अयोध्याकाण्ड · 13

वन गमन और नगर निवासियों को सोए छोड़कर आगे बढ़ना

अयोध्याकाण्ड का प्रकरण 13: वन गमन और नगर निवासियों को सोए छोड़कर आगे बढ़ना। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।

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दोहा · 81

सुठि सुकुमार कुमार दोउ जनकसुता सुकुमारि। रथ चढ़ाइ देखराइ बनु फिरेहु गएँ दिन चारि॥81॥

चौपाई · 1

जौं नहिं फिरहिं धीर दोउ भाई। सत्यसंध दृढ़ब्रत रघुराई॥ तौ तुम्ह बिनय करेहु कर जोरी। फेरिअ प्रभु मिथिलेसकिसोरी॥1॥

चौपाई · 2

जब सिय कानन देखि डेराई। कहेहु मोरि सिख अवसरु पाई॥ सासु ससुर अस कहेउ सँदेसू। पुत्रि फिरिअ बन बहुत कलेसू॥2॥

चौपाई · 3

पितुगृह कबहुँ कबहुँ ससुरारी। रहेहु जहाँ रुचि होइ तुम्हारी॥ एहि बिधि करेहु उपाय कदंबा। फिरइ त होइ प्रान अवलंबा॥3॥

चौपाई · 4

नाहिं त मोर मरनु परिनामा। कछु न बसाइ भएँ बिधि बामा॥ अस कहि मुरुछि परा महि राऊ। रामु लखनु सिय आनि देखाऊ॥4॥

दोहा · 82

पाइ रजायसु नाइ सिरु रथु अति बेग बनाइ। गयउ जहाँ बाहेर नगर सीय सहित दोउ भाइ॥82॥

चौपाई · 1

तब सुमंत्र नृप बचन सुनाए। करि बिनती रथ रामु चढ़ाए॥ चढ़ि रथ सीय सहित दोउ भाई। चले हृदयँ अवधहि सिरु नाई॥1॥

चौपाई · 2

चलत रामु लखि अवध अनाथा। बिकल लोग सब लागे साथा॥ कृपासिंधु बहुबिधि समुझावहिं। फिरहिं प्रेम बस पुनि फिरि आवहिं॥2॥

चौपाई · 3

लागति अवध भयावनि भारी। मानहुँ कालराति अँधिआरी॥ घोर जंतु सम पुर नर नारी। डरपहिं एकहि एक निहारी॥3॥

चौपाई · 4

घर मसान परिजन जनु भूता। सुत हित मीत मनहुँ जमदूता॥ बागन्ह बिटप बेलि कुम्हिलाहीं। सरित सरोवर देखि न जाहीं॥4॥

दोहा · 83

हय गय कोटिन्ह केलिमृग पुरपसु चातक मोर। पिक रथांग सुक सारिका सारस हंस चकोर॥83॥

चौपाई · 1

राम बियोग बिकल सब ठाढ़े। जहँ तहँ मनहुँ चित्र लिखि काढ़े॥ नगरु सफल बनु गहबर भारी। खग मृग बिपुल सकल नर नारी॥1॥

चौपाई · 2

बिधि कैकई किरातिनि कीन्ही। जेहिं दव दुसह दसहुँ दिसि दीन्ही॥ सहि न सके रघुबर बिरहागी। चले लोग सब ब्याकुल भागी॥2॥

चौपाई · 3

सबहिं बिचारु कीन्ह मन माहीं। राम लखन सिय बिनु सुखु नाहीं॥ जहाँ रामु तहँ सबुइ समाजू। बिनु रघुबीर अवध नहिं काजू॥3॥

चौपाई · 4

चले साथ अस मंत्रु दृढ़ाई। सुर दुर्लभ सुख सदन बिहाई॥ राम चरन पंकज प्रिय जिन्हही। बिषय भोग बस करहिं कि तिन्हही॥4॥

दोहा · 84

बालक बृद्ध बिहाइ गृहँ लगे लोग सब साथ। तमसा तीर निवासु किय प्रथम दिवस रघुनाथ॥84॥

चौपाई · 1

रघुपति प्रजा प्रेमबस देखी। सदय हृदयँ दुखु भयउ बिसेषी॥ करुनामय रघुनाथ गोसाँई। बेगि पाइअहिं पीर पराई॥1॥

चौपाई · 2

कहि सप्रेम मृदु बचन सुहाए। बहुबिधि राम लोग समुझाए॥ किए धरम उपदेस घनेरे। लोग प्रेम बस फिरहिं न फेरे॥2॥

चौपाई · 3

सीलु सनेहु छाड़ि नहिं जाई। असमंजस बस भे रघुराई॥ लोग सोग श्रम बस गए सोई। कछुक देवमायाँ मति मोई॥3॥

चौपाई · 4

जबहिं जाम जुग जामिनि बीती। राम सचिव सन कहेउ सप्रीती॥ खोज मारि रथु हाँकहु ताता। आन उपायँ बनिहि नहिं बाता॥4॥

दोहा · 85

राम लखन सिय जान चढ़ि संभु चरन सिरु नाइ। सचिवँ चलायउ तुरत रथु इत उत खोज दुराइ॥85॥

चौपाई · 1

जागे सकल लोग भएँ भोरू। गे रघुनाथ भयउ अति सोरू॥ रथ कर खोज कतहुँ नहिं पावहिं। राम राम कहि चहुँ दिसि धावहिं॥1॥

चौपाई · 2

मनहुँ बारिनिधि बूड़ जहाजू। भयउ बिकल बड़ बनिक समाजू॥ एकहि एक देहिं उपदेसू। तजे राम हम जानि कलेसू॥2॥

चौपाई · 3

निंदहिं आपु सराहहिं मीना। धिग जीवनु रघुबीर बिहीना॥ जौं पै प्रिय बियोगु बिधि कीन्हा। तौ कस मरनु न मागें दीन्हा॥3॥

चौपाई · 4

एहि बिधि करत प्रलाप कलापा। आए अवध भरे परितापा॥ बिषम बियोगु न जाइ बखाना। अवधि आस सब राखहिं प्राना॥4॥

दोहा · 86

राम दरस हित नेम ब्रत लगे करन नर नारि। मनहुँ कोक कोकी कमल दीन बिहीन तमारि॥86॥

चौपाई · 1

सीता सचिव सहित दोउ भाई। सृंगबेरपुर पहुँचे जाई॥ उतरे राम देवसरि देखी। कीन्ह दंडवत हरषु बिसेषी॥1॥

चौपाई · 2

लखन सचिवँ सियँ किए प्रनामा। सबहि सहित सुखु पायउ रामा॥ गंग सकल मुद मंगल मूला। सब सुख करनि हरनि सब सूला॥2॥

चौपाई · 3

कहि कहि कोटिक कथा प्रसंगा। रामु बिलोकहिं गंग तरंगा॥ सचिवहि अनुजहि प्रियहि सुनाई। बिबुध नदी महिमा अधिकाई॥3॥

चौपाई · 4

मज्जनु कीन्ह पंथ श्रम गयऊ। सुचि जलु पिअत मुदित मन भयऊ॥ सुमिरत जाहि मिटइ श्रम भारू। तेहि श्रम यह लौकिक ब्यवहारू॥4॥

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गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।