लंकाकाण्ड · 07

रावण की सभा में अंगद-रावण संवाद

लंकाकाण्ड का प्रकरण 7: रावण की सभा में अंगद-रावण संवाद। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।

व्हाट्सऐपटेलीग्राम

चौपाई · 1

बंदि चरन उर धरि प्रभुताई। अंगद चलेउ सबहि सिरु नाई॥ प्रभु प्रताप उर सहज असंका। रन बाँकुरा बालिसुत बंका॥1॥

चौपाई · 2

पुर पैठत रावन कर बेटा। खेलत रहा सो होइ गै भेंटा॥ बातहिं बात करष बढ़ि आई। जुगल अतुल बल पुनि तरुनाई॥2॥

चौपाई · 3

तेहिं अंगद कहुँ लात उठाई। गहि पद पटकेउ भूमि भवाँई॥ निसिचर निकर देखि भट भारी। जहँ तहँ चले न सकहिं पुकारी॥3॥

चौपाई · 4

एक एक सन मरमु न कहहीं। समुझि तासु बध चुप करि रहहीं॥ भयउ कोलाहल नगर मझारी। आवा कपि लंका जेहिं जारी॥4॥

चौपाई · 5

अब धौं कहा करिहि करतारा। अति सभीत सब करहिं बिचारा॥ बिनु पूछें मगु देहिं दिखाई। जेहि बिलोक सोइ जाइ सुखाई॥5॥

दोहा · 18

गयउ सभा दरबार तब सुमिरि राम पद कंज। सिंह ठवनि इत उत चितव धीर बीर बल पुंज॥18॥

चौपाई · 1

तुरत निसाचर एक पठावा। समाचार रावनहि जनावा॥ सुनत बिहँसि बोला दससीसा। आनहु बोलि कहाँ कर कीसा॥1॥

चौपाई · 2

आयसु पाइ दूत बहु धाए। कपिकुंजरहि बोलि लै आए॥ अंगद दीख दसानन बैसें। सहित प्रान कज्जलगिरि जैसें॥2॥

चौपाई · 3

भुजा बिटप सिर सृंग समाना। रोमावली लता जनु नाना॥ मुख नासिका नयन अरु काना। गिरि कंदरा खोह अनुमाना॥3॥

चौपाई · 4

गयउ सभाँ मन नेकु न मुरा। बालितनय अतिबल बाँकुरा॥ उठे सभासद कपि कहुँ देखी। रावन उर भा क्रोध बिसेषी॥4॥

दोहा · 19

जथा मत्त गज जूथ महुँ पंचानन चलि जाइ। राम प्रताप सुमिरि मन बैठ सभाँ सिरु नाइ॥19॥

चौपाई · 1

कह दसकंठ कवन तैं बंदर। मैं रघुबीर दूत दसकंधर॥ मम जनकहि तोहि रही मिताई। तव हित कारन आयउँ भाई॥1॥

चौपाई · 2

उत्तम कुल पुलस्ति कर नाती। सिव बिंरचि पूजेहु बहु भाँती॥ बर पायहु कीन्हेहु सब काजा। जीतेहु लोकपाल सब राजा॥2॥

चौपाई · 3

नृप अभिमान मोह बस किंबा। हरि आनिहु सीता जगदंबा॥ अब सुभ कहा सुनहु तुम्ह मोरा। सब अपराध छमिहि प्रभु तोरा॥3॥

चौपाई · 4

दसन गहहु तृन कंठ कुठारी। परिजन सहित संग निज नारी॥ सादर जनकसुता करि आगें। एहि बिधि चलहु सकल भय त्यागें॥4॥

दोहा · 20

प्रनतपाल रघुबंसमनि त्राहि त्राहि अब मोहि। आरत गिरा सुनत प्रभु अभय करेंगे तोहि॥20॥

चौपाई · 1

रे कपिपोत बोलु संभारी। मूढ़ न जानेहि मोहि सुरारी॥ कहु निज नाम जनक कर भाई। केहि नातें मानिऐ मिताई॥1॥

