बालकाण्ड · 24

भगवान शिव-पार्वती जी संवाद

बालकाण्ड का प्रकरण 24: भगवान शिव-पार्वती जी संवाद। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।

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दोहा · 106

जटा मुकुट सुरसरित सिर लोचन नलिन बिसाल। नीलकंठ लावन्यनिधि सोह बालबिधु भाल॥106॥

चौपाई · 1

बैठे सोह कामरिपु कैसें। धरें सरीरु सांतरसु जैसें॥ पारबती भल अवसरु जानी। गईं संभु पहिं मातु भवानी॥1॥

चौपाई · 2

जानि प्रिया आदरु अति कीन्हा। बाम भाग आसनु हर दीन्हा॥ बैठीं सिव समीप हरषाई। पूरुब जन्म कथा चित आई॥2॥

चौपाई · 3

पति हियँ हेतु अधिक अनुमानी। बिहसि उमा बोलीं प्रिय बानी॥ कथा जो सकल लोक हितकारी। सोइ पूछन चह सैल कुमारी॥3॥

चौपाई · 4

बिस्वनाथ मम नाथ पुरारी। त्रिभुवन महिमा बिदित तुम्हारी॥ चर अरु अचर नाग नर देवा। सकल करहिं पद पंकज सेवा॥4॥

दोहा · 107

प्रभु समरथ सर्बग्य सिव सकल कला गुन धाम। जोग ग्यान बैराग्य निधि प्रनत कलपतरु नाम॥107॥

चौपाई · 1

जौं मो पर प्रसन्न सुखरासी। जानिअ सत्य मोहि निज दासी॥ तौ प्रभु हरहु मोर अग्याना। कहि रघुनाथ कथा बिधि नाना॥1॥

चौपाई · 2

जासु भवनु सुरतरु तर होई। सहि कि दरिद्र जनित दुखु सोई॥ ससिभूषन अस हृदयँ बिचारी। हरहु नाथ मम मति भ्रम भारी॥2॥

चौपाई · 3

प्रभु जे मुनि परमारथबादी। कहहिं राम कहुँ ब्रह्म अनादी॥ सेस सारदा बेद पुराना। सकल करहिं रघुपति गुन गाना॥3॥

चौपाई · 4

तुम्ह पुनि राम राम दिन राती। सादर जपहु अनँग आराती॥ रामु सो अवध नृपति सुत सोई। की अज अगुन अलखगति कोई॥4॥

दोहा · 108

जौं नृप तनय त ब्रह्म किमि नारि बिरहँ मति भोरि। देखि चरित महिमा सुनत भ्रमति बुद्धि अति मोरि॥108॥

चौपाई · 1

जौं अनीह ब्यापक बिभु कोऊ। कहहु बुझाइ नाथ मोहि सोऊ॥ अग्य जानि रिस उर जनि धरहू। जेहि बिधि मोह मिटै सोइ करहू॥1॥

चौपाई · 2

मैं बन दीखि राम प्रभुताई। अति भय बिकल न तुम्हहि सुनाई॥ तदपि मलिन मन बोधु न आवा। सो फलु भली भाँति हम पावा॥2॥

चौपाई · 3

अजहूँ कछु संसउ मन मोरें। करहु कृपा बिनवउँ कर जोरें॥ प्रभु तब मोहि बहु भाँति प्रबोधा। नाथ सो समुझि करहु जनि क्रोधा॥3॥

चौपाई · 4

तब कर अस बिमोह अब नाहीं। रामकथा पर रुचि मन माहीं॥ कहहु पुनीत राम गुन गाथा। भुजगराज भूषन सुरनाथा॥4॥

दोहा · 109

बंदउँ पद धरि धरनि सिरु बिनय करउँ कर जोरि। बरनहु रघुबर बिसद जसु श्रुति सिद्धांत निचोरि॥109॥

चौपाई · 1

जदपि जोषिता नहिं अधिकारी। दासी मन क्रम बचन तुम्हारी॥ गूढ़उ तत्त्व न साधु दुरावहिं। आरत अधिकारी जहँ पावहिं॥1॥

चौपाई · 2

अति आरति पूछउँ सुरराया। रघुपति कथा कहहु करि दाया॥ प्रथम सो कारन कहहु बिचारी। निर्गुन ब्रह्म सगुन बपु धारी॥2॥

