बालकाण्ड · 30
रावणादि का जन्म, तपस्या और उनका ऐश्वर्य तथा अत्याचार
बालकाण्ड का प्रकरण 30: रावणादि का जन्म, तपस्या और उनका ऐश्वर्य तथा अत्याचार। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
दोहा · 175
भरद्वाज सुनु जाहि जब होई बिधाता बाम। धूरि मेरुसम जनक जम ताहि ब्यालसम दाम॥175॥
चौपाई · 1
काल पाइ मुनि सुनु सोइ राजा। भयउ निसाचर सहित समाजा॥ दस सिर ताहि बीस भुजदंडा। रावन नाम बीर बरिबंडा॥1॥
चौपाई · 2
भूप अनुज अरिमर्दन नामा। भयउ सो कुंभकरन बलधामा॥ सचिव जो रहा धरमरुचि जासू। भयउ बिमात्र बंधु लघु तासू॥2॥
चौपाई · 3
नाम बिभीषन जेहि जग जाना। बिष्नुभगत बिग्यान निधाना॥ रहे जे सुत सेवक नृप केरे। भए निसाचर घोर घनेरे॥3॥
चौपाई · 4
कामरुप खल जिनस अनेका। कुटिल भयंकर बिगत बिबेका॥ कृपा रहित हिंसक सब पापी। बरनि न जाहिं बिस्व परितापी॥4॥
दोहा · 176
उपजे जदपि पुलस्त्यकुल पावन अमल अनूप। तदपि महीसुर श्राप बस भए सकल अघरुप॥176॥
चौपाई · 1
कीन्ह बिबिध तप तीनिहुँ भाई। परम उग्र नहिं बरनि सो जाई॥ गयउ निकट तप देखि बिधाता। मागहु बर प्रसन्न मैं ताता॥1॥
चौपाई · 2
करि बिनती पद गहि दससीसा। बोलेउ बचन सुनहु जगदीसा॥ हम काहू के मरहिं न मारें। बानर मनुज जाति दुइ बारें॥2॥
चौपाई · 3
एवमस्तु तुम्ह बड़ तप कीन्हा। मैं ब्रह्माँ मिलि तेहि बर दीन्हा॥ पुनि प्रभु कुंभकरन पहिं गयऊ। तेहि बिलोकि मन बिसमय भयऊ॥3॥
चौपाई · 4
जौं एहिं खल नित करब अहारु। होइहि सब उजारि संसारु॥ सारद प्रेरि तासु मति फेरी। मागेसि नीद मास षट केरी॥4॥
दोहा · 177
गए बिभीषन पास पुनि कहेउ पुत्र बर मागु। तेहिं मागेउ भगवंत पद कमल अमल अनुरागु॥177॥
चौपाई · 1
तिन्हहि देइ बर ब्रह्म सिधाए। हरषित ते अपने गृह आए॥ मय तनुजा मंदोदरि नामा। परम सुंदरी नारि ललामा॥1॥
चौपाई · 2
सोइ मयँ दीन्हि रावनहि आनी। होइहि जातुधानपति जानी॥ हरषित भयउ नारि भलि पाई। पुनि दोउ बंधु बिआहेसि जाई॥2॥
चौपाई · 3
गिरि त्रिकूट एक सिंधु मझारी। बिधि निर्मित दुर्गम अति भारी॥ सोइ मय दानवँ बहुरि सँवारा। कनक रचित मनि भवन अपारा॥3॥
चौपाई · 4
भोगावति जसि अहिकुल बासा। अमरावति जसि सक्रनिवासा॥ तिन्ह तें अधिक रम्य अति बंका। जग बिख्यात नाम तेहि लंका॥4॥
दोहा
खाईं सिंधु गभीर अति चारिहुँ दिसि फिरि आव। कनक कोट मनि खचित दृढ़ बरनि न जाइ बनाव॥178 क॥
दोहा