चौपाई · 2

अंगद नाम बालि कर बेटा। तासों कबहुँ भई ही भेंटा॥ अंगद बचन सुनत सकुचाना। रहा बालि बानर मैं जाना॥2॥

चौपाई · 3

अंगद तहीं बालि कर बालक। उपजेहु बंस अनल कुल घालक॥ गर्भ न गयहु ब्यर्थ तुम्ह जायहु। निज मुख तापस दूत कहायहु॥3॥

चौपाई · 4

अब कहु कुसल बालि कहँ अहई। बिहँसि बचन तब अंगद कहई॥ दिन दस गएँ बालि पहिं जाई। बूझेहु कुसल सखा उर लाई॥4॥

चौपाई · 5

राम बिरोध कुसल जसि होई। सो सब तोहि सुनाइहि सोई॥ सुनु सठ भेद होइ मन ताकें। श्री रघुबीर हृदय नहिं जाकें॥5॥

दोहा · 21

हम कुल घालक सत्य तुम्ह कुल पालक दससीस। अंधउ बधिर न अस कहहिं नयन कान तव बीस॥21॥

चौपाई · 1

सिव बिरंचि सुर मुनि समुदाई। चाहत जासु चरन सेवकाई॥ तासु दूत होइ हम कुल बोरा। अइसिहुँ मति उर बिहर न तोरा॥1॥

चौपाई · 2

सुनि कठोर बानी कपि केरी। कहत दसानन नयन तरेरी॥ खल तव कठिन बचन सब सहऊँ। नीति धर्म मैं जानत अहऊँ॥2॥

चौपाई · 3

कह कपि धर्मसीलता तोरी। हमहुँ सुनी कृत पर त्रिय चोरी॥ देखी नयन दूत रखवारी। बूड़ि न मरहु धर्म ब्रतधारी॥3॥

चौपाई · 4

कान नाक बिनु भगिनि निहारी। छमा कीन्हि तुम्ह धर्म बिचारी॥ धर्मसीलता तव जग जागी। पावा दरसु हमहुँ बड़भागी॥4॥

दोहा

जनि जल्पसि जड़ जंतु कपि सठ बिलोकु मम बाहु। लोकपाल बल बिपुल ससि ग्रसन हेतु सब राहु॥22 क॥

दोहा

पुनि नभ सर मम कर निकर कमलन्हि पर करि बास। सोभत भयउ मराल इव संभु सहित कैलास॥22 ख॥

चौपाई · 1

तुम्हरे कटक माझ सुनु अंगद। मो सन भिरिहि कवन जोधा बद॥ तब प्रभु नारि बिरहँ बलहीना। अनुज तासु दुख दुखी मलीना॥1॥

चौपाई · 2

तुम्ह सुग्रीव कूलद्रुम दोऊ। अनुज हमार भीरु अति सोऊ॥ जामवंत मंत्री अति बूढ़ा। सो कि होइ अब समरारूढ़ा॥2॥

चौपाई · 3

सिल्पि कर्म जानहिं नल नीला। है कपि एक महा बलसीला॥ आवा प्रथम नगरु जेहिं जारा। सुनत बचन कह बालिकुमारा॥3॥

चौपाई · 4

सत्य बचन कहु निसिचर नाहा। साँचेहुँ कीस कीन्ह पुर दाहा॥ रावण नगर अल्प कपि दहई। सुनि अस बचन सत्य को कहई॥4॥

चौपाई · 5

जो अति सुभट सराहेहु रावन। सो सुग्रीव केर लघु धावन॥ चलइ बहुत सो बीर न होई। पठवा खबरि लेन हम सोई॥5॥

दोहा

सत्य नगरु कपि जारेउ बिनु प्रभु आयसु पाइ। फिरि न गयउ सुग्रीव पहिं तेहिं भय रहा लुकाइ॥23 क॥

दोहा

सत्य कहहि दसकंठ सब मोहि न सुनि कछु कोह। कोउ न हमारें कटक अस तो सन लरत जो सोह॥23 ख॥