चौपाई · 3

पुनि प्रभु कहहु राम अवतारा। बालचरित पुनि कहहु उदारा॥ कहहु जथा जानकी बिबाहीं। राज तजा सो दूषन काहीं॥3॥

चौपाई · 4

बन बसि कीन्हे चरित अपारा। कहहु नाथ जिमि रावन मारा॥ राज बैठि कीन्हीं बहु लीला। सकल कहहु संकर सुखसीला॥4॥

दोहा · 110

बहुरि कहहु करुनायतन कीन्ह जो अचरज राम। प्रजा सहित रघुबंसमनि किमि गवने निज धाम॥110॥

चौपाई · 1

पुनि प्रभु कहहु सो तत्त्व बखानी। जेहिं बिग्यान मगन मुनि ग्यानी॥ भगति ग्यान बिग्यान बिरागा। पुनि सब बरनहु सहित बिभागा॥1॥

चौपाई · 2

औरउ राम रहस्य अनेका। कहहु नाथ अति बिमल बिबेका॥ जो प्रभु मैं पूछा नहिं होई। सोउ दयाल राखहु जनि गोई॥2॥

चौपाई · 3

तुम्ह त्रिभुवन गुर बेद बखाना। आन जीव पाँवर का जाना॥ प्रस्न उमा कै सहज सुहाई। छल बिहीन सुनि सिव मन भाई॥3॥

चौपाई · 4

हर हियँ रामचरित सब आए। प्रेम पुलक लोचन जल छाए॥ श्रीरघुनाथ रूप उर आवा। परमानंद अमित सुख पावा॥4॥

दोहा · 111

मगन ध्यान रस दंड जुग पुनि मन बाहेर कीन्ह। रघुपति चरित महेस तब हरषित बरनै लीन्ह॥111॥

चौपाई · 1

झूठेउ सत्य जाहि बिनु जानें। जिमि भुजंग बिनु रजु पहिचानें॥ जेहि जानें जग जाइ हेराई। जागें जथा सपन भ्रम जाई॥1॥

चौपाई · 2

बंदउँ बालरूप सोइ रामू। सब सिधि सुलभ जपत जिसु नामू॥ मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवउ सो दसरथ अजिर बिहारी॥2॥

चौपाई · 3

करि प्रनाम रामहि त्रिपुरारी। हरषि सुधा सम गिरा उचारी॥ धन्य धन्य गिरिराजकुमारी। तुम्ह समान नहिं कोउ उपकारी॥3॥

चौपाई · 4

पूँछेहु रघुपति कथा प्रसंगा। सकल लोक जग पावनि गंगा॥ तुम्ह रघुबीर चरन अनुरागी। कीन्हिहु प्रस्न जगत हित लागी॥4॥

दोहा · 112

राम कृपा तें पारबति सपनेहुँ तव मन माहिं। सोक मोह संदेह भ्रम मम बिचार कछु नाहिं॥112॥

चौपाई · 1

तदपि असंका कीन्हिहु सोई। कहत सुनत सब कर हित होई॥ जिन्ह हरिकथा सुनी नहिं काना। श्रवन रंध्र अहिभवन समाना॥1॥

चौपाई · 2

नयनन्हि संत दरस नहिं देखा। लोचन मोरपंख कर लेखा॥ तेसिर कटु तुंबरि समतूला। जे न नमत हरि गुर पद मूला॥2॥

चौपाई · 3

जिन्ह हरिभगति हृदयँ नहिं आनी। जीवत सव समान तेइ प्रानी॥ जो नहिं करइ राम गुन गाना। जीह सो दादुर जीह समाना॥3॥

चौपाई · 4

कुलिस कठोर निठुर सोइ छाती। सुनि हरिचरित न जो हरषाती॥ गिरिजा सुनहु राम कै लीला। सुर हित दनुज बिमोहनसीला॥4॥

दोहा · 113

रामकथा सुरधेनु सम सेवत सब सुख दानि। सतसमाज सुरलोक सब को न सुनै अस जानि॥113॥

चौपाई · 1

रामकथा सुंदर कर तारी। संसय बिहग उड़ावनिहारी॥ रामकथा कलि बिटप कुठारी। सादर सुनु गिरिराजकुमारी॥1॥

चौपाई · 2

राम नाम गुन चरित सुहाए। जनम करम अगनित श्रुति गाए॥ जथा अनंत राम भगवाना। तथा कथा कीरति गुन नाना॥2॥

