बालकाण्ड · 25
श्रीराम अवतार के हेतु
बालकाण्ड का प्रकरण 25: श्रीराम अवतार के हेतु। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
दोहा · 121
असुर मारि थापहिं सुरन्ह राखहिं निज श्रुति सेतु। जग बिस्तारहिं बिसद जस राम जन्म कर हेतु॥121॥
चौपाई · 1
सोइ जस गाइ भगत भव तरहीं। कृपासिंधु जन हित तनु धरहीं॥ राम जनम के हेतु अनेका। परम बिचित्र एक तें एका॥1॥
चौपाई · 2
जनम एक दुइ कहउँ बखानी। सावधान सुनु सुमति भवानी॥ द्वारपाल हरि के प्रिय दोऊ। जय अरु बिजय जान सब कोऊ॥2॥
चौपाई · 3
बिप्र श्राप तें दूनउ भाई। तामस असुर देह तिन्ह पाई॥ कनककसिपु अरु हाटकलोचन। जगत बिदित सुरपति मद मोचन॥3॥
चौपाई · 4
बिजई समर बीर बिख्याता। धरि बराह बपु एक निपाता॥ होइ नरहरि दूसर पुनि मारा। जन प्रहलाद सुजस बिस्तारा॥4॥
दोहा · 122
भए निसाचर जाइ तेइ महाबीर बलवान। कुंभकरन रावन सुभट सुर बिजई जग जान॥122॥
चौपाई · 1
मुकुत न भए हते भगवाना। तीनि जनम द्विज बचन प्रवाना॥ एक बार तिन्ह के हित लागी। धरेउ सरीर भगत अनुरागी॥1॥
चौपाई · 2
कस्यप अदिति तहाँ पितु माता। दसरथ कौसल्या बिख्याता॥ एक कलप एहि बिधि अवतारा। चरित पवित्र किए संसारा॥2॥
चौपाई · 3
एक कलप सुर देखि दुखारे। समर जलंधर सन सब हारे॥ संभु कीन्ह संग्राम अपारा। दनुज महाबल मरइ न मारा॥3॥
चौपाई · 4
परम सती असुराधिप नारी। तेहिं बल ताहि न जितहिं पुरारी॥4॥
दोहा · 123
छल करि टारेउ तासु ब्रत प्रभु सुर कारज कीन्ह। जब तेहिं जानेउ मरम तब श्राप कोप करि दीन्ह॥123॥
चौपाई · 1
तासु श्राप हरि दीन्ह प्रमाना। कौतुकनिधि कृपाल भगवाना॥ तहाँ जलंधर रावन भयऊ। रन हति राम परम पद दयऊ॥1॥
चौपाई · 2
एक जनम कर कारन एहा। जेहि लगि राम धरी नरदेहा॥ प्रति अवतार कथा प्रभु केरी। सुनु मुनि बरनी कबिन्ह घनेरी॥2॥
चौपाई · 3
नारद श्राप दीन्ह एक बारा। कलप एक तेहि लगि अवतारा॥ गिरिजा चकित भईं सुनि बानी। नारद बिष्नुभगत पुनि ग्यानी॥3॥
चौपाई · 4
कारन कवन श्राप मुनि दीन्हा। का अपराध रमापति कीन्हा॥ यह प्रसंग मोहि कहहु पुरारी। मुनि मन मोह आचरज भारी॥4॥
दोहा
बोले बिहसि महेस तब ग्यानी मूढ़ न कोइ। जेहि जस रघुपति करहिं जब सो तस तेहि छन होइ॥124 क॥
दोहा
कहउँ राम गुन गाथ भरद्वाज सादर सुनहु। भव भंजन रघुनाथ भजु तुलसी तजि मान मद॥124 ख॥
चौपाई · 1
हिमगिरि गुहा एक अति पावनि। बह समीप सुरसरी सुहावनि॥ आश्रम परम पुनीत सुहावा। देखि देवरिषि मन अति भावा॥1॥
चौपाई · 2
निरखि सैल सरि बिपिन बिभागा। भयउ रमापति पद अनुरागा॥ सुमिरत हरिहि श्राप गति बाधी। सहज बिमल मन लागि समाधी॥2॥
चौपाई · 3
मुनि गति देखि सुरेस डेराना। कामहि बोलि कीन्ह सनमाना॥ सहित सहाय जाहु मम हेतू। चलेउ हरषि हियँ जलचरकेतू॥3॥
चौपाई · 4
सुनासीर मन महुँ असि त्रासा। चहत देवरिषि मम पुर बासा॥ जे कामी लोलुप जग माहीं। कुटिल काक इव सबहि डेराहीं॥4॥
दोहा · 125
सूख हाड़ लै भाग सठ स्वान निरखि मृगराज। छीनि लेइ जनि जान जड़ तिमि सुरपतिहि न लाज॥125॥
चौपाई · 1
तेहि आश्रमहिं मदन जब गयऊ। निज मायाँ बसंत निरमयऊ॥ कुसुमित बिबिध बिटप बहुरंगा। कूजहिं कोकिल गुंजहिं भृंगा॥1॥
चौपाई · 2
चली सुहावनि त्रिबिध बयारी। काम कृसानु बढ़ावनिहारी॥ रंभादिक सुर नारि नबीना। सकल असमसर कला प्रबीना॥2॥
चौपाई · 3
करहिं गान बहु तान तरंगा। बहुबिधि क्रीड़हिं पानि पतंगा॥ देखि सहाय मदन हरषाना। कीन्हेसि पुनि प्रपंच बिधि नाना॥3॥
चौपाई · 4
काम कला कछु मुनिहि न ब्यापी। निज भयँ डरेउ मनोभव पापी॥ सीम कि चाँपि सकइ कोउ तासू। बड़ रखवार रमापति जासू॥4॥
दोहा · 126
सहित सहाय सभीत अति मानि हारि मन मैन। गहेसि जाइ मुनि चरन तब कहि सुठि आरत बैन॥126॥
चौपाई · 1
भयउ न नारद मन कछु रोषा। कहि प्रिय बचन काम परितोषा॥ नाइ चरन सिरु आयसु पाई। गयउ मदन तब सहित सहाई॥1॥
दोहा · 2
मुनि सुसीलता आपनि करनी। सुरपति सभाँ जाइ सब बरनी॥ सुनि सब कें मन अचरजु आवा। मुनिहि प्रसंसि हरिहि सिरु नावा॥2॥
दोहा · 3
तब नारद गवने सिव पाहीं। जिता काम अहमिति मन माहीं॥ मार चरति संकरहि सुनाए। अतिप्रिय जानि महेस सिखाए॥3॥
दोहा · 4
बार बार बिनवउँ मुनि तोही। जिमि यह कथा सुनायहु मोही॥ तिमि जनि हरिहि सुनावहु कबहूँ। चलेहुँ प्रसंग दुराएहु तबहूँ॥4॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।