सैलकुमारी। कहउँ बिचित्र कथा बिस्तारी॥ जेहि कारन अज अगुन अरूपा। ब्रह्म भयउ कोसलपुर भूपा॥1॥
चौपाई · 2
जो प्रभु बिपिन फिरत तुम्ह देखा। बंधु समेत धरें मुनिबेषा॥ जासु चरित अवलोकि भवानी। सती सरीर रहिहु बौरानी॥2॥
चौपाई · 3
अजहुँ न छाया मिटति तुम्हारी। तासु चरित सुनु भ्रम रुज हारी॥ लीला कीन्हि जो तेहिं अवतारा। सो सब कहिहउँ मति अनुसारा॥3॥
चौपाई · 4
भरद्वाज सुनि संकर बानी। सकुचि सप्रेम उमा मुसुकानी॥ लगे बहुरि बरनै बृषकेतू। सो अवतार भयउ जेहि हेतू॥4॥
दोहा · 141
सो मैं तुम्ह सन कहउँ सबु सुनु मुनीस मन लाइ। रामकथा कलि मल हरनि मंगल करनि सुहाइ॥141॥
चौपाई · 1
स्वायंभू मनु अरु सतरूपा। जिन्ह तें भै नरसृष्टि अनूपा॥ दंपति धरम आचरन नीका। अजहुँ गाव श्रुति जिन्ह कै लीका॥1॥
चौपाई · 2
नृप उत्तानपाद सुत तासू। ध्रुव हरिभगत भयउ सुत जासू॥ लघु सुत नाम प्रियब्रत ताही। बेद पुरान प्रसंसहिं जाही॥2॥
चौपाई · 3
देवहूति पुनि तासु कुमारी। जो मुनि कर्दम कै प्रिय नारी॥ आदि देव प्रभु दीनदयाला। जठर धरेउ जेहिं कपिल कृपाला॥3॥
चौपाई · 4
सांख्य सास्त्र जिन्ह प्रगट बखाना। तत्व बिचार निपुन भगवाना॥ तेहिं मनु राज कीन्ह बहु काला। प्रभु आयसु सब बिधि प्रतिपाला॥4॥
सोरठा · 142
होइ न बिषय बिराग भवन बसत भा चौथपन॥ हृदयँ बहुत दुख लाग जनम गयउ हरिभगति बिनु॥142॥
चौपाई · 1
बरबस राज सुतहि तब दीन्हा। नारि समेत गवन बन कीन्हा॥ तीरथ बर नैमिष बिख्याता। अति पुनीत साधक सिधि दाता॥1॥
चौपाई · 2
बसहिं तहाँ मुनि सिद्ध समाजा। तहँ हियँ हरषि चलेउ मनु राजा॥ पंथ जात सोहहिं मतिधीरा। ग्यान भगति जनु धरें सरीरा॥2॥
चौपाई · 3
पहुँचे जाइ धेनुमति तीरा। हरषि नहाने निरमल नीरा॥ आए मिलन सिद्ध मुनि ग्यानी। धरम धुरंधर नृपरिषि जानी॥3॥
चौपाई · 4
जहँ जहँ तीरथ रहे सुहाए। मुनिन्ह सकल सादर करवाए॥ कृस सरीर मुनिपट परिधाना। सत समाज नित सुनहिं पुराना॥4॥
दोहा · 143
द्वादस अच्छर मंत्र पुनि जपहिं सहित अनुराग। बासुदेव पद पंकरुह दंपति मन अति लाग॥143॥
चौपाई · 1
करहिं अहार साक फल कंदा। सुमिरहिं ब्रह्म सच्चिदानंदा॥ पुनि हरि हेतु करन तप लागे। बारि अधार मूल फल त्यागे॥1॥
चौपाई · 2
उर अभिलाष निरंतर होई। देखिअ नयन परम प्रभु सोई॥ अगुन अखंड अनंत अनादी। जेहि चिंतहिं परमारथबादी॥2॥
चौपाई · 3
नेति नेति जेहि बेद निरूपा। निजानंद निरुपाधि अनूपा॥ संभु बिरंचि बिष्नु भगवाना। उपजहिं जासु अंस तें नाना॥3॥
चौपाई · 4
ऐसेउ प्रभु सेवक बस अहई। भगत हेतु लीलातनु गहई॥ जौं यह बचन सत्य श्रुति भाषा। तौ हमार पूजिहि अभिलाषा॥4॥
दोहा · 144
एहि विधि बीते बरष षट सहस बारि आहार। संबत सप्त सहस्र पुनि रहे समीर अधार॥144॥
चौपाई · 1