चौपाई · 3

तदपि जथा श्रुत जसि मति मोरी। कहिहउँ देखि प्रीति अति तोरी॥ उमा प्रस्न तव सहज सुहाई। सुखद संतसंमत मोहि भाई॥3॥

चौपाई · 4

एक बात नहिं मोहि सोहानी। जदपि मोह बस कहेहु भवानी॥ तुम्ह जो कहा राम कोउ आना। जेहि श्रुति गाव धरहिं मुनि ध्याना॥4॥

दोहा · 114

कहहिं सुनहिं अस अधम नर ग्रसे जे मोह पिसाच। पाषंडी हरि पद बिमुख जानहिं झूठ न साच॥114॥

चौपाई · 1

अग्य अकोबिद अंध अभागी। काई बिषय मुकुर मन लागी॥ लंपट कपटी कुटिल बिसेषी। सपनेहुँ संतसभा नहिं देखी॥1॥

चौपाई · 2

कहहिं ते बेद असंमत बानी। जिन्ह कें सूझ लाभु नहिं हानी॥ मुकुर मलिन अरु नयन बिहीना। राम रूप देखहिं किमि दीना॥2॥

चौपाई · 3

जिन्ह कें अगुन न सगुन बिबेका। जल्पहिं कल्पित बचन अनेका॥ हरिमाया बस जगत भ्रमाहीं। तिन्हहि कहत कछु अघटित नाहीं॥3॥

चौपाई · 4

बातुल भूत बिबस मतवारे। ते नहिं बोलहिं बचन बिचारे॥ जिन्ह कृत महामोह मद पाना। तिन्ह कर कहा करिअ नहिं काना॥4॥

सोरठा · 115

अस निज हृदयँ बिचारि तजु संसय भजु राम पद। सुनु गिरिराज कुमारि भ्रम तम रबि कर बचन मम॥115॥

चौपाई · 1

सगुनहि अगुनहि नहिं कछु भेदा। गावहिं मुनि पुरान बुध बेदा॥ अगुन अरूप अलख अज जोई। भगत प्रेम बस सगुन सो होई॥1॥

चौपाई · 2

जो गुन रहित सगुन सोइ कैसें। जलु हिम उपल बिलग नहिं जैसें॥ जासु नाम भ्रम तिमिर पतंगा। तेहि किमि कहिअ बिमोह प्रसंगा॥2॥

चौपाई · 3

राम सच्चिदानंद दिनेसा। नहिं तहँ मोह निसा लवलेसा॥ सहज प्रकासरूप भगवाना। नहिं तहँ पुनि बिग्यान बिहाना॥3॥

चौपाई · 4

हरष बिषाद ग्यान अग्याना। जीव धर्म अहमिति अभिमाना॥ राम ब्रह्म ब्यापक जग जाना। परमानंद परेस पुराना॥4॥

दोहा · 116

पुरुष प्रसिद्ध प्रकाश निधि प्रगट परावर नाथ। रघुकुलमनि मम स्वामि सोइ कहि सिवँ नायउ माथ॥116॥

चौपाई · 1

निज भ्रम नहिं समुझहिं अग्यानी। प्रभु पर मोह धरहिं जड़ प्रानी॥ जथा गगन घन पटल निहारी। झाँपेउ भानु कहहिं कुबिचारी॥1॥

चौपाई · 2

चितव जो लोचन अंगुलि लाएँ। प्रगट जुगल ससि तेहि के भाएँ॥ उमा राम बिषइक अस मोहा। नभ तम धूम धूरि जिमि सोहा॥2॥

चौपाई · 3

बिषय करन सुर जीव समेता। सकल एक तें एक सचेता॥ सब कर परम प्रकासक जोई। राम अनादि अवधपति सोई॥3॥

चौपाई · 4

जगत प्रकास्य प्रकासक रामू। मायाधीस ग्यान गुन धामू॥ जासु सत्यता तें जड़ माया। भास सत्य इव मोह सहाया॥4॥

दोहा · 117

रजत सीप महुँ भास जिमि जथा भानु कर बारि। जदपि मृषा तिहुँ काल सोइ भ्रम न सकइ कोउ टारि॥117॥

चौपाई · 1

एहि बिधि जग हरि आश्रित रहई। जदपि असत्य देत दुख अहई॥ जौं सपनें सिर काटै कोई। बिनु जागें न दूरि दुख होई॥1॥

चौपाई · 2

जासु कृपाँ अस भ्रम मिटि जाई। गिरिजा सोइ कृपाल रघुराई॥ आदि अंत कोउ जासु न पावा। मति अनुमानि निगम अस गावा॥2॥

चौपाई · 3

बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना। कर बिनु करम करइ बिधि नाना॥ आनन रहित सकल रस भोगी। बिनु बानी बकता बड़ जोगी॥3॥

चौपाई · 4

तन बिनु परस नयन बिनु देखा। ग्रहइ घ्रान बिनु बास असेषा॥ असि सब भाँति अलौकिक करनी। महिमा जासु जाइ नहिं बरनी॥4॥

दोहा · 118

जेहि इमि गावहिं बेद बुध जाहि धरहिं मुनि ध्यान। सोइ दसरथ सुत भगत हित कोसलपति भगवान॥118॥

चौपाई · 1

कासीं मरत जंतु अवलोकी। जासु नाम बल करउँ बिसोकी॥ सोइ प्रभु मोर चराचर स्वामी। रघुबर सब उर अंतरजामी॥1॥

चौपाई · 2

बिबसहुँ जासु नाम नर कहहीं। जनम अनेक रचित अघ दहहीं॥ सादर सुमिरन जे नर करहीं। भव बारिधि गोपद इव तरहीं॥2॥

चौपाई · 3

राम सो परमातमा भवानी। तहँ भ्रम अति अबिहित तव बानी॥ अस संसय आनत उर माहीं। ग्यान बिराग सकल गुन जाहीं॥3॥

चौपाई · 4

सुनि सिव के भ्रम भंजन बचना। मिटि गै सब कुतरक कै रचना॥ भइ रघुपति पद प्रीति प्रतीती। दारुन असंभावना बीती॥4॥

दोहा · 119

पुनि पुनि प्रभु पद कमल गहि जोरि पंकरुह पानि। बोलीं गिरिजा बचन बर मनहुँ प्रेम रस सानि॥119॥

चौपाई · 1

ससि कर सम सुनि गिरा तुम्हारी। मिटा मोह सरदातप भारी॥ तुम्ह कृपाल सबु संसउ हरेऊ। राम स्वरूप जानि मोहि परेऊ॥1॥

चौपाई · 2

नाथ कृपाँ अब गयउ बिषादा। सुखी भयउँ प्रभु चरन प्रसादा॥ अब मोहि आपनि किंकरि जानी। जदपि सहज जड़ नारि अयानी॥2॥

चौपाई · 3

प्रथम जो मैं पूछा सोइ कहहू। जौं मो पर प्रसन्न प्रभु अहहू॥ राम ब्रह्म चिनमय अबिनासी। सर्ब रहित सब उर पुर बासी॥3॥

चौपाई · 4

नाथ धरेउ नरतनु केहि हेतू। मोहि समुझाइ कहहु बृषकेतू॥ उमा बचन सुनि परम बिनीता। रामकथा पर प्रीति पुनीता॥4॥

दोहा

हियँ हरषे कामारि तब संकर सहज सुजान। बहु बिधि उमहि प्रसंसि पुनि बोले कृपानिधान॥120 क॥

सोरठा

सुनु सुभ कथा भवानि रामचरितमानस बिमल। कहा भुसुंडि बखानि सुना बिहग नायक गरुड़॥120 ख॥

सोरठा

सो संबाद उदार जेहि बिधि भा आगें कहब। सुनहु राम अवतार चरति परम सुंदर अनघ॥120 ग॥

सोरठा

हरि गुन नाम अपार कथा रूप अगनित अमित। मैं निज मति अनुसार कहउँ उमा सादर सुनहु॥120 घ॥

चौपाई · 1

सुनु गिरिजा हरिचरित सुहाए। बिपुल बिसद निगमागम गाए॥ हरि अवतार हेतु जेहि होई। इदमित्थं कहि जाइ न सोई॥1॥

चौपाई · 2

राम अतर्क्य बुद्धि मन बानी। मत हमार अस सुनहि सयानी॥ तदपि संत मुनि बेद पुराना। जस कछु कहहिं स्वमति अनुमाना॥2॥

चौपाई · 3

तस मैं सुमुखि सुनावउँ तोही। समुझि परइ जस कारन मोही॥ जब जब होई धरम कै हानी। बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी॥3॥

चौपाई · 4

करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी। सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी॥ तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा। हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा॥4॥

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गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।