बालकाण्ड · 22
शिवजी की बारात और विवाह की तैयारी
बालकाण्ड का प्रकरण 22: शिवजी की बारात और विवाह की तैयारी। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
चौपाई · 1
सबु प्रसंगु गिरिपतिहि सुनावा। मदन दहन सुनि अति दुखु पावा॥ बहुरि कहेउ रति कर बरदाना। सुनि हिमवंत बहुत सुखु माना॥1॥
चौपाई · 2
हृदयँ बिचारि संभु प्रभुताई। सादर मुनिबर लिए बोलाई। सुदिनु सुनखतु सुघरी सोचाई। बेगि बेदबिधि लगन धराई॥2॥
चौपाई · 3
पत्री सप्तरिषिन्ह सोइ दीन्ही। गहि पद बिनय हिमाचल कीन्ही॥ जाइ बिधिहि तिन्ह दीन्हि सो पाती। बाचत प्रीति न हृदयँ समाती॥3॥
चौपाई · 4
लगन बाचि अज सबहि सुनाई। हरषे मुनि सब सुर समुदाई॥ सुमन बृष्टि नभ बाजन बाजे। मंगल कलस दसहुँ दिसि साजे॥4॥
दोहा · 91
लगे सँवारन सकल सुर बाहन बिबिध बिमान। होहिं सगुन मंगल सुभद करहिं अपछरा गान॥91॥
चौपाई · 1
सिवहि संभु गन करहिं सिंगारा। जटा मुकुट अहि मौरु सँवारा॥ कुंडल कंकन पहिरे ब्याला। तन बिभूति पट केहरि छाला॥1॥
चौपाई · 2
ससि ललाट सुंदर सिर गंगा। नयन तीनि उपबीत भुजंगा॥ गरल कंठ उर नर सिर माला। असिव बेष सिवधाम कृपाला॥2॥
चौपाई · 3
कर त्रिसूल अरु डमरु बिराजा। चले बसहँ चढ़ि बाजहिं बाजा॥ देखि सिवहि सुरत्रिय मुसुकाहीं। बर लायक दुलहिनि जग नाहीं॥3॥
चौपाई · 4
बिष्नु बिरंचि आदि सुरब्राता। चढ़ि चढ़ि बाहन चले बराता॥ सुर समाज सब भाँति अनूपा। नहिं बरात दूलह अनुरुपा॥4॥
दोहा · 92
बिष्नु कहा अस बिहसि तब बोलि सकल दिसिराज। बिलग बिलग होइ चलहु सब निज निज सहित समाज॥92॥
चौपाई · 1
बर अनुहारि बरात न भाई। हँसी करैहहु पर पुर जाई॥ बिष्नु बचन सुनि सुर मुसुकाने। निज निज सेन सहित बिलगाने॥1॥
चौपाई · 2
मनहीं मन महेसु मुसुकाहीं। हरि के बिंग्य बचन नहिं जाहीं॥ अति प्रिय बचन सुनत प्रिय केरे। भृंगिहि प्रेरि सकल गन टेरे॥2॥
चौपाई · 3
सिव अनुसासन सुनि सब आए। प्रभु पद जलज सीस तिन्ह नाए॥ नाना बाहन नाना बेषा। बिहसे सिव समाज निज देखा॥3॥
चौपाई · 4
कोउ मुख हीन बिपुल मुख काहू। बिनु पद कर कोउ बहु पद बाहू॥ बिपुल नयन कोउ नयन बिहीना। रिष्टपुष्ट कोउ अति तनखीना॥4॥
छन्द
तन कीन कोउ अति पीन पावन कोउ अपावन गति धरें। भूषन कराल कपाल कर सब सद्य सोनित तन भरें॥ खर स्वान सुअर सृकाल मुख गन बेष अगनित को गनै। बहु जिनस प्रेत पिसाच जोगि जमात बरनत नहिं बनै॥
सोरठा · 93
नाचहिं गावहिं गीत परम तरंगी भूत सब। देखत अति बिपरीत बोलहिं बचन बिचित्र बिधि॥93॥
चौपाई · 1
जस दूलहु तसि बनी बराता। कौतुक बिबिध होहिं मग जाता॥ इहाँ हिमाचल रचेउ बिताना। अति बिचित्र नहिं जाइ बखाना॥1॥
चौपाई · 2
सैल सकल जहँ लगि जग माहीं। लघु बिसाल नहिं बरनि सिराहीं॥ बन सागर सब नदी तलावा। हिमगिरि सब कहुँ नेवत पठावा॥2॥
चौपाई · 3
कामरुप सुंदर तन धारी। सहित समाज सहित बर नारी॥ गए सकल तुहिनाचल गेहा। गावहिं मंगल सहित सनेहा॥3॥
चौपाई · 4