हरि प्रेरित जेहिं कलप जोइ जातुधानपति होइ। सूर प्रतापी अतुलबल दल समेत बस सोइ॥178 ख॥
चौपाई · 1
रहे तहाँ निसिचर भट भारे। ते सब सुरन्ह समर संघारे॥ अब तहँ रहहिं सक्र के प्रेरे। रच्छक कोटि जच्छपति केरे॥1॥
चौपाई · 2
दसमुख कतहुँ खबरि असि पाई। सेन साजि गढ़ घेरेसि जाई॥ देखि बिकट भट बड़ि कटकाई। जच्छ जीव लै गए पराई॥2॥
चौपाई · 3
फिरि सब नगर दसानन देखा। गयउ सोच सुख भयउ बिसेषा॥ सुंदर सहज अगम अनुमानी। कीन्हि तहाँ रावन रजधानी॥3॥
चौपाई · 4
जेहि जस जोग बाँटि गृह दीन्हे। सुखी सकल रजनीचर कीन्हें॥ एक बार कुबेर पर धावा। पुष्पक जान जीति लै आवा॥4॥
दोहा · 179
कौतुकहीं कैलास पुनि लीन्हेसि जाइ उठाइ। मनहुँ तौलि निज बाहुबल चला बहुत सुख पाइ॥179॥
चौपाई · 1
सुख संपति सुत सेन सहाई। जय प्रताप बल बुद्धि बड़ाई॥ नित नूतन सब बाढ़त जाई। जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई॥1॥
चौपाई · 2
अतिबल कुंभकरन अस भ्राता। जेहि कहुँ नहिं प्रतिभट जग जाता॥ करइ पान सोवइ षट मासा। जागत होइ तिहूँ पुर त्रासा॥2॥
चौपाई · 3
जौं दिन प्रति अहार कर सोई। बिस्व बेगि सब चौपट होई॥ समर धीर नहिं जाइ बखाना। तेहि सम अमित बीर बलवाना॥3॥
चौपाई · 4
बारिदनाद जेठ सुत तासू। भट महुँ प्रथम लीक जग जासू॥ जेहि न होइ रन सनमुख कोई। सुरपुर नितहिं परावन होई॥4॥
दोहा · 180
कुमुख अकंपन कुलिसरद धूमकेतु अतिकाय। एक एक जग जीति सक ऐसे सुभट निकाय॥180॥
चौपाई · 1
कामरुप जानहिं सब माया। सपनेहुँ जिन्ह कें धरम न दाया॥ दसमुख बैठ सभाँ एक बारा। देखि अमित आपन परिवारा॥1॥
चौपाई · 2
सुत समूह जन परिजन नाती। गनै को पार निसाचर जाती॥ सेन बिलोकि सहज अभिमानी। बोला बचन क्रोध मद सानी॥2॥
चौपाई · 3
सुनहु सकल रजनीचर जूथा। हमरे बैरी बिबुध बरुथा॥ ते सनमुख नहिं करहिं लराई। देखि सबल रिपु जाहिं पराई॥3॥
चौपाई · 4
तेन्ह कर मरन एक बिधि होई। कहउँ बुझाइ सुनहु अब सोई॥ द्विजभोजन मख होम सराधा। सब कै जाइ करहु तुम्ह बाधा॥4॥
दोहा · 181
छुधा छीन बलहीन सुर सहजेहिं मिलिहहिं आइ। तब मारिहउँ कि छाड़िहउँ भली भाँति अपनाइ॥181॥
चौपाई · 1
मेघनाद कहूँ पुनि हँकरावा। दीन्हीं सिख बलु बयरु बढ़ावा॥ जे सुर समर धीर बलवाना। जिन्ह कें लरिबे कर अभिमाना॥1॥
चौपाई · 2
तिन्हहि जीति रन आनेसु बाँधी। उठि सुत पितु अनुसासन काँघी॥ एहि बिधि सबही अग्या दीन्हीं। आपुनु चलेउ गदा कर लीन्ही॥2॥
चौपाई · 3