बरष सहस दस त्यागेउ सोऊ। ठाढ़े रहे एक पद दोऊ ॥ बिधि हरि हर तप देखि अपारा। मनु समीप आए बहु बारा॥1॥
चौपाई · 2
मागहु बर बहु भाँति लोभाए। परम धीर नहिं चलहिं चलाए॥ अस्थिमात्र होइ रहे सरीरा। तदपि मनाग मनहिं नहिं पीरा॥2॥
चौपाई · 3
प्रभु सर्बग्य दास निज जानी। गति अनन्य तापस नृप रानी॥ मागु मागु बरु भै नभ बानी। परम गभीर कृपामृत सानी॥3॥
चौपाई · 4
मृतक जिआवनि गिरा सुहाई। श्रवन रंध्र होइ उर जब आई॥ हृष्ट पुष्ट तन भए सुहाए। मानहुँ अबहिं भवन ते आए॥4॥
दोहा · 145
श्रवन सुधा सम बचन सुनि पुलक प्रफुल्लित गात। बोले मनु करि दंडवत प्रेम न हृदयँ समात॥145॥
चौपाई · 1
सुनु सेवक सुरतरु सुरधेनू। बिधि हरि हर बंदित पद रेनू॥ सेवत सुलभ सकल सुखदायक। प्रनतपाल सचराचर नायक॥1॥
चौपाई · 2
जौं अनाथ हित हम पर नेहू। तौ प्रसन्न होई यह बर देहू॥ जोसरूप बस सिव मन माहीं। जेहिं कारन मुनि जतन कराहीं॥2॥
चौपाई · 3
जो भुसुंडि मन मानस हंसा। सगुन अगुन जेहि निगम प्रसंसा॥ देखहिं हम सो रूप भरि लोचन। कृपा करहु प्रनतारति मोचन॥3॥
चौपाई · 4
दंपति बचन परम प्रिय लागे। मृदुल बिनीत प्रेम रस पागे॥ भगत बछल प्रभु कृपानिधाना। बिस्वबास प्रगटे भगवाना॥4॥
दोहा · 146
नील सरोरुह नील मनि नील नीरधर स्याम। लाजहिं तन सोभा निरखि कोटि कोटि सत काम॥146॥
चौपाई · 1
सरद मयंक बदन छबि सींवा। चारु कपोल चिबुक दर ग्रीवा॥ अधर अरुन रद सुंदर नासा। बिधु कर निकर बिनिंदक हासा॥1॥
चौपाई · 2
नव अंबुज अंबक छबि नीकी। चितवनि ललित भावँतीजी की॥ भृकुटि मनोज चाप छबि हारी। तिलक ललाट पटल दुतिकारी॥2॥
चौपाई · 3
कुंडल मकर मुकुट सिर भ्राजा। कुटिल केस जनु मधुप समाजा॥ उर श्रीबत्स रुचिर बनमाला। पदिक हार भूषन मनिजाला॥3॥
चौपाई · 4
केहरि कंधर चारु जनेऊ। बाहु बिभूषन सुंदर तेऊ॥ मकरि कर सरिस सुभग भुजदंडा। कटि निषंग कर सर कोदंडा॥4॥
दोहा · 147
तड़ित बिनिंदक पीत पट उदर रेख बर तीनि। नाभि मनोहर लेति जनु जमुन भँवर छबि छीनि॥147॥
चौपाई · 1
पद राजीव बरनि नहिं जाहीं। मुनि मन मधुप बसहिं जेन्ह माहीं॥ बाम भाग सोभति अनुकूला। आदिसक्ति छबिनिधि जगमूला॥1॥
चौपाई · 2
जासु अंस उपजहिं गुनखानी। अगनित लच्छि उमा ब्रह्मानी॥ भृकुटि बिलास जासु जग होई। राम बाम दिसि सीता सोई॥2॥
चौपाई · 3
छबिसमुद्र हरि रूप बिलोकी। एकटक रहे नयन पट रोकी॥ चितवहिं सादर रूप अनूपा। तृप्ति न मानहिं मनु सतरूपा॥3॥
चौपाई · 4
हरष बिबस तन दसा भुलानी। परे दंड इव गहि पद पानी॥ सिर परसे प्रभु निज कर कंजा। तुरत उठाए करुनापुंजा॥4॥
दोहा · 148
बोले कृपानिधान पुनि अति प्रसन्न मोहि जानि। मागहु बर जोइ भाव मन महादानि अनुमानि॥148॥
चौपाई · 1
सुनि प्रभु बचन जोरि जुग पानी। धरि धीरजु बोली मृदु बानी॥ नाथ देखि पद कमल तुम्हारे। अब पूरे सब काम हमारे॥1॥
