बालकाण्ड · 40
श्री सीताजी का पार्वती पूजन एवं वरदान प्राप्ति तथा श्री राम-लक्ष्मण संवाद
बालकाण्ड का प्रकरण 40: श्री सीताजी का पार्वती पूजन एवं वरदान प्राप्ति तथा श्री राम-लक्ष्मण संवाद। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
दोहा · 234
देखन मिस मृग बिहग तरु फिरइ बहोरि बहोरि। निरखि निरखि रघुबीर छबि बाढ़इ प्रीति न थोरि॥234॥
चौपाई · 1
जानि कठिन सिवचाप बिसूरति। चली राखि उर स्यामल मूरति॥ प्रभु जब जात जानकी जानी। सुख सनेह सोभा गुन खानी॥1॥
चौपाई · 2
परम प्रेममय मृदु मसि कीन्ही। चारु चित्त भीतीं लिखि लीन्ही॥ गई भवानी भवन बहोरी। बंदि चरन बोली कर जोरी॥2॥
चौपाई · 3
जय जय गिरिबरराज किसोरी। जय महेस मुख चंद चकोरी॥ जय गजबदन षडानन माता। जगत जननि दामिनि दुति गाता॥3॥
चौपाई · 4
नहिं तव आदि मध्य अवसाना। अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना॥ भव भव बिभव पराभव कारिनि। बिस्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि॥4॥
दोहा · 235
पतिदेवता सुतीय महुँ मातु प्रथम तव रेख। महिमा अमित न सकहिं कहि सहस सारदा सेष॥235॥
चौपाई · 1
सेवत तोहि सुलभ फल चारी। बरदायनी पुरारि पिआरी॥ देबि पूजि पद कमल तुम्हारे। सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे॥1॥
चौपाई · 2
मोर मनोरथु जानहु नीकें। बसहु सदा उर पुर सबही कें॥ कीन्हेउँ प्रगट न कारन तेहीं। अस कहि चरन गहे बैदेहीं॥2॥
चौपाई · 3
बिनय प्रेम बस भई भवानी। खसी माल मूरति मुसुकानी॥ सादर सियँ प्रसादु सिर धरेऊ। बोली गौरि हरषु हियँ भरेऊ॥3॥
चौपाई · 4
सुनु सिय सत्य असीस हमारी। पूजिहि मन कामना तुम्हारी॥ नारद बचन सदा सुचि साचा। सो बरु मिलिहि जाहिं मनु राचा॥4॥
छन्द
मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु सहज सुंदर साँवरो। करुना निधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो॥ एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय सहित हियँ हरषीं अली। तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली॥
सोरठा · 236
जानि गौरि अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि। मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लगे॥236॥
चौपाई · 1
हृदयँ सराहत सीय लोनाई। गुर समीप गवने दोउ भाई॥ राम कहा सबु कौसिक पाहीं। सरल सुभाउ छुअत छल नाहीं॥1॥
चौपाई · 2
सुमन पाइ मुनि पूजा कीन्ही। पुनि असीस दुहु भाइन्ह दीन्ही॥ सुफल मनोरथ होहुँ तुम्हारे। रामु लखनु सुनि भय सुखारे॥2॥
चौपाई · 3
करि भोजनु मुनिबर बिग्यानी। लगे कहन कछु कथा पुरानी॥ बिगत दिवसु गुरु आयसु पाई। संध्या करन चले दोउ भाई॥3॥
चौपाई · 4
प्राची दिसि ससि उयउ सुहावा। सिय मुख सरिस देखि सुखु पावा॥ बहुरि बिचारु कीन्ह मन माहीं। सीय बदन सम हिमकर नाहीं॥4॥
दोहा · 237
जनमु सिंधु पुनि बंधु बिषु दिन मलीन सकलंक। सिय मुख समता पाव किमि चंदु बापुरो रंक॥237॥
चौपाई · 1
घटइ बढ़इ बिरहिनि दुखदाई। ग्रसइ राहु निज संधिहिं पाई॥ कोक सोकप्रद पंकज द्रोही। अवगुन बहुत चंद्रमा तोही॥1॥
चौपाई · 2
बैदेही मुख पटतर दीन्हे। होइ दोषु बड़ अनुचित कीन्हे॥ सिय मुख छबि बिधु ब्याज बखानी। गुर पहिं चले निसा बड़ि जानी॥2॥
चौपाई · 3
करि मुनि चरन सरोज प्रनामा। आयसु पाइ कीन्ह बिश्रामा॥ बिगत निसा रघुनायक जागे। बंधु बिलोकि कहन अस लागे॥3॥
चौपाई · 4
उयउ अरुन अवलोकहु ताता। पंकज कोक लोक सुखदाता॥ बोले लखनु जोरि जुग पानी। प्रभु प्रभाउ सूचक मृदु बानी॥4॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।