लंकाकाण्ड · 25
हनुमान्जी का सीताजी को कुशल सुनाना, सीताजी का आगमन और अग्नि परीक्षा
लंकाकाण्ड का प्रकरण 25: हनुमान्जी का सीताजी को कुशल सुनाना, सीताजी का आगमन और अग्नि परीक्षा। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
चौपाई · 1
पुनि प्रभु बोलि लियउ हनुमाना। लंका जाहु कहेउ भगवाना॥ समाचार जानकिहि सुनावहु। तासु कुसल लै तुम्ह चलि आवहु॥1॥
चौपाई · 2
तब हनुमंत नगर महुँ आए। सुनि निसिचरीं निसाचर धाए॥ बहु प्रकार तिन्ह पूजा कीन्ही। जनकसुता देखाइ पुनि दीन्ही॥2॥
चौपाई · 3
दूरिहि ते प्रनाम कपि कीन्हा। रघुपति दूत जानकीं चीन्हा॥ कहहु तात प्रभु कृपानिकेता। कुसल अनुज कपि सेन समेता॥3॥
चौपाई · 4
सब बिधि कुसल कोसलाधीसा। मातु समर जीत्यो दससीसा॥ अबिचल राजु बिभीषन पायो। सुनि कपि बचन हरष उर छायो॥4॥
छन्द
- : अति हरष मन तन पुलक लोचन सजल कह पुनि पुनि रमा। का देउँ तोहि त्रैलोक महुँ कपि किमपि नहिं बानी समा॥ सुनु मातु मैं पायो अखिल जग राजु आजु न संसयं। रन जीति रिपुदल बंधु जुत पस्यामि राममनामयं॥
दोहा · 107
सुनु सुत सदगुन सकल तव हृदयँ बसहुँ हनुमंत। सानुकूल कोसलपति रहहुँ समेत अनंत॥107॥
चौपाई · 1
अब सोइ जतन करहु तुम्ह ताता। देखौं नयन स्याम मृदु गाता॥ तब हनुमान राम पहिं जाई। जनकसुता कै कुसल सुनाई॥1॥
चौपाई · 2
सुनि संदेसु भानुकुलभूषन। बोलि लिए जुबराज बिभीषन॥ मारुतसुत के संग सिधावहु। सादर जनकसुतहि लै आवहु॥2॥
चौपाई · 3
तुरतहिं सकल गए जहँ सीता। सेवहिं सब निसिचरीं बिनीता॥ बेगि बिभीषन तिन्हहि सिखायो। तिन्ह बहु बिधि मज्जन करवायो॥3॥
चौपाई · 4
बहु प्रकार भूषन पहिराए। सिबिका रुचिर साजि पुनि ल्याए॥ ता पर हरषि चढ़ी बैदेही। सुमिरि राम सुखधाम सनेही॥4॥
चौपाई · 5
बेतपानि रच्छक चहु पासा। चले सकल मन परम हुलासा॥ देखन भालु कीस सब आए। रच्छक कोपि निवारन धाए॥5॥
चौपाई · 6
कह रघुबीर कहा मम मानहु। सीतहि सखा पयादें आनहु॥ देखहुँ कपि जननी की नाईं। बिहसि कहा रघुनाथ गोसाईं॥6॥
चौपाई · 7
सुनि प्रभु बचन भालु कपि हरषे। नभ ते सुरन्ह सुमन बहु बरषे॥ सीता प्रथम अनल महुँ राखी। प्रगट कीन्हि चह अंतर साखी॥7॥
दोहा · 108
तेहि कारन करुनानिधि कहे कछुक दुर्बाद। सुनत जातुधानीं सब लागीं करै बिषाद॥108॥
चौपाई · 1
प्रभु के बचन सीस धरि सीता। बोली मन क्रम बचन पुनीता॥ लछिमन होहु धरम के नेगी। पावक प्रगट करहु तुम्ह बेगी॥1॥
चौपाई · 2
सुनि लछिमन सीता कै बानी। बिरह बिबेक धरम निति सानी॥ लोचन सजल जोरि कर दोऊ। प्रभु सन कछु कहि सकत न ओऊ॥2॥
चौपाई · 3
देखि राम रुख लछिमन धाए। पावक प्रगटि काठ बहु लाए॥ पावक प्रबल देखि बैदेही। हृदयँ हरष नहिं भय कछु तेही॥3॥
चौपाई · 4
जौं मन बच क्रम मम उर माहीं। तजि रघुबीर आन गति नाहीं॥ तौ कृसानु सब कै गति जाना। मो कहुँ होउ श्रीखंड समाना॥4॥
छन्द · 1
- : श्रीखंड सम पावक प्रबेस कियो सुमिरि प्रभु मैथिली। जय कोसलेस महेस बंदित चरन रति अति निर्मली॥ प्रतिबिंब अरु लौकिक कलंक प्रचंड पावक महुँ जरे। प्रभु चरित काहुँ न लखे नभ सुर सिद्ध मुनि देखहिं खरे॥1॥
छन्द · 2
धरि रूप पावक पानि गहि श्री सत्य श्रुति जग बिदित जो। जिमि छीरसागर इंदिरा रामहि समर्पी आनि सो॥ सो राम बाम बिभाग राजति रुचिर अति सोभा भली। नव नील नीरज निकट मानहुँ कनक पंकज की कली॥2॥
दोहा
बरषहिं सुमन हरषि सुर बाजहिं गगन निसान। गावहिं किंनर सुरबधू नाचहिं चढ़ीं बिमान॥109 क॥
दोहा
जनकसुता समेत प्रभु सोभा अमित अपार। देखि भालु कपि हरषे जय रघुपति सुख सार॥109 ख॥
चौपाई · 1
तब रघुपति अनुसासन पाई। मातलि चलेउ चरन सिरु नाई॥ आए देव सदा स्वारथी। बचन कहहिं जनु परमारथी॥1॥
चौपाई · 2
दीन बंधु दयाल रघुराया। देव कीन्हि देवन्ह पर दाया॥ बिस्व द्रोह रत यह खल कामी। निज अघ गयउ कुमारगगामी॥2॥
चौपाई · 3
तुम्ह समरूप ब्रह्म अबिनासी। सदा एकरस सहज उदासी॥ अकल अगुन अज अनघ अनामय। अजित अमोघसक्ति करुनामय॥3॥
चौपाई · 4
मीन कमठ सूकर नरहरी। बामन परसुराम बपु धरी॥ जब जब नाथ सुरन्ह दुखु पायो। नाना तनु धरि तुम्हइँ नसायो॥4॥
चौपाई · 5
यह खल मलिन सदा सुरद्रोही। काम लोभ मद रत अति कोही। अधम सिरोमनि तव पद पावा। यह हमरें मन बिसमय आवा॥5॥
चौपाई · 6
हम देवता परम अधिकारी। स्वारथ रत प्रभु भगति बिसारी॥ भव प्रबाहँ संतत हम परे। अब प्रभु पाहि सरन अनुसरे॥6॥
दोहा · 110
- करि बिनती सुर सिद्ध सब रहे जहँ तहँ कर जोरि॥ अति सप्रेम तन पुलकि बिधि अस्तुति करत बहोरि॥110॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।