बालकाण्ड · 41

श्री राम-लक्ष्मण सहित ऋषि विश्वामित्र का यज्ञशाला में प्रवेश

बालकाण्ड का प्रकरण 41: श्री राम-लक्ष्मण सहित ऋषि विश्वामित्र का यज्ञशाला में प्रवेश। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।

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दोहा · 238

अरुनोदयँ सकुचे कुमुद उडगन जोति मलीन। जिमि तुम्हार आगमन सुनि भए नृपति बलहीन॥238॥

चौपाई · 1

नृप सब नखत करहिं उजिआरी। टारि न सकहिं चाप तम भारी॥ कमल कोक मधुकर खग नाना। हरषे सकल निसा अवसाना॥1॥

चौपाई · 2

ऐसेहिं प्रभु सब भगत तुम्हारे। होइहहिं टूटें धनुष सुखारे॥ उयउ भानु बिनु श्रम तम नासा। दुरे नखत जग तेजु प्रकासा॥2॥

चौपाई

रबि निज उदय ब्याज रघुराया। प्रभु प्रतापु सब नृपन्ह दिखाया॥ तव भुज बल महिमा उदघाटी। प्रगटी धनु बिघटन परिपाटी।3॥

चौपाई · 4

बंधु बचन सुनि प्रभु मुसुकाने। होइ सुचि सहज पुनीत नहाने॥ नित्यक्रिया करि गरु पहिं आए। चरन सरोज सुभग सिर नाए॥4॥

चौपाई · 5

सतानंदु तब जनक बोलाए। कौसिक मुनि पहिं तुरत पठाए॥ जनक बिनय तिन्ह आइ सुनाई। हरषे बोलि लिए दोउ भाई॥5॥

दोहा · 239

सतानंद पद बंदि प्रभु बैठे गुर पहिं जाइ। चलहु तात मुनि कहेउ तब पठवा जनक बोलाइ॥239॥

चौपाई · 1

सीय स्वयंबरू देखिअ जाई। ईसु काहि धौं देइ बड़ाई॥ लखन कहा जस भाजनु सोई। नाथ कृपा तव जापर होई॥1॥

चौपाई · 2

हरषे मुनि सब सुनि बर बानी। दीन्हि असीस सबहिं सुखु मानी॥ पुनि मुनिबृंद समेत कृपाला। देखन चले धनुषमख साला॥2॥

चौपाई · 3

रंगभूमि आए दोउ भाई। असि सुधि सब पुरबासिन्ह पाई॥ चले सकल गृह काज बिसारी। बाल जुबान जरठ नर नारी॥3॥

चौपाई · 4

देखी जनक भीर भै भारी। सुचि सेवक सब लिए हँकारी॥ तुरत सकल लोगन्ह पहिं जाहू। आसन उचित देहु सब काहू॥4॥

दोहा · 240

कहि मृदु बचन बिनीत तिन्ह बैठारे नर नारि। उत्तम मध्यम नीच लघु निज निज थल अनुहारि॥240॥

चौपाई · 1

राजकुअँर तेहि अवसर आए। मनहुँ मनोहरता तन छाए॥ गुन सागर नागर बर बीरा। सुंदर स्यामल गौर सरीरा॥1॥

चौपाई · 2

राज समाज बिराजत रूरे। उडगन महुँ जनु जुग बिधु पूरे॥ जिन्ह कें रही भावना जैसी। प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी॥2॥

चौपाई · 3

देखहिं रूप महा रनधीरा। मनहुँ बीर रसु धरें सरीरा॥ डरे कुटिल नृप प्रभुहि निहारी। मनहुँ भयानक मूरति भारी॥3॥

चौपाई · 4

रहे असुर छल छोनिप बेषा। तिन्ह प्रभु प्रगट कालसम देखा। पुरबासिन्ह देखे दोउ भाई। नरभूषन लोचन सुखदाई॥4॥

दोहा · 241

नारि बिलोकहिं हरषि हियँ निज-निज रुचि अनुरूप। जनु सोहत सिंगार धरि मूरति परम अनूप॥241॥

चौपाई · 1

बिदुषन्ह प्रभु बिराटमय दीसा। बहु मुख कर पग लोचन सीसा॥ जनक जाति अवलोकहिं कैसें। सजन सगे प्रिय लागहिं जैसें॥1॥

चौपाई · 2

सहित बिदेह बिलोकहिं रानी। सिसु सम प्रीति न जाति बखानी॥ जोगिन्ह परम तत्वमय भासा। सांत सुद्ध सम सहज प्रकासा॥2॥

चौपाई · 3

हरिभगतन्ह देखे दोउ भ्राता। इष्टदेव इव सब सुख दाता॥ रामहि चितव भायँ जेहि सीया। सो सनेहु सुखु नहिं कथनीया॥3॥

चौपाई · 4

उर अनुभवति न कहि सक सोऊ। कवन प्रकार कहै कबि कोऊ॥ एहि बिधि रहा जाहि जस भाऊ। तेहिं तस देखेउ कोसलराऊ॥4॥

दोहा · 242

राजत राज समाज महुँ कोसलराज किसोर। सुंदर स्यामल गौर तन बिस्व बिलोचन चोर॥242॥

चौपाई · 1

सहज मनोहर मूरति दोऊ। कोटि काम उपमा लघु सोऊ॥ सरद चंद निंदक मुख नीके। नीरज नयन भावते जी के॥1॥

चौपाई · 2

चितवनि चारु मार मनु हरनी। भावति हृदय जाति नहिं बरनी॥ कल कपोल श्रुति कुंडल लोला। चिबुक अधर सुंदर मृदु बोला॥2॥

चौपाई · 3

कुमुदबंधु कर निंदक हाँसा। भृकुटी बिकट मनोहर नासा॥ भाल बिसाल तिलक झलकाहीं। कच बिलोकि अलि अवलि लजाहीं॥3॥

चौपाई · 4

पीत चौतनीं सिरन्हि सुहाईं। कुसुम कलीं बिच बीच बनाईं॥ रेखें रुचिर कंबु कल गीवाँ। जनु त्रिभुवन सुषमा की सीवाँ॥4॥

दोहा · 243

कुंजर मनि कंठा कलित उरन्हि तुलसिका माल। बृषभ कंध केहरि ठवनि बल निधि बाहु बिसाल॥243॥

चौपाई · 1

कटि तूनीर पीत पट बाँधें। कर सर धनुष बाम बर काँधें॥ पीत जग्य उपबीत सुहाए। नख सिख मंजु महाछबि छाए॥1॥

चौपाई · 2

देखि लोग सब भए सुखारे। एकटक लोचन चलत न तारे॥ हरषे जनकु देखि दोउ भाई। मुनि पद कमल गहे तब जाई॥2॥

चौपाई · 3

करि बिनती निज कथा सुनाई। रंग अवनि सब मुनिहि देखाई॥ जहँ जहँ जाहिं कुअँर बर दोऊ। तहँ तहँ चकित चितव सबु कोऊ॥3॥

चौपाई · 4

निज निज रुख रामहि सबु देखा। कोउ न जान कछु मरमु बिसेषा॥ भलि रचना मुनि नृप सन कहेऊ। राजाँ मुदित महासुख लहेऊ॥4॥

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गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।