लंकाकाण्ड · 06
रावण, घमंड में चूर, मंदोदरी की सलाह की अवहेलना करता है, अंगद का लंका जाना
लंकाकाण्ड का प्रकरण 6: रावण, घमंड में चूर, मंदोदरी की सलाह की अवहेलना करता है, अंगद का लंका जाना। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
चौपाई
अस बिचारि सुनु प्रानपति प्रभु सन बयरु बिहाइ। प्रीति करहु रघुबीर पद मम अहिवात न जाइ॥15 ख॥
चौपाई · 1
बिहँसा नारि बचन सुनि काना। अहो मोह महिमा बलवाना॥ नारि सुभाउ सत्य सब कहहीं। अवगुन आठ सदा उर रहहीं॥1॥
चौपाई · 2
साहस अनृत चपलता माया। भय अबिबेक असौच अदाया॥ रिपु कर रूप सकल तैं गावा। अति बिसाल भय मोहि सुनावा॥2॥
चौपाई · 3
सो सब प्रिया सहज बस मोरें। समुझि परा अब प्रसाद तोरें॥ जानिउँ प्रिया तोरि चतुराई। एहि बिधि कहहु मोरि प्रभुताई॥3॥
चौपाई · 4
तव बतकही गूढ़ मृगलोचनि। समुझत सुखद सुनत भय मोचनि॥ मंदोदरि मन महुँ अस ठयऊ। पियहि काल बस मति भ्रम भयउ॥4॥
दोहा
ऐहि बिधि करत बिनोद बहु प्रात प्रगट दसकंध। सहज असंक लंकपति सभाँ गयउ मद अंध॥16 क॥
सोरठा
फूलइ फरइ न बेत जदपि सुधा बरषहिं जलद। मूरुख हृदयँ न चेत जौं गुर मिलहिं बिरंचि सम॥16 ख॥
चौपाई · 1
इहाँ प्रात जागे रघुराई। पूछा मत सब सचिव बोलाई॥ कहहु बेगि का करिअ उपाई। जामवंत कह पद सिरु नाई॥1॥
चौपाई · 2
सुनु सर्बग्य सकल उर बासी। बुधि बल तेज धर्म गुन रासी॥ मंत्र कहउँ निज मति अनुसारा। दूत पठाइअ बालि कुमारा॥2॥
चौपाई · 3
नीक मंत्र सब के मन माना। अंगद सन कह कृपानिधाना॥ बालितनय बुधि बल गुन धामा। लंका जाहु तात मम कामा॥3॥
चौपाई · 4
बहुत बुझाइ तुम्हहि का कहऊँ। परम चतुर मैं जानत अहऊँ॥ काजु हमार तासु हित होई। रिपु सन करेहु बतकही सोई॥4॥
सोरठा
प्रभु अग्या धरि सीस चरन बंदि अंगद उठेउ। सोइ गुन सागर ईस राम कृपा जा कर करहु॥17 क॥
सोरठा
स्वयंसिद्ध सब काज नाथ मोहि आदरु दियउ। अस बिचारि जुबराज तन पुलकित हरषित हियउ॥17 ख॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।