चलत दसानन डोलति अवनी। गर्जत गर्भ स्रवहिं सुर रवनी॥ रावन आवत सुनेउ सकोहा। देवन्ह तके मेरु गिरि खोहा॥3॥
चौपाई · 4
दिगपालन्ह के लोक सुहाए। सूने सकल दसानन पाए॥ पुनि पुनि सिंघनाद करि भारी। देइ देवतन्ह गारि पचारी॥4॥
चौपाई · 5
रन मद मत्त फिरइ जग धावा। प्रतिभट खोजत कतहुँ न पावा॥ रबि ससि पवन बरुन धनधारी। अगिनि काल जम सब अधिकारी॥5॥
चौपाई · 6
किंनर सिद्ध मनुज सुर नागा। हठि सबही के पंथहिं लागा॥ ब्रह्मसृष्टि जहँ लगि तनुधारी। दसमुख बसबर्ती नर नारी॥6॥
चौपाई · 7
आयसु करहिं सकल भयभीता। नवहिं आइ नित चरन बिनीता॥7॥
दोहा
भुजबल बिस्व बस्य करि राखेसि कोउ न सुतंत्र। मंडलीक मनि रावन राज करइ निज मंत्र॥182 क॥
दोहा
देव जच्छ गंधर्ब नर किंनर नाग कुमारि। जीति बरीं निज बाहु बल बहु सुंदर बर नारि॥182 ख॥
चौपाई · 1
इंद्रजीत सन जो कछु कहेऊ। सो सब जनु पहिलेहिं करि रहेऊ॥ प्रथमहिं जिन्ह कहुँ आयसु दीन्हा। तिन्ह कर चरित सुनहु जो कीन्हा॥1॥
चौपाई · 2
देखत भीमरूप सब पापी। निसिचर निकर देव परितापी॥ करहिं उपद्रव असुर निकाया। नाना रुप धरहिं करि माया॥2॥
चौपाई · 3
जेहि बिधि होइ धर्म निर्मूला। सो सब करहिं बेद प्रतिकूला॥ जेहिं जेहिं देस धेनु द्विज पावहिं। नगर गाउँ पुर आगि लगावहिं॥3॥
चौपाई · 4
सुभ आचरन कतहुँ नहिं होई। देव बिप्र गुरु मान न कोई॥ नहिं हरिभगति जग्य तप ग्याना। सपनेहु सुनिअ न बेद पुराना॥4॥
छन्द
जप जोग बिरागा तप मख भागा श्रवन सुनइ दससीसा। आपुनु उठि धावइ रहै न पावइ धरि सब घालइ खीसा॥ अस भ्रष्ट अचारा भा संसारा धर्म सुनिअ नहिं काना। तेहि बहुबिधि त्रासइ देस निकासइ जो कह बेद पुराना॥
सोरठा · 183
बरनि न जाइ अनीति घोर निसाचर जो करहिं। हिंसा पर अति प्रीति तिन्ह के पापहि कवनि मिति॥183॥
चौपाई · 1
बाढ़े खल बहु चोर जुआरा। जे लंपट परधन परदारा॥ मानहिं मातु पिता नहिं देवा। साधुन्ह सन करवावहिं सेवा॥1॥
चौपाई · 2
जिन्ह के यह आचरन भवानी। ते जानेहु निसिचर सब प्रानी॥ अतिसय देखि धर्म कै ग्लानी। परम सभीत धरा अकुलानी॥2॥
चौपाई · 3
गिरि सरि सिंधु भार नहिं मोही। जस मोहि गरुअ एक परद्रोही। सकल धर्म देखइ बिपरीता। कहि न सकइ रावन भय भीता॥3॥
चौपाई · 4
धेनु रूप धरि हृदयँ बिचारी। गई तहाँ जहँ सुर मुनि झारी॥ निज संताप सुनाएसि रोई। काहू तें कछु काज न होई॥4॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।