बालकाण्ड · 18

दक्ष यज्ञ विध्वंस, पार्वती का जन्म और तपस्या

बालकाण्ड का प्रकरण 18: दक्ष यज्ञ विध्वंस, पार्वती का जन्म और तपस्या। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।

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चौपाई · 1

समाचार सब संकर पाए। बीरभद्रु करि कोप पठाए॥ जग्य बिधंस जाइ तिन्ह कीन्हा। सकल सुरन्ह बिधिवत फलु दीन्हा॥1॥

चौपाई · 2

भै जगबिदित दच्छ गति सोई। जसि कछु संभु बिमुख कै होई॥ यह इतिहास सकल जग जानी। ताते मैं संछेप बखानी॥2॥

चौपाई · 3

सतीं मरत हरि सन बरु मागा। जनम जनम सिव पद अनुरागा॥ तेहि कारन हिमगिरि गृह जाई। जनमीं पारबती तनु पाई॥3॥

चौपाई · 4

जब तें उमा सैल गृह जाईं। सकल सिद्धि संपति तहँ छाईं॥ जहँ तहँ मुनिन्ह सुआश्रम कीन्हे। उचित बास हिम भूधर दीन्हे॥4॥

दोहा · 65

सदा सुमन फल सहित सब द्रुम नव नाना जाति। प्रगटीं सुंदर सैल पर मनि आकर बहु भाँति॥65॥

चौपाई · 1

सरिता सब पुनीत जलु बहहीं। खग मृग मधुप सुखी सब रहहीं॥ सहज बयरु सब जीवन्ह त्यागा। गिरि पर सकल करहिं अनुरागा॥1॥

चौपाई · 2

सोह सैल गिरिजा गृह आएँ। जिमि जनु रामभगति के पाएँ॥ नित नूतन मंगल गृह तासू। ब्रह्मादिक गावहिं जसु जासू॥2॥

चौपाई · 3

नारद समाचार सब पाए। कोतुकहीं गिरि गेह सिधाए॥ सैलराज बड़ आदर कीन्हा। पद पखारि बर आसनु दीन्हा॥3॥

चौपाई · 4

नारि सहित मुनि पद सिरु नावा। चरन सलिल सबु भवनु सिंचावा॥ निज सौभाग्य बहुत गिरि बरना। सुता बोलि मेली मुनि चरना॥4॥

दोहा · 66

त्रिकालग्य सर्बग्य तुम्ह गति सर्बत्र तुम्हारि। कहहु सुता के दोष गुन मुनिबर हृदयँ बिचारि॥66॥

चौपाई · 1

कह मुनि बिहसि गूढ़ मृदु बानी। सुता तुम्हारि सकल गुन खानी॥ सुंदर सहज सुसील सयानी। नाम उमा अंबिका भवानी॥1॥

चौपाई · 2

सब लच्छन संपन्न कुमारी। होइहि संतत पियहि पिआरी॥ सदा अचल एहि कर अहिवाता। एहि तें जसु पैहहिं पितु माता॥2॥

चौपाई · 3

होइहि पूज्य सकल जग माहीं। एहि सेवत कछु दुर्लभ नाहीं॥ एहि कर नामु सुमिरि संसारा। त्रिय चढ़िहहिं पतिब्रत असिधारा॥3॥

चौपाई · 4

सैल सुलच्छन सुता तुम्हारी। सुनहु जे अब अवगुन दुइ चारी॥ अगुन अमान मातु पितु हीना। उदासीन सब संसय छीना॥4॥

दोहा · 67

जोगी जटिल अकाम मन नगन अमंगल बेष। अस स्वामी एहि कहँ मिलिहि परी हस्त असि रेख॥67॥

चौपाई · 1

सुनि मुनि गिरा सत्य जियँ जानी। दुख दंपतिहि उमा हरषानी॥ नारदहूँ यह भेदु न जाना। दसा एक समुझब बिलगाना॥1॥

चौपाई · 2

सकल सखीं गिरिजा गिरि मैना। पुलक सरीर भरे जल नैना॥ होइ न मृषा देवरिषि भाषा। उमा सो बचनु हृदयँ धरि राखा॥2॥

चौपाई · 3

उपजेउ सिव पद कमल सनेहू। मिलन कठिन मन भा संदेहू॥ जानि कुअवसरु प्रीति दुराई। सखी उछँग बैठी पुनि जाई॥3॥

चौपाई · 4

झूठि न होइ देवरिषि बानी। सोचहिं दंपति सखीं सयानी॥ उर धरि धीर कहइ गिरिराऊ। कहहु नाथ का करिअ उपाऊ॥4॥