चौपाई · 2
एक लालसा बड़ि उर माहीं। सुगम अगम कहि जाति सो नाहीं॥ तुम्हहि देत अति सुगम गोसाईं। अगम लाग मोहि निज कृपनाईं॥2॥
चौपाई · 3
जथा दरिद्र बिबुधतरु पाई। बहु संपति मागत सकुचाई॥ तासु प्रभाउ जान नहिं सोई। तथा हृदयँ मम संसय होई॥3॥
चौपाई · 4
सो तुम्ह जानहु अंतरजामी। पुरवहु मोर मनोरथ स्वामी॥ सकुच बिहाइ मागु नृप मोही। मोरें नहिं अदेय कछु तोही॥4॥
दोहा · 149
दानि सिरोमनि कृपानिधि नाथ कहउँ सतिभाउ। चाहउँ तुम्हहि समान सुत प्रभु सन कवन दुराउ॥149॥
चौपाई · 1
देखि प्रीति सुनि बचन अमोले। एवमस्तु करुनानिधि बोले॥ आपु सरिस खोजौं कहँ जाई। नृप तव तनय होब मैं आई॥1॥
चौपाई · 2
सतरूपहिं बिलोकि कर जोरें। देबि मागु बरु जो रुचि तोरें॥ जो बरु नाथ चतुर नृप मागा। सोइ कृपाल मोहि अति प्रिय लागा॥2॥
चौपाई · 3
प्रभु परंतु सुठि होति ढिठाई। जदपि भगत हित तुम्हहि सोहाई॥ तुम्ह ब्रह्मादि जनक जग स्वामी। ब्रह्म सकल उर अंतरजामी॥3॥
चौपाई · 4
अस समुझत मन संसय होई। कहा जो प्रभु प्रवान पुनि सोई॥ जे निज भगत नाथ तव अहहीं। जो सुख पावहिं जो गति लहहीं॥4॥
दोहा · 150
सोइ सुख सोइ गति सोइ भगति सोइ निज चरन सनेहु। सोइ बिबेक सोइ रहनि प्रभु हमहि कृपा करि देहु॥150॥
चौपाई · 1
सुनि मृदु गूढ़ रुचिर बर रचना। कृपासिंधु बोले मृदु बचना॥ जो कछु रुचि तुम्हरे मन माहीं। मैं सो दीन्ह सब संसय नाहीं॥1॥
चौपाई · 2
मातु बिबेक अलौकिक तोरें। कबहुँ न मिटिहि अनुग्रह मोरें॥ बंदि चरन मनु कहेउ बहोरी। अवर एक बिनती प्रभु मोरी॥2॥
चौपाई · 3
सुत बिषइक तव पद रति होऊ। मोहि बड़ मूढ़ कहे किन कोऊ॥ मनि बिनु फनि जिमि जल बिनु मीना। मम जीवन तिमि तुम्हहि अधीना॥3॥
चौपाई · 4
अस बरु मागि चरन गहि रहेऊ। एवमस्तु करुनानिधि कहेऊ॥ अब तुम्ह मम अनुसासन मानी। बसहु जाइ सुरपति रजधानी॥4॥
सोरठा · 151
तहँ करि भोग बिसाल तात गएँ कछु काल पुनि। होइहहु अवध भुआल तब मैं होब तुम्हार सुत॥151॥
चौपाई · 1
इच्छामय नरबेष सँवारें। होइहउँ प्रगट निकेत तुम्हारें॥ अंसन्ह सहित देह धरि ताता। करिहउँ चरित भगत सुखदाता॥1॥
चौपाई · 2
जे सुनि सादर नर बड़भागी। भव तरिहहिं ममता मद त्यागी॥ आदिसक्ति जेहिं जग उपजाया। सोउ अवतरिहि मोरि यह माया॥2॥
चौपाई · 3
पुरउब मैं अभिलाष तुम्हारा। सत्य सत्य पन सत्य हमारा॥ पुनि पुनि अस कहि कृपानिधाना। अंतरधान भए भगवाना॥3॥
चौपाई · 4
दंपति उर धरि भगत कृपाला। तेहिं आश्रम निवसे कछु काला॥ समय पाइ तनु तजि अनयासा। जाइ कीन्ह अमरावति बासा॥4॥
दोहा · 152
यह इतिहास पुनीत अति उमहि कही बृषकेतु। भरद्वाज सुनु अपर पुनि राम जनम कर हेतु॥152॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।