प्रथमहिं गिरि बहु गृह सँवराए। जथाजोगु तहँ तहँ सब छाए॥ पुर सोभा अवलोकि सुहाई। लागइ लघु बिरंचि निपुनाई॥4॥
छन्द
लघु लाग बिधि की निपुनता अवलोकि पुर सोभा सही। बन बाग कूप तड़ाग सरिता सुभग सब सक को कही॥ मंगल बिपुल तोरन पताका केतु गृह गृह सोहहीं। बनिता पुरुष सुंदर चतुर छबि देखि मुनि मन मोहहीं॥
दोहा · 94
जगदंबा जहँ अवतरी सो पुरु बरनि कि जाइ। रिद्धि सिद्धि संपत्ति सुख नित नूतन अधिकाइ॥94॥
चौपाई · 1
नगर निकट बरात सुनि आई। पुर खरभरु सोभा अधिकाई॥ करि बनाव सजि बाहन नाना। चले लेन सादर अगवाना॥1॥
चौपाई · 2
हियँ हरषे सुर सेन निहारी। हरिहि देखि अति भए सुखारी॥ सिव समाज जब देखन लागे। बिडरि चले बाहन सब भागे॥2॥
चौपाई · 3
धरि धीरजु तहँ रहे सयाने। बालक सब लै जीव पराने॥ गएँ भवन पूछहिं पितु माता। कहहिं बचन भय कंपित गाता॥3॥
चौपाई · 4
कहिअ काह कहि जाइ न बाता। जम कर धार किधौं बरिआता॥ बरु बौराह बसहँ असवारा। ब्याल कपाल बिभूषन छारा॥4॥
छन्द
तन छार ब्याल कपाल भूषन नगन जटिल भयंकरा। सँग भूत प्रेत पिसाच जोगिनि बिकट मुख रजनीचरा॥ जो जिअत रहिहि बरात देखत पुन्य बड़ तेहि कर सही। देखिहि सो उमा बिबाहु घर घर बात असि लरिकन्ह कही॥
दोहा · 95
समुझि महेस समाज सब जननि जनक मुसुकाहिं। बाल बुझाए बिबिध बिधि निडर होहु डरु नाहिं॥95॥
चौपाई · 1
लै अगवान बरातहि आए। दिए सबहि जनवास सुहाए॥ मैनाँ सुभ आरती सँवारी। संग सुमंगल गावहिं नारी॥1॥
चौपाई · 2
कंचन थार सोह बर पानी। परिछन चली हरहि हरषानी॥ बिकट बेष रुद्रहि जब देखा। अबलन्ह उर भय भयउ बिसेषा॥2॥
चौपाई · 3
भागि भवन पैठीं अति त्रासा। गए महेसु जहाँ जनवासा॥ मैना हृदयँ भयउ दुखु भारी। लीन्ही बोली गिरीसकुमारी॥3॥
चौपाई · 4
अधिक सनेहँ गोद बैठारी। स्याम सरोज नयन भरे बारी॥ जेहिं बिधि तुम्हहि रूपु अस दीन्हा। तेहिं जड़ बरु बाउर कस कीन्हा॥4॥
छन्द
कस कीन्ह बरु बौराह बिधि जेहिं तुम्हहि सुंदरता दई। जो फलु चहिअ सुरतरुहिं सो बरबस बबूरहिं लागई॥ तुम्ह सहित गिरि तें गिरौं पावक जरौं जलनिधि महुँ परौं। घरु जाउ अपजसु होउ जग जीवत बिबाहु न हौं करौं॥
दोहा · 96
भईं बिकल अबला सकल दुखित देखि गिरिनारि। करि बिलापु रोदति बदति सुता सनेहु सँभारि॥96॥
दोहा
।
चौपाई · 1
नारद कर मैं काह बिगारा। भवनु मोर जिन्ह बसत उजारा॥ अस उपदेसु उमहि जिन्ह दीन्हा। बौरे बरहि लागि तपु कीन्हा॥1॥
चौपाई · 2
साचेहुँ उन्ह कें मोह न माया। उदासीन धनु धामु न जाया॥ पर घर घालक लाज न भीरा। बाँझ कि जान प्रसव कै पीरा॥2॥
चौपाई · 3
जननिहि बिकल बिलोकि भवानी। बोली जुत बिबेक मृदु बानी॥ अस बिचारि सोचहि मति माता। सो न टरइ जो रचइ बिधाता॥3॥
चौपाई · 4
करम लिखा जौं बाउर नाहू। तौ कत दोसु लगाइअ काहू॥ तुम्ह सन मिटहिं कि बिधि के अंका। मातु ब्यर्थ जनि लेहु कलंका॥4॥
छन्द
जनि लेहु मातु कलंकु करुना परिहरहु अवसर नहीं। दुखु सुखु जो लिखा लिलार हमरें जाब जहँ पाउब तहीं॥ सुनि उमा बचन बिनीत कोमल सकल अबला सोचहीं। बहु भाँति बिधिहि लगाइ दूषन नयन बारि बिमोचहीं॥