दोहा · 68

कह मुनीस हिमवंत सुनु जो बिधि लिखा लिलार। देव दनुज नर नाग मुनि कोउ न मेटनिहार॥68॥

चौपाई · 1

तदपि एक मैं कहउँ उपाई। होइ करै जौं दैउ सहाई॥ जस बरु मैं बरनेउँ तुम्ह पाहीं। मिलिहि उमहि तस संसय नाहीं॥1॥

चौपाई · 2

जे जे बर के दोष बखाने। ते सब सिव पहिं मैं अनुमाने॥ जौं बिबाहु संकर सन होई। दोषउ गुन सम कह सबु कोई॥2॥

चौपाई · 3

जौं अहि सेज सयन हरि करहीं। बुध कछु तिन्ह कर दोषु न धरहीं॥ भानु कृसानु सर्ब रस खाहीं। तिन्ह कहँ मंद कहत कोउ नाहीं॥3॥

चौपाई · 4

सुभ अरु असुभ सलिल सब बहई। सुरसरि कोउ अपुनीत न कहई॥ समरथ कहुँ नहिं दोषु गोसाईं। रबि पावक सुरसरि की नाईं॥4॥

दोहा · 69

जौं अस हिसिषा करहिं नर जड़ बिबेक अभिमान। परहिं कलप भरि नरक महुँ जीव कि ईस समान॥69॥

चौपाई · 1

सुरसरि जल कृत बारुनि जाना। कबहुँ न संत करहिं तेहि पाना॥ सुरसरि मिलें सो पावन जैसें। ईस अनीसहि अंतरु तैसें॥1॥

चौपाई · 2

संभु सहज समरथ भगवाना। एहि बिबाहँ सब बिधि कल्याना॥ दुराराध्य पै अहहिं महेसू। आसुतोष पुनि किएँ कलेसू॥2॥

चौपाई · 3

जौं तपु करै कुमारि तुम्हारी। भाविउ मेटि सकहिं त्रिपुरारी॥ जद्यपि बर अनेक जग माहीं। एहि कहँ सिव तजि दूसर नाहीं॥3॥

चौपाई · 4

बर दायक प्रनतारति भंजन। कृपासिंधु सेवक मन रंजन॥ इच्छित फल बिनु सिव अवराधें। लहिअ न कोटि जोग जप साधें॥4॥

दोहा · 70

अस कहि नारद सुमिरि हरि गिरिजहि दीन्हि असीस। होइहि यह कल्यान अब संसय तजहु गिरीस॥70॥

चौपाई · 1

कहि अस ब्रह्मभवन मुनि गयऊ। आगिल चरित सुनहु जस भयऊ॥ पतिहि एकांत पाइ कह मैना। नाथ न मैं समुझे मुनि बैना॥1॥

चौपाई · 2

जौं घरु बरु कुलु होइ अनूपा। करिअ बिबाहु सुता अनुरुपा॥ न त कन्या बरु रहउ कुआरी। कंत उमा मम प्रानपिआरी॥2॥

चौपाई · 3

जौं न मिलिहि बरु गिरिजहि जोगू। गिरि जड़ सहज कहिहि सबु लोगू॥ सोइ बिचारि पति करेहु बिबाहू। जेहिं न बहोरि होइ उर दाहू॥3॥

चौपाई · 4

अस कहि परी चरन धरि सीसा। बोले सहित सनेह गिरीसा॥ बरु पावक प्रगटै ससि माहीं। नारद बचनु अन्यथा नाहीं॥4॥

दोहा · 71

प्रिया सोचु परिहरहु सबु सुमिरहु श्रीभगवान। पारबतिहि निरमयउ जेहिं सोइ करिहि कल्यान॥71॥

चौपाई · 1

अब जौं तुम्हहि सुता पर नेहू। तौ अस जाइ सिखावनु देहू॥ करै सो तपु जेहिं मिलहिं महेसू। आन उपायँ न मिटिहि कलेसू॥1॥

चौपाई · 2

नारद बचन सगर्भ सहेतू। सुंदर सब गुन निधि बृषकेतू॥ अस बिचारि तुम्ह तजहु असंका। सबहि भाँति संकरु अकलंका॥2॥

चौपाई · 3

सुनि पति बचन हरषि मन माहीं। गई तुरत उठि गिरिजा पाहीं॥ उमहि बिलोकि नयन भरे बारी। सहित सनेह गोद बैठारी॥3॥

दोहा · 4

बारहिं बार लेति उर लाई। गदगद कंठ न कछु कहि जाई॥ जगत मातु सर्बग्य भवानी। मातु सुखद बोलीं मृदु बानी॥4॥

दोहा · 72

सुनहि मातु मैं दीख अस सपन सुनावउँ तोहि। सुंदर गