बालकाण्ड · 27

विश्वमोहिनी का स्वयंवर, शिवगणों तथा भगवान को नारद जी का शाप तथा उनका मोह भंग

बालकाण्ड का प्रकरण 27: विश्वमोहिनी का स्वयंवर, शिवगणों तथा भगवान को नारद जी का शाप तथा उनका मोह भंग। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।

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दोहा · 130

आनि देखाई नारदहि भूपति राजकुमारि। कहहु नाथ गुन दोष सब एहि के हृदयँ बिचारि॥130॥

चौपाई · 1

देखि रूप मुनि बिरति बिसारी। बड़ी बार लगि रहे निहारी॥ लच्छन तासु बिलोकि भुलाने। हृदयँ हरष नहिं प्रगट बखाने॥1॥

चौपाई · 2

जो एहि बरइ अमर सोइ होई। समरभूमि तेहि जीत न कोई॥ सेवहिं सकल चराचर ताही। बरइ सीलनिधि कन्या जाही॥2॥

चौपाई · 3

लच्छन सब बिचारि उर राखे। कछुक बनाइ भूप सन भाषे॥ सुता सुलच्छन कहि नृप पाहीं। नारद चले सोच मन माहीं॥3॥

चौपाई · 4

करौं जाइ सोइ जतन बिचारी। जेहि प्रकार मोहि बरै कुमारी॥ जप तप कछु न होइ तेहि काला। हे बिधि मिलइ कवन बिधि बाला॥4॥

दोहा · 131

एहि अवसर चाहिअ परम सोभा रूप बिसाल। जो बिलोकि रीझै कुअँरि तब मेलै जयमाल॥131॥

चौपाई · 1

हरि सन मागौं सुंदरताई। होइहि जात गहरु अति भाई॥ मोरें हित हरि सम नहिं कोऊ। एहि अवसर सहाय सोइ होऊ॥1॥

चौपाई · 2

बहुबिधि बिनय कीन्हि तेहि काला। प्रगटेउ प्रभु कौतुकी कृपाला॥ प्रभु बिलोकि मुनि नयन जुड़ाने। होइहि काजु हिएँ हरषाने॥2॥

चौपाई · 3

अति आरति कहि कथा सुनाई। करहु कृपा करि होहु सहाई॥ आपन रूप देहु प्रभु मोहीं। आन भाँति नहिं पावौं ओही॥3॥

चौपाई · 4

जेहि बिधि नाथ होइ हित मोरा। करहु सो बेगि दास मैं तोरा॥ निज माया बल देखि बिसाला। हियँ हँसि बोले दीनदयाला॥4॥

दोहा · 132

जेहि बिधि होइहि परम हित नारद सुनहु तुम्हार। सोइ हम करब न आन कछु बचन न मृषा हमार॥132॥

चौपाई · 1

कुपथ माग रुज ब्याकुल रोगी। बैद न देइ सुनहु मुनि जोगी॥ एहि बिधि हित तुम्हार मैं ठयऊ। कहि अस अंतरहित प्रभु भयऊ॥1॥

चौपाई · 2

माया बिबस भए मुनि मूढ़ा। समुझी नहिं हरि गिरा निगूढ़ा॥ गवने तुरत तहाँ रिषिराई। जहाँ स्वयंबर भूमि बनाई॥2॥

चौपाई · 3

निज निज आसन बैठे राजा। बहु बनाव करि सहित समाजा॥ मुनि मन हरष रूप अति मोरें। मोहि तजि आनहि बरिहि न भोरें॥3॥

चौपाई · 4

मुनि हित कारन कृपानिधाना। दीन्ह कुरूप न जाइ बखाना॥ सो चरित्र लखि काहुँ न पावा। नारद जानि सबहिं सिर नावा॥4॥

दोहा · 133

रहे तहाँ दुइ रुद्र गन ते जानहिं सब भेउ। बिप्रबेष देखत फिरहिं परम कौतुकी तेउ॥133॥

चौपाई · 1

जेहिं समाज बैठे मुनि जाई। हृदयँ रूप अहमिति अधिकाई॥ तहँ बैठे महेस गन दोऊ। बिप्रबेष गति लखइ न कोऊ॥1॥

चौपाई · 2

करहिं कूटि नारदहि सुनाई। नीकि दीन्हि हरि सुंदरताई॥ रीझिहि राजकुअँरि छबि देखी। इन्हहि बरिहि हरि जानि बिसेषी॥2॥

चौपाई · 3

मुनिहि मोह मन हाथ पराएँ। हँसहिं संभु गन अति सचु पाएँ॥ जदपि सुनहिं मुनि अटपटि बानी। समुझि न परइ बुद्धि भ्रम सानी॥3॥

चौपाई · 4

काहुँ न लखा सो चरित बिसेषा। सो सरूप नृपकन्याँ देखा॥ मर्कट बदन भयंकर देही। देखत हृदयँ क्रोध भा तेही॥4॥

दोहा · 134

सखीं संग लै कुअँरि तब चलि जनु राजमराल। देखत फिरइ महीप सब कर सरोज जयमाल॥134॥

चौपाई · 1

जेहि दिसि बैठे नारद फूली। सो दिसि तेहिं न बिलोकी भूली॥ पुनि-पुनि मुनि उकसहिं अकुलाहीं। देखि दसा हर गन मुसुकाहीं॥1॥