दोहा

प्रीति बिरोध समान सन करिअ नीति असि आहि। जौं मृगपति बध मेडुकन्हि भल कि कहइ कोउ ताहि॥23 ग॥

दोहा

जद्यपि लघुता राम कहुँ तोहि बधें बड़ दोष। तदपि कठिन दसकंठ सुनु छत्र जाति कर रोष॥23 घ॥

दोहा

बक्र उक्ति धनु बचन सर हृदय दहेउ रिपु कीस। प्रतिउत्तर सड़सिन्ह मनहुँ काढ़त भट दससीस॥23 ङ॥

दोहा

हँसि बोलेउ दसमौलि तब कपि कर बड़ गुन एक। जो प्रतिपालइ तासु हित करइ उपाय अनेक॥23 च॥

चौपाई · 1

धन्य कीस जो निज प्रभु काजा। जहँ तहँ नाचइ परिहरि लाजा॥ नाचि कूदि करि लोग रिझाई। पति हित करइ धर्म निपुनाई॥1॥

चौपाई · 2

अंगद स्वामिभक्त तव जाती। प्रभु गुन कस न कहसि एहि भाँती॥ मैं गुन गाहक परम सुजाना। तव कटु रटनि करउँ नहिं काना॥2॥

चौपाई · 3

कह कपि तव गुन गाहकताई। सत्य पवनसुत मोहि सुनाई॥ बन बिधंसि सुत बधि पुर जारा। तदपि न तेहिं कछु कृत अपकारा॥3॥

चौपाई · 4

सोइ बिचारि तव प्रकृति सुहाई। दसकंधर मैं कीन्हि ढिठाई॥ देखेउँ आइ जो कछु कपि भाषा। तुम्हरें लाज न रोष न माखा॥4॥

चौपाई · 5

जौं असि मति पितु खाए कीसा। कहि अस बचन हँसा दससीसा॥ पितहि खाइ खातेउँ पुनि तोही। अबहीं समुझि परा कछु मोही॥5॥

चौपाई · 6

बालि बिमल जस भाजन जानी। हतउँ न तोहि अधम अभिमानी॥ कहु रावन रावन जग केते। मैं निज श्रवन सुने सुनु जेते॥6॥

चौपाई · 7

बलिहि जितन एक गयउ पताला। राखेउ बाँधि सिसुन्ह हयसाला॥ खेलहिं बालक मारहिं जाई। दया लागि बलि दीन्ह छोड़ाई॥7॥

चौपाई · 8

एक बहोरि सहसभुज देखा। धाइ धरा जिमि जंतु बिसेषा॥ कौतुक लागि भवन लै आवा। सो पुलस्ति मुनि जाइ छोड़ावा॥8॥

दोहा · 24

एक कहत मोहि सकुच अति रहा बालि कीं काँख। इन्ह महुँ रावन तैं कवन सत्य बदहि तजि माख॥24॥

चौपाई · 1

: सुनु सठ सोइ रावन बलसीला। हरगिरि जान जासु भुज लीला॥ जान उमापति जासु सुराई। पूजेउँ जेहि सिर सुमन चढ़ाई॥1॥

चौपाई · 2

सिर सरोज निज करन्हि उतारी। पूजेउँ अमित बार त्रिपुरारी॥ भुज बिक्रम जानहिं दिगपाला। सठ अजहूँ जिन्ह कें उर साला॥2॥

चौपाई · 3

जानहिं दिग्गज उर कठिनाई। जब जब भिरउँ जाइ बरिआई॥ जिन्ह के दसन कराल न फूटे। उर लागत मूलक इव टूटे॥3॥

चौपाई · 4

जासु चलत डोलति इमि धरनी। चढ़त मत्त गज जिमि लघु तरनी॥ सोइ रावन जग बिदित प्रतापी। सुनेहि न श्रवन अलीक प्रलापी॥4॥

चौपाई · 1

सुनि अंगद सकोप कह बानी। बोलु संभारि अधम अभिमानी॥ सहसबाहु भुज गहन अपारा। दहन अनल सम जासु कुठारा॥1॥

