बालकाण्ड · 21
रति को वरदान, देवताओं की प्राथना, सप्तर्षियों का पार्वती के पास जाना
बालकाण्ड का प्रकरण 21: रति को वरदान, देवताओं की प्राथना, सप्तर्षियों का पार्वती के पास जाना। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
चौपाई · 1
जब जदुबंस कृष्न अवतारा। होइहि हरन महा महिभारा॥ कृष्न तनय होइहि पति तोरा। बचनु अन्यथा होइ न मोरा॥1॥
चौपाई · 2
रति गवनी सुनि संकर बानी। कथा अपर अब कहउँ बखानी॥ देवन्ह समाचार सब पाए। ब्रह्मादिक बैकुंठ सिधाए॥2॥
चौपाई · 3
सब सुर बिष्नु बिरंचि समेता। गए जहाँ सिव कृपानिकेता॥ पृथक-पृथक तिन्ह कीन्हि प्रसंसा। भए प्रसन्न चंद्र अवतंसा॥3॥
चौपाई · 4
बोले कृपासिंधु बृषकेतू। कहहु अमर आए केहि हेतू॥ कह बिधि तुम्ह प्रभु अंतरजामी। तदपि भगति बस बिनवउँ स्वामी॥4॥
दोहा · 88
सकल सुरन्ह के हृदयँ अस संकर परम उछाहु। निज नयनन्हि देखा चहहिं नाथ तुम्हार बिबाहु॥88॥
चौपाई · 1
यह उत्सव देखिअ भरि लोचन। सोइ कछु करहु मदन मद मोचन॥ कामु जारि रति कहुँ बरु दीन्हा। कृपासिन्धु यह अति भल कीन्हा॥1॥
चौपाई · 2
सासति करि पुनि करहिं पसाऊ। नाथ प्रभुन्ह कर सहज सुभाऊ॥ पारबतीं तपु कीन्ह अपारा। करहु तासु अब अंगीकारा॥2॥
चौपाई · 3
सुनि बिधि बिनय समुझि प्रभु बानी। ऐसेइ होउ कहा सुखु मानी॥ तब देवन्ह दुंदुभीं बजाईं। बरषि सुमन जय जय सुर साईं॥3॥
चौपाई · 4
अवसरु जानि सप्तरिषि आए। तुरतहिं बिधि गिरिभवन पठाए॥ प्रथम गए जहँ रहीं भवानी। बोले मधुर बचन छल सानी॥4॥
दोहा · 89
कहा हमार न सुनेहु तब नारद कें उपदेस॥ अब भा झूठ तुम्हार पन जारेउ कामु महेस॥89॥
चौपाई · 1
सुनि बोलीं मुसुकाइ भवानी। उचित कहेहु मुनिबर बिग्यानी॥ तुम्हरें जान कामु अब जारा। अब लगि संभु रहे सबिकारा॥1॥
चौपाई · 2
हमरें जान सदासिव जोगी। अज अनवद्य अकाम अभोगी॥ जौं मैं सिव सेये अस जानी। प्रीति समेत कर्म मन बानी॥2॥
चौपाई · 3
तौ हमार पन सुनहु मुनीसा। करिहहिं सत्य कृपानिधि ईसा॥ तुम्ह जो कहा हर जारेउ मारा। सोइ अति बड़ अबिबेकु तुम्हारा॥3॥
चौपाई · 4
तात अनल कर सहज सुभाऊ। हिम तेहि निकट जाइ नहिं काऊ॥ गएँ समीप सो अवसि नसाई। असि मन्मथ महेस की नाई॥4॥
दोहा · 90
हियँ हरषे मुनि बचन सुनि देखि प्रीति बिस्वास। चले भवानिहि नाइ सिर गए हिमाचल पास॥90॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।