चौपाई · 2

धरि नृपतनु तहँ गयउ कृपाला। कुअँरि हरषि मेलेउ जयमाला॥ दुलहिनि लै गे लच्छिनिवासा। नृपसमाज सब भयउ निरासा॥2॥

चौपाई · 3

मुनि अति बिकल मोहँ मति नाठी। मनि गिरि गई छूटि जनु गाँठी॥ तब हर गन बोले मुसुकाई। निज मुख मुकुर बिलोकहु जाई॥3॥

चौपाई · 4

अस कहि दोउ भागे भयँ भारी। बदन दीख मुनि बारि निहारी॥ बेषु बिलोकि क्रोध अति बाढ़ा। तिन्हहि सराप दीन्ह अति गाढ़ा॥4॥

दोहा

होहु निसाचर जाइ तुम्ह कपटी पापी दोउ। हँसेहु हमहि सो लेहु फल बहुरि हँसेहु मुनि कोउ॥।135॥

चौपाई · 1

पुनि जल दीख रूप निज पावा। तदपि हृदयँ संतोष न आवा॥ फरकत अधर कोप मन माहीं। सपदि चले कमलापति पाहीं॥1॥

चौपाई · 2

देहउँ श्राप कि मरिहउँ जाई। जगत मोरि उपहास कराई॥ बीचहिं पंथ मिले दनुजारी। संग रमा सोइ राजकुमारी॥2॥

चौपाई · 3

बोले मधुर बचन सुरसाईं। मुनि कहँ चले बिकल की नाईं॥ सुनत बचन उपजा अति क्रोधा। माया बस न रहा मन बोधा॥3॥

चौपाई · 4

पर संपदा सकहु नहिं देखी। तुम्हरें इरिषा कपट बिसेषी॥ मथत सिंधु रुद्रहि बौरायहु। सुरन्ह प्रेरि बिष पान करायहु॥4॥

दोहा · 136

असुर सुरा बिष संकरहि आपु रमा मनि चारु। स्वारथ साधक कुटिल तुम्ह सदा कपट ब्यवहारु॥136॥

चौपाई · 1

परम स्वतंत्र न सिर पर कोई। भावइ मनहि करहु तुम्ह सोई॥ भलेहि मंद मंदेहि भल करहू। बिसमय हरष न हियँ कछु धरहू॥1॥

चौपाई · 2

डहकि डहकि परिचेहु सब काहू। अति असंक मन सदा उछाहू॥ करम सुभासुभ तुम्हहि न बाधा। अब लगि तुम्हहि न काहूँ साधा॥2॥

चौपाई · 3

भले भवन अब बायन दीन्हा। पावहुगे फल आपन कीन्हा॥ बंचेहु मोहि जवनि धरि देहा। सोइ तनु धरहु श्राप मम एहा॥3॥

चौपाई · 4

कपि आकृति तुम्ह कीन्हि हमारी। करिहहिं कीस सहाय तुम्हारी॥ मम अपकार कीन्ह तुम्ह भारी। नारि बिरहँ तुम्ह होब दुखारी॥4॥

दोहा · 137

श्राप सीस धरि हरषि हियँ प्रभु बहु बिनती कीन्हि॥ निज माया कै प्रबलता करषि कृपानिधि लीन्हि॥137॥

चौपाई · 1

जब हरि माया दूरि निवारी। नहिं तहँ रमा न राजकुमारी॥ तब मुनि अति सभीत हरि चरना। गहे पाहि प्रनतारति हरना॥1॥

चौपाई · 2

मृषा होउ मम श्राप कृपाला। मम इच्छा कह दीनदयाला॥ मैं दुर्बचन कहे बहुतेरे। कह मुनि पाप मिटिहिं किमि मेरे॥2॥

चौपाई · 3

जपहु जाइ संकर सत नामा। होइहि हृदयँ तुरत बिश्रामा॥ कोउ नहिं सिव समान प्रिय मोरें। असि परतीति तजहु जनि भोरें॥3॥

चौपाई · 4

जेहि पर कृपा न करहिं पुरारी। सो न पाव मुनि भगति हमारी॥ अस उर धरि महि बिचरहु जाई। अब न तुम्हहि माया निअराई॥4॥

दोहा · 138

बहुबिधि मुनिहि प्रबोधि प्रभु तब भए अंतरधान। सत्यलोक नारद चले करत राम गुन गान॥138॥

चौपाई · 1

हर गन मुनिहि जात पथ देखी। बिगत मोह मन हरष बिसेषी॥ अति सभीत नारद पहिं आए। गहि पद आरत बचन सुहाए॥1॥

चौपाई · 2

हर गन हम न बिप्र मुनिराया। बड़ अपराध कीन्ह फल पाया॥ श्राप अनुग्रह करहु कृपाला। बोले नारद दीनदयाला॥2॥

चौपाई · 3

निसिचर जाइ होहु तुम्ह दोऊ। बैभव बिपुल तेज बल होऊ॥ भुज बल बिस्व जितब तुम्ह जहिआ। धरिहहिं बिष्नु मनुज तनु तहिआ॥3॥

चौपाई · 4

समर मरन हरि हाथ तुम्हारा। होइहहु मुकुत न पुनि संसारा॥ चले जुगल मुनि पद सिर नाई। भए निसाचर कालहि पाई॥4॥

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गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।