चौपाई · 2

जासु परसु सागर खर धारा। बूड़े नृप अगनित बहु बारा॥ तासु गर्ब जेहि देखत भागा। सो नर क्यों दससीस अभागा॥2॥

चौपाई · 3

राम मनुज कस रे सठ बंगा। धन्वी कामु नदी पुनि गंगा॥ पसु सुरधेनु कल्पतरु रूखा। अन्न दान अरु रस पीयूषा॥3॥

चौपाई · 4

बैनतेय खग अहि सहसानन। चिंतामनि पुनि उपल दसानन॥ सुनु मतिमंद लोक बैकुंठा। लाभ कि रघुपति भगति अकुंठा॥4॥

दोहा · 26

सेन सहित तव मान मथि बन उजारि पुर जारि। कस रे सठ हनुमान कपि गयउ जो तव सुत मारि॥26॥

चौपाई · 1

सुनु रावन परिहरि चतुराई। भजसि न कृपासिंधु रघुराई॥ जौं खल भएसि राम कर द्रोही। ब्रह्म रुद्र सक राखि न तोही॥1॥

चौपाई · 2

मूढ़ बृथा जनि मारसि गाला। राम बयर अस होइहि हाला॥ तव सिर निकर कपिन्ह के आगें। परिहहिं धरनि राम सर लागें॥2॥

चौपाई · 3

ते तव सिर कंदुक सम नाना। खेलिहहिं भालु कीस चौगाना॥ जबहिं समर कोपिहि रघुनायक। छुटिहहिं अति कराल बहु सायक॥3॥

चौपाई · 4

तब कि चलिहि अस गाल तुम्हारा। अस बिचारि भजु राम उदारा॥ सुनत बचन रावन परजरा। जरत महानल जनु घृत परा॥4॥

दोहा · 27

कुंभकरन अस बंधु मम सुत प्रसिद्ध सक्रारि। मोर पराक्रम नहिं सुनेहि जितेऊँ चराचर झारि॥27॥

चौपाई · 1

सठ साखामृग जोरि सहाई। बाँधा सिंधु इहइ प्रभुताई॥ नाघहिं खग अनेक बारीसा। सूर न होहिं ते सुनु सब कीसा॥1॥

चौपाई · 2

मम भुज सागर बल जल पूरा। जहँ बूड़े बहु सुर नर सूरा॥ बीस पयोधि अगाध अपारा। को अस बीर जो पाइहि पारा॥2॥

चौपाई · 3

दिगपालन्ह मैं नीर भरावा। भूप सुजस खल मोहि सुनावा॥ जौं पै समर सुभट तव नाथा। पुनि पुनि कहसि जासु गुन गाथा॥3॥

चौपाई · 4

तौ बसीठ पठवत केहि काजा। रिपु सन प्रीति करत नहिं लाजा॥ हरगिरि मथन निरखु मम बाहू। पुनि सठ कपि निज प्रभुहि सराहू॥4॥

दोहा · 28

सूर कवन रावन सरिस स्वकर काटि जेहिं सीस। हुने अनल अति हरष बहु बार साखि गौरीस॥28॥

चौपाई · 1

जरत बिलोकेउँ जबहि कपाला। बिधि के लिखे अंक निज भाला॥ नर कें कर आपन बध बाँची। हसेउँ जानि बिधि गिरा असाँची॥1॥

चौपाई · 2

सोउ मन समुझि त्रास नहिं मोरें। लिखा बिरंचि जरठ मति भोरें॥ आन बीर बल सठ मम आगें। पुनि पुनि कहसि लाज पति त्यागें॥2॥

चौपाई · 3

कह अंगद सलज्ज जग माहीं। रावन तोहि समान कोउ नाहीं॥ लाजवंत तव सहज सुभाऊ। निज मुख निज गुन कहसि न काऊ॥3॥

चौपाई · 4

सिर अरु सैल कथा चित रही। ताते बार बीस तैं कहीं॥ सो भुजबल राखेहु उर घाली। जीतेहु सहसबाहु बलि बाली॥4॥