दोहा · 97
तेहि अवसर नारद सहित अरु रिषि सप्त समेत। समाचार सुनि तुहिनगिरि गवने तुरत निकेत॥97॥
चौपाई · 1
तब नारद सबही समुझावा। पूरुब कथा प्रसंगु सुनावा॥ मयना सत्य सुनहु मम बानी। जगदंबा तव सुता भवानी॥1॥
चौपाई · 2
अजा अनादि सक्ति अबिनासिनि। सदा संभु अरधंग निवासिनि॥ जग संभव पालन लय कारिनि। निज इच्छा लीला बपु धारिनि॥2॥
चौपाई · 3
जनमीं प्रथम दच्छ गृह जाई। नामु सती सुंदर तनु पाई॥ तहँहुँ सती संकरहि बिबाहीं। कथा प्रसिद्ध सकल जग माहीं॥3॥
चौपाई · 4
एक बार आवत सिव संगा। देखेउ रघुकुल कमल पतंगा॥ भयउ मोहु सिव कहा न कीन्हा। भ्रम बस बेषु सीय कर लीन्हा॥4॥
छन्द
सिय बेषु सतीं जो कीन्ह तेहिं अपराध संकर परिहरीं। हर बिरहँ जाइ बहोरि पितु कें जग्य जोगानल जरीं॥ अब जनमि तुम्हरे भवन निज पति लागि दारुन तपु किया। अस जानि संसय तजहु गिरिजा सर्बदा संकरप्रिया॥
दोहा · 98
सुनि नारद के बचन तब सब कर मिटा बिषाद। छन महुँ ब्यापेउ सकल पुर घर घर यह संबाद॥98॥
चौपाई · 1
तब मयना हिमवंतु अनंदे। पुनि पुनि पारबती पद बंदे॥ नारि पुरुष सिसु जुबा सयाने। नगर लोग सब अति हरषाने॥1॥
चौपाई · 2
लगे होन पुर मंगल गाना। सजे सबहिं हाटक घट नाना॥ भाँति अनेक भई जेवनारा। सूपसास्त्र जस कछु ब्यवहारा॥2॥
चौपाई · 3
सो जेवनार कि जाइ बखानी। बसहिं भवन जेहिं मातु भवानी॥ सादर बोले सकल बराती। बिष्नु बिरंचि देव सब जाती॥3॥
चौपाई · 4
बिबिधि पाँति बैठी जेवनारा। लागे परुसन निपुन सुआरा॥ नारिबृंद सुर जेवँत जानी। लगीं देन गारीं मृदु बानी॥4॥
छन्द
गारीं मधुर स्वर देहिं सुंदरि बिंग्य बचन सुनावहीं। भोजनु करहिं सुर अति बिलंबु बिनोदु सुनि सचु पावहीं॥ जेवँत जो बढ्यो अनंदु सो मुख कोटिहूँ न परै कह्यो। अचवाँइ दीन्हें पान गवने बास जहँ जाको रह्यो॥
दोहा · 99
बहुरि मुनिन्ह हिमवंत कहुँ लगन सुनाई आइ। समय बिलोकि बिबाह कर पठए देव बोलाइ॥99॥
चौपाई · 1
बोलि सकल सुर सादर लीन्हे। सबहि जथोचित आसन दीन्हे॥ बेदी बेद बिधान सँवारी। सुभग सुमंगल गावहिं नारी॥1॥
चौपाई · 2
सिंघासनु अति दिब्य सुहावा। जाइ न बरनि बिरंचि बनावा॥ बैठे सिव बिप्रन्ह सिरु नाई। हृदयँ सुमिरि निज प्रभु रघुराई॥2॥
चौपाई · 3
बहुरि मुनीसन्ह उमा बोलाईं। करि सिंगारु सखीं लै आईं॥ देखत रूपु सकल सुर मोहे। बरनै छबि अस जग कबि को है॥3॥
चौपाई · 4
जगदंबिका जानि भव भामा। सुरन्ह मनहिं मन कीन्ह प्रनामा॥ सुंदरता मरजाद भवानी। जाइ न कोटिहुँ बदन बखानी॥4॥
छन्द
कोटिहुँ बदन नहिं बनै बरनत जग जननि सोभा महा। सकुचहिं कहत श्रुति सेष सारद मंदमति तुलसीकहा॥ छबिखानि मातु भवानि गवनीं मध्य मंडप सिव जहाँ। अवलोकि सकहिं न सकुच पति पद कमल मनु मधुकरु तहाँ॥
दोहा · 100
मुनि अनुसासन गनपतिहि पूजेउ संभु भवानि। कोउ सुनि संसय करै जनि सुर अनादि जियँ जानि॥100॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।