लंकाकाण्ड · 26

देवताओं की स्तुति, इंद्र की अमृत वर्षा

लंकाकाण्ड का प्रकरण 26: देवताओं की स्तुति, इंद्र की अमृत वर्षा। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।

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छन्द · 1

- जय राम सदा सुख धाम हरे। रघुनायक सायक चाप धरे। भव बारन दारन सिंह प्रभो। गुन सागर नागर नाथ बिभो॥1॥

छन्द · 2

तन काम अनेक अनूप छबी। गुन गावत सिद्ध मुनींद्र कबी॥ जसु पावन रावन नाग महा। खगनाथ जथा करि कोप गहा॥2॥

छन्द · 3

जन रंजन भंजन सोक भयं। गत क्रोध सदा प्रभु बोधमयं॥ अवतार उदार अपार गुनं। महि भार बिभंजन ग्यानघनं॥3॥

छन्द · 4

अज ब्यापकमेकमनादि सदा। करुनाकर राम नमामि मुदा॥ रघुबंस बिभूषन दूषन हा। कृत भूप बिभीषन दीन रहा॥4॥

छन्द · 5

गुन ध्यान निधान अमान अजं। नित राम नमामि बिभुं बिरजं॥ भुजदंड प्रचंड प्रताप बलं। खल बृंद निकंद महा कुसलं॥5॥

छन्द · 6

बिनु कारन दीन दयाल हितं। छबि धाम नमामि रमा सहितं॥ भव तारन कारन काज परं। मन संभव दारुन दोष हरं॥6॥

छन्द · 7

सर चाप मनोहर त्रोन धरं। जलजारुन लोचन भूपबरं॥ सुख मंदिर सुंदर श्रीरमनं। मद मार मुधा ममता समनं॥7॥

छन्द · 8

अनवद्य अखंड न गोचर गो। सब रूप सदा सब होइ न गो॥ इति बेद बदंति न दंतकथा। रबि आतप भिन्नमभिन्न जथा॥8॥

छन्द · 9

कृतकृत्य बिभो सब बानर ए। निरखंति तनानन सादर ए॥ धिग जीवन देव सरीर हरे। तव भक्ति बिना भव भूलि परे॥9॥

छन्द · 10

अब दीनदयाल दया करिऐ। मति मोरि बिभेदकरी हरिऐ॥ जेहि ते बिपरीत क्रिया करिऐ। दुख सो सुख मानि सुखी चरिऐ॥10॥

छन्द · 11

खल खंडन मंडन रम्य छमा। पद पंकज सेवित संभु उमा॥ नृप नायक दे बरदानमिदं। चरनांबुज प्रेमु सदा सुभदं॥11॥

दोहा · 111

- बिनय कीन्ह चतुरानन प्रेम पुलक अति गात। सोभासिंधु बिलोकत लोचन नहीं अघात॥111॥

दोहा · 1

तेहि अवसर दसरथ तहँ आए। तनय बिलोकि नयन जल छाए॥ अनुज सहित प्रभु बंदन कीन्हा। आसिरबाद पिताँ तब दीन्हा॥1॥

दोहा · 2

तात सकल तव पुन्य प्रभाऊ। जीत्यों अजय निसाचर राऊ॥ सुनि सुत बचन प्रीति अति बाढ़ी। नयन सलिल रोमावलि ठाढ़ी॥2॥

दोहा · 3

रघुपति प्रथम प्रेम अनुमाना। चितइ पितहि दीन्हेउ दृढ़ ग्याना॥ ताते उमा मोच्छ नहिं पायो। दसरथ भेद भगति मन लायो॥3॥

दोहा · 4

सगुनोपासक मोच्छ न लेहीं। तिन्ह कहुँ राम भगति निज देहीं॥ बार बार करि प्रभुहि प्रनामा। दसरथ हरषि गए सुरधामा॥4॥

दोहा · 112

- अनुज जानकी सहित प्रभु कुसल कोसलाधीस। सोभा देखि हरषि मन अस्तुति कर सुर ईस॥112॥

छन्द · 1

– जय राम सोभा धाम। दायक प्रनत बिश्राम॥ धृत त्रोन बर सर चाप। भुजदंड प्रबल प्रताप॥1॥

छन्द · 2

जय दूषनारि खरारि। मर्दन निसाचर धारि॥ यह दुष्ट मारेउ नाथ। भए देव सकल सनाथ॥2॥

छन्द · 3

जय हरन धरनी भार। महिमा उदार अपार॥ जय रावनारि कृपाल। किए जातुधान बिहाल॥3॥

छन्द · 4

लंकेस अति बल गर्ब। किए बस्य सुर गंधर्ब॥ मुनि सिद्ध नर खग नाग। हठि पंथ सब कें लाग॥4॥

छन्द · 5

परद्रोह रत अति दुष्ट। पायो सो फलु पापिष्ट॥ अब सुनहु दीन दयाल। राजीव नयन बिसाल॥5॥

छन्द · 6

मोहि रहा अति अभिमान। नहिं कोउ मोहि समान॥ अब देखि प्रभु पद कंज। गत मान प्रद दुख पुंज॥6॥

छन्द · 7

कोउ ब्रह्म निर्गुन ध्याव। अब्यक्त जेहि श्रुति गाव॥ मोहि भाव कोसल भूप। श्रीराम सगुन सरूप॥7॥

छन्द · 8

बै‍देहि अनुज समेत। मम हृदयँ करहु निकेत॥ मोहि जानिऐ ‍निज दास। दे भक्ति रमानिवास॥8॥

छन्द

– दे भक्ति रमानिवास त्रास हरन सरन सुखदायकं। सुख धाम राम नमामि काम अनेक छबि रघुनायकं॥ सुर बृंद रंजन द्वंद भंजन मनुजतनु अतुलितबलं। ब्रह्मादि संकर सेब्य राम नमामि करुना कोमलं॥

दोहा · 113

– अब करि कृपा बिलोकि मोहि आयसु देहु कृपाल। काह करौं सुनि ‍प्रिय बचन बोले दीनदयाल॥113॥

चौपाई · 1

सुन सुरपति कपि भालु हमारे। परे भूमि निसिचरन्हि जे मारे॥ मम हित लागि तजे इन्ह प्राना। सकल जिआउ सुरेस सुजाना॥1॥

चौपाई · 2

सुनु खगेस प्रभु कै यह बानी। अति अगाध जानहिं मुनि ग्यानी॥ प्रभु सक त्रिभुअन मारि जिआई। केवल सक्रहि दीन्हि बड़ाई॥2॥

चौपाई · 3

सुधा बरषि कपि भालु जियाए। हरषि उठे सब प्रभु पहिं आए॥ सुधाबृष्टि भै दुहु दल ऊपर। जिए भालु कपि नहिं रजनीचर॥3॥

चौपाई · 4

रामाकार भए तिन्ह के मन। मुक्त भए छूट भव बंधन॥ सुर अंसिक सब कपि अरु रीछा। जिए सकल रघुपति कीं ईछा॥4॥

चौपाई · 5

राम सरिस को दीन हितकारी। कीन्हे मुकुत निसाचर झारी॥ खल मल धाम काम रत रावन। गति पाई जो मुनिबर पाव न॥5॥

दोहा

– सुमन बरषि सब सुर चले चढ़ि चढ़ि रुचिर बिमान। देखि सुअवसर प्रभु पहिं आयउ संभु सुजान॥114 क॥

दोहा

परम प्रीति कर जोरि जुग नलिन नयन भरि बारि। पुलकित तन गदगद गिराँ बिनय करत त्रिपुरारि॥114 ख॥

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गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।