बालकाण्ड · 26
नारद जी का अभिमान और माया का प्रभाव
बालकाण्ड का प्रकरण 26: नारद जी का अभिमान और माया का प्रभाव। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
दोहा · 127
संभु दीन्ह उपदेस हित नहिं नारदहि सोहान॥ भरद्वाज कौतुक सुनहु हरि इच्छा बलवान॥127॥
चौपाई · 1
राम कीन्ह चाहहिं सोइ होई। करै अन्यथा अस नहिं कोई॥ संभु बचन मुनि मन नहिं भाए। तब बिरंचि के लोक सिधाए॥1॥
चौपाई · 2
एक बार करतल बर बीना। गावत हरि गुन गान प्रबीना॥ छीरसिंधु गवने मुनिनाथा। जहँ बस श्रीनिवास श्रुतिमाथा॥2॥
चौपाई · 3
हरषि मिले उठि रमानिकेता। बैठे आसन रिषिहि समेता॥ बोले बिहसि चराचर राया। बहुते दिनन कीन्हि मुनि दाया॥3॥
चौपाई · 4
काम चरित नारद सब भाषे। जद्यपि प्रथम बरजि सिवँ राखे॥ अति प्रचंड रघुपति कै माया। जेहि न मोह अस को जग जाया॥4॥
दोहा · 128
रूख बदन करि बचन मृदु बोले श्रीभगवान। तुम्हरे सुमिरन तें मिटहिं मोह मार मद मान॥128॥
चौपाई · 1
सुनु मुनि मोह होइ मन ताकें। ग्यान बिराग हृदय नहिं जाकें॥ ब्रह्मचरज ब्रत रत मतिधीरा। तुम्हहि कि करइ मनोभव पीरा॥1॥
चौपाई · 2
नारद कहेउ सहित अभिमाना। कृपा तुम्हारि सकल भगवाना॥ करुनानिधि मन दीख बिचारी। उर अंकुरेउ गरब तरु भारी॥2॥
चौपाई · 3
बेगि सो मैं डारिहउँ उखारी। पन हमार सेवक हितकारी॥ मुनि कर हित मम कौतुक होई। अवसि उपाय करबि मैं सोई॥3॥
चौपाई · 4
तब नारद हरि पद सिर नाई। चले हृदयँ अहमिति अधिकाई॥ श्रीपति निज माया तब प्रेरी। सुनहु कठिन करनी तेहि केरी॥4॥
दोहा · 129
बिरचेउ मग महुँ नगर तेहिं सत जोजन बिस्तार। श्रीनिवासपुर तें अधिक रचना बिबिध प्रकार॥129॥
चौपाई · 1
बसहिं नगर सुंदर नर नारी। जनु बहु मनसिज रति तनुधारी॥ तेहिं पुर बसइ सीलनिधि राजा। अगनित हय गय सेन समाजा॥1॥
चौपाई · 2
सत सुरेस सम बिभव बिलासा। रूप तेज बल नीति निवासा॥ बिस्वमोहनी तासु कुमारी। श्री बिमोह जिसु रूपु निहारी॥2॥
चौपाई · 3
सोइ हरिमाया सब गुन खानी। सोभा तासु कि जाइ बखानी॥ करइ स्वयंबर सो नृपबाला। आए तहँ अगनित महिपाला॥3॥
चौपाई · 4
मुनि कौतुकी नगर तेहि गयऊ। पुरबासिन्ह सब पूछत भयऊ॥ सुनि सब चरित भूपगृहँ आए। करि पूजा नृप मुनि बैठाए॥4॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।