अयोध्याकाण्ड · 11

श्री लक्ष्मण-सुमित्रा संवाद

अयोध्याकाण्ड का प्रकरण 11: श्री लक्ष्मण-सुमित्रा संवाद। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।

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दोहा · 72

करुनासिंधु सुबंधु के सुनि मृदु बचन बिनीत। समुझाए उर लाइ प्रभु जानि सनेहँ सभीत॥72॥

चौपाई · 1

मागहु बिदा मातु सन जाई। आवहु बेगि चलहु बन भाई॥ मुदित भए सुनि रघुबर बानी। भयउ लाभ बड़ गइ बड़ि हानी॥1॥

चौपाई · 2

हरषित हृदयँ मातु पहिं आए। मनहुँ अंध फिरि लोचन पाए॥ जाइ जननि पग नायउ माथा। मनु रघुनंदन जानकि साथा॥2॥

चौपाई · 3

पूँछे मातु मलिन मन देखी। लखन कही सब कथा बिसेषी। गई सहमि सुनि बचन कठोरा। मृगी देखि दव जनु चहुँ ओरा॥3॥

चौपाई · 4

लखन लखेउ भा अनरथ आजू। एहिं सनेह सब करब अकाजू॥ मागत बिदा सभय सकुचाहीं। जाइ संग बिधि कहिहि कि नाहीं॥4॥

दोहा · 73

समुझि सुमित्राँ राम सिय रूपु सुसीलु सुभाउ। नृप सनेहु लखि धुनेउ सिरु पापिनि दीन्ह कुदाउ॥73॥

चौपाई · 1

धीरजु धरेउ कुअवसर जानी। सहज सुहृद बोली मृदु बानी॥ तात तुम्हारि मातु बैदेही। पिता रामु सब भाँति सनेही॥1॥

चौपाई · 2

अवध तहाँ जहँ राम निवासू। तहँइँ दिवसु जहँ भानु प्रकासू॥ जौं पै सीय रामु बन जाहीं। अवध तुम्हार काजु कछु नाहीं॥2॥

चौपाई · 3

गुर पितु मातु बंधु सुर साईं। सेइअहिं सकल प्रान की नाईं॥ रामु प्रानप्रिय जीवन जी के। स्वारथ रहित सखा सबही के॥3॥

चौपाई · 4

पूजनीय प्रिय परम जहाँ तें। सब मानिअहिं राम के नातें॥ अस जियँ जानि संग बन जाहू। लेहु तात जग जीवन लाहू॥4॥

दोहा · 74

भूरि भाग भाजनु भयहु मोहि समेत बलि जाउँ। जौं तुम्हरें मन छाड़ि छलु कीन्ह राम पद ठाउँ॥74॥

चौपाई · 1

पुत्रवती जुबती जग सोई। रघुपति भगतु जासु सुतु होई॥ नतरु बाँझ भलि बादि बिआनी। राम बिमुख सुत तें हित जानी॥1॥

चौपाई · 2

तुम्हरेहिं भाग रामु बन जाहीं। दूसर हेतु तात कछु नाहीं॥ सकल सुकृत कर बड़ फलु एहू। राम सीय पद सहज सनेहू॥2॥

चौपाई · 3

रागु रोषु इरिषा मदु मोहू। जनि सपनेहुँ इन्ह के बस होहू॥ सकल प्रकार बिकार बिहाई। मन क्रम बचन करेहु सेवकाई॥3॥

चौपाई · 4

तुम्ह कहुँ बन सब भाँति सुपासू। सँग पितु मातु रामु सिय जासू॥ जेहिं न रामु बन लहहिं कलेसू। सुत सोइ करेहु इहइ उपदेसू॥4॥

छन्द

उपदेसु यहु जेहिं तात तुम्हरे राम सिय सुख पावहीं। पितु मातु प्रिय परिवार पुर सुख सुरति बन बिसरावहीं॥ तुलसी प्रभुहि सिख देइ आयसु दीन्ह पुनि आसिष दई। रति होउ अबिरल अमल सिय रघुबीर पद नित-नित नई॥

सोरठा · 75

मातु चरन सिरु नाइ चले तुरत संकित हृदयँ। बागुर बिषम तोराइ मनहुँ भाग मृगु भाग बस॥75॥

चौपाई · 1

गए लखनु जहँ जानकिनाथू। भे मन मुदित पाइ प्रिय साथू॥ बंदि राम सिय चरन सुहाए। चले संग नृपमंदिर आए॥1॥

चौपाई · 2

कहहिं परसपर पुर नर नारी। भलि बनाइ बिधि बात बिगारी॥ तन कृस मन दुखु बदन मलीने। बिकल मनहुँ माखी मधु छीने॥2॥

चौपाई · 3

कर मीजहिं सिरु धुनि पछिताहीं। जनु बिनु पंख बिहग अकुलाहीं॥ भइ बड़ि भीर भूप दरबारा। बरनि न जाइ बिषादु अपारा॥3॥

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गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।