चौपाई · 5

सुनु मतिमंद देहि अब पूरा। काटें सीस कि होइअ सूरा॥ इंद्रजालि कहुँ कहिअ न बीरा। काटइ निज कर सकल सरीरा॥5॥

दोहा · 29

जरहिं पतंग मोह बस भार बहहिं खर बृंद। ते नहिं सूर कहावहिं समुझि देखु मतिमंद॥29॥

चौपाई · 1

अब जनि बतबढ़ाव खल करही। सुनु मम बचन मान परिहरही॥ दसमुख मैं न बसीठीं आयउँ। अस बिचारि रघुबीर पठायउँ॥1॥

चौपाई · 2

बार बार अस कहइ कृपाला। नहिं गजारि जसु बंधे सृकाला॥ मन महुँ समुझि बचन प्रभु केरे। सहेउँ कठोर बचन सठ तेरे॥2॥

चौपाई · 3

नाहिं त करि मुख भंजन तोरा। लैं जातेउँ सीतहि बरजोरा॥ जानेउँ तव बल अधम सुरारी। सूनें हरि आनिहि परनारी॥3॥

चौपाई · 4

तै निसिचर पति गर्ब बहूता। मैं रघुपति सेवक कर दूता॥ जौं न राम अपमानहिं डरऊँ। तोहि देखत अस कौतुक करउँ॥4॥

दोहा · 30

तोहि पटकि महि सेन हति चौपट करि तव गाउँ। तव जुबतिन्ह समेत सठ जनकसुतहि लै जाउँ॥30॥

चौपाई · 1

जौं अस करौं तदपि न बड़ाई। मुएहि बधें नहिं कछु मनुसाई॥ कौल कामबस कृपिन बिमूढ़ा। अति दरिद्र अजसी अति बूढ़ा॥1॥

चौपाई · 2

सदा रोगबस संतत क्रोधी। बिष्नु बिमुख श्रुति संत बिरोधी॥ तनु पोषक निंदक अघ खानी जीवत सव सम चौदह प्रानी॥2॥

चौपाई · 3

अस बिचारि खल बधउँ न तोही। अब जनि रिस उपजावसि मोही॥ सुनि सकोप कह निसिचर नाथा। अधर दसन दसि मीजत हाथा॥3॥

चौपाई · 4

रे कपि अधम मरन अब चहसी। छोटे बदन बात बड़ि कहसी॥ कटु जल्पसि जड़ कपि बल जाकें। बल प्रताप बुधि तेज न ताकें॥4॥

दोहा

अगुन अमान जानि तेहि दीन्ह पिता बनबास। सो दुख अरु जुबती बिरह पुनि निसि दिन मम त्रास॥31 क॥

दोहा

जिन्ह के बल कर गर्ब तोहि अइसे मनुज अनेक। खाहिं निसाचर दिवस निसि मूढ़ समुझु तजि टेक॥31 ख॥

चौपाई · 1

जब तेहिं कीन्हि राम कै निंदा। क्रोधवंत अति भयउ कपिंदा॥ हरि हर निंदा सुनइ जो काना। होइ पाप गोघात समाना॥1॥

चौपाई · 2

कटकटान कपिकुंजर भारी। दुहु भुजदंड तमकि महि मारी॥ डोलत धरनि सभासद खसे। चले भाजि भय मारुत ग्रसे॥2॥

चौपाई · 3

गिरत सँभारि उठा दसकंधर। भूतल परे मुकुट अति सुंदर॥ कछु तेहिं लै निज सिरन्हि सँवारे। कछु अंगद प्रभु पास पबारे॥3॥

चौपाई · 4

आवत मुकुट देखि कपि भागे। दिनहीं लूक परन बिधि लागे॥ की रावन करि कोप चलाए। कुलिस चारि आवत अति धाए॥4॥

चौपाई · 5

कह प्रभु हँसि जनि हृदयँ डेराहू। लूक न असनि केतु नहिं राहू॥ ए किरीट दसकंधर केरे। आवत बालितनय के प्रेरे॥5॥

