अयोध्याकाण्ड · 12
श्री राम, लक्ष्मण जी, सीता जी का दशरथ जी से विदा माँगना और वन जाना
अयोध्याकाण्ड का प्रकरण 12: श्री राम, लक्ष्मण जी, सीता जी का दशरथ जी से विदा माँगना और वन जाना। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
चौपाई · 4
सचिवँ उठाइ राउ बैठारे। कहि प्रिय बचन रामु पगु धारे॥ सिय समेत दोउ तनय निहारी। ब्याकुल भयउ भूमिपति भारी॥4॥
दोहा · 76
सीय सहित सुत सुभग दोउ देखि देखि अकुलाइ। बारहिं बार सनेह बस राउ लेइ उर लाइ॥76॥
चौपाई · 1
सकइ न बोलि बिकल नरनाहू। सोक जनित उर दारुन दाहू॥ नाइ सीसु पद अति अनुरागा। उठि रघुबीर बिदा तब मागा॥1॥
चौपाई · 2
पितु असीस आयसु मोहि दीजै। हरष समय बिसमउ कत कीजै॥ तात किएँ प्रिय प्रेम प्रमादू। जसु जग जाइ होइ अपबादू॥2॥
चौपाई · 3
सुनि सनेह बस उठि नरनाहाँ। बैठारे रघुपति गहि बाहाँ॥ सुनहु तात तुम्ह कहुँ मुनि कहहीं। रामु चराचर नायक अहहीं॥3॥
चौपाई · 4
सुभ अरु असुभ करम अनुहारी। ईसु देइ फलु हृदयँ बिचारी॥ करइ जो करम पाव फल सोई। निगम नीति असि कह सबु कोई॥4॥
दोहा · 77
औरु करै अपराधु कोउ और पाव फल भोगु। अति बिचित्र भगवंत गति को जग जानै जोगु॥77॥
चौपाई · 1
रायँ राम राखन हित लागी। बहुत उपाय किए छलु त्यागी॥ लखी राम रुख रहत न जाने। धरम धुरंधर धीर सयाने॥1॥
चौपाई · 2
तब नृप सीय लाइ उर लीन्ही। अति हित बहुत भाँति सिख दीन्ही॥ कहि बन के दुख दुसह सुनाए। सासु ससुर पितु सुख समुझाए॥2॥
चौपाई · 3
सिय मनु राम चरन अनुरागा। घरुन सुगमु बनु बिषमु न लागा॥ औरउ सबहिं सीय समुझाई। कहि कहि बिपिन बिपति अधिकाई॥3॥
चौपाई · 4
सचिव नारि गुर नारि सयानी। सहित सनेह कहहिं मृदु बानी॥ तुम्ह कहुँ तौ न दीन्ह बनबासू। करहु जो कहहिं ससुर गुर सासू॥4॥
दोहा · 78
सिख सीतलि हित मधुर मृदु सुनि सीतहि न सोहानि। सरद चंद चंदिनि लगत जनु चकई अकुलानि॥78॥
चौपाई · 1
सीय सकुच बस उतरु न देई। सो सुनि तमकि उठी कैकेई॥ मुनि पट भूषन भाजन आनी। आगें धरि बोली मृदु बानी॥1॥
चौपाई · 2
नृपहि प्रानप्रिय तुम्ह रघुबीरा। सील सनेह न छाड़िहि भीरा॥ सुकृतु सुजसु परलोकु नसाऊ। तुम्हहि जान बन कहिहि न काऊ॥2॥
चौपाई · 3
अस बिचारि सोइ करहु जो भावा। राम जननि सिख सुनि सुखु पावा॥ भूपहि बचन बानसम लागे। करहिं न प्रान पयान अभागे॥3॥
चौपाई · 4
लोग बिकल मुरुछित नरनाहू। काह करिअ कछु सूझ न काहू॥ रामु तुरत मुनि बेषु बनाई। चले जनक जननिहि सिरु नाई॥4॥
दोहा · 79
सजि बन साजु समाजु सबु बनिता बंधु समेत। बंदि बिप्र गुर चरन प्रभु चले करि सबहि अचेत॥79॥
चौपाई · 1
निकसि बसिष्ठ द्वार भए ठाढ़े। देखे लोग बिरह दव दाढ़े॥ कहि प्रिय बचन सकल समुझाए। बिप्र बृंद रघुबीर बोलाए॥1॥
चौपाई · 2
गुर सन कहि बरषासन दीन्हे। आदर दान बिनय बस कीन्हे॥ जाचक दान मान संतोषे। मीत पुनीत प्रेम परितोषे॥2॥
चौपाई · 3
दासीं दास बोलाइ बहोरी। गुरहि सौंपि बोले कर जोरी॥ सब कै सार सँभार गोसाईं। करबि जनक जननी की नाईं॥3॥
चौपाई · 4
बारहिं बार जोरि जुग पानी। कहत रामु सब सन मृदु बानी॥ सोइ सब भाँति मोर हितकारी। जेहि तें रहै भुआल सुखारी॥4॥
दोहा · 80
मातु सकल मोरे बिरहँ जेहिं न होहिं दुख दीन। सोइ उपाउ तुम्ह करेहु सब पुर जन परम प्रबीन॥80॥
चौपाई · 1
एहि बिधि राम सबहि समुझावा। गुर पद पदुम हरषि सिरु नावा॥ गनपति गौरि गिरीसु मनाई। चले असीस पाइ रघुराई॥1॥
चौपाई · 2
राम चलत अति भयउ बिषादू। सुनि न जाइ पुर आरत नादू॥ कुसगुन लंक अवध अति सोकू। हरष बिषाद बिबस सुरलोकू॥2॥
चौपाई · 3
गइ मुरुछा तब भूपति जागे। बोलि सुमंत्रु कहन अस लागे॥ रामु चले बन प्रान न जाहीं। केहि सुख लागि रहत तन माहीं॥3॥
चौपाई · 4
एहि तें कवन ब्यथा बलवाना। जो दुखु पाइ तजहिं तनु प्राना॥ पुनि धरि धीर कहइ नरनाहू। लै रथु संग सखा तुम्ह जाहू॥4॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।