दोहा

तरकि पवनसुत कर गहे आनि धरे प्रभु पास। कौतुक देखहिं भालु कपि दिनकर सरिस प्रकास॥32 क॥

दोहा

उहाँ सकोपि दसानन सब सन कहत रिसाइ। धरहु कपिहि धरि मारहु सुनि अंगद मुसुकाइ॥32 ख॥

चौपाई · 1

एहि बधि बेगि सुभट सब धावहु। खाहु भालु कपि जहँ जहँ पावहु॥ मर्कटहीन करहु महि जाई। जिअत धरहु तापस द्वौ भाई॥1॥

चौपाई · 2

पुनि सकोप बोलेउ जुबराजा। गाल बजावत तोहि न लाजा॥ मरु गर काटि निलज कुलघाती। बल बिलोकि बिहरति नहिं छाती॥2॥

चौपाई · 3

रे त्रिय चोर कुमारग गामी। खल मल रासि मंदमति कामी॥ सन्यपात जल्पसि दुर्बादा। भएसि कालबस खल मनुजादा॥3॥

चौपाई · 4

याको फलु पावहिगो आगें। बानर भालु चपेटन्हि लागें॥ रामु मनुज बोलत असि बानी। गिरहिं न तव रसना अभिमानी॥4॥

चौपाई · 5

गिरिहहिं रसना संसय नाहीं। सिरन्हि समेत समर महि माहीं॥5॥

सोरठा

सो नर क्यों दसकंध बालि बध्यो जेहिं एक सर। बीसहुँ लोचन अंध धिग तव जन्म कुजाति जड़॥33 क॥

सोरठा

तव सोनित कीं प्यास तृषित राम सायक निकर। तजउँ तोहि तेहि त्रास कटु जल्पक निसिचर अधम॥33 ख॥

चौपाई · 1

मैं तव दसन तोरिबे लायक। आयसु मोहि न दीन्ह रघुनायक॥ असि रिस होति दसउ मुख तोरौं। लंका गहि समुद्र महँ बोरौं॥1॥

चौपाई · 2

गूलरि फल समान तव लंका। बसहु मध्य तुम्ह जंतु असंका॥ मैं बानर फल खात न बारा। आयसु दीन्ह न राम उदारा॥2॥

चौपाई · 3

जुगुति सुनत रावन मुसुकाई। मूढ़ सिखिहि कहँ बहुत झुठाई॥ बालि न कबहुँ गाल अस मारा। मिलि तपसिन्ह तैं भएसि लबारा॥3॥

चौपाई · 4

साँचेहुँ मैं लबार भुज बीहा। जौं न उपारिउँ तव दस जीहा॥ समुझि राम प्रताप कपि कोपा। सभा माझ पन करि पद रोपा॥4॥

चौपाई · 5

जौं मम चरन सकसि सठ टारी। फिरहिं रामु सीता मैं हारी॥ सुनहु सुभट सब कह दससीसा। पद गहि धरनि पछारहु कीसा॥5॥

चौपाई · 6

इंद्रजीत आदिक बलवाना। हरषि उठे जहँ तहँ भट नाना॥ झपटहिं करि बल बिपुल उपाई। पद न टरइ बैठहिं सिरु नाई॥6॥

चौपाई · 7

पुनि उठि झपटहिं सुर आराती। टरइ न कीस चरन एहि भाँती॥ पुरुष कुजोगी जिमि उरगारी। मोह बिटप नहिं सकहिं उपारी॥7॥

दोहा

कोटिन्ह मेघनाद सम सुभट उठे हरषाइ। झपटहिं टरै न कपि चरन पुनि बैठहिं सिर नाइ॥34 क॥

दोहा

भूमि न छाँड़त कपि चरन देखत रिपु मद भाग। कोटि बिघ्न ते संत कर मन जिमि नीति न त्याग॥34 ख॥

व्हाट्सऐपटेलीग्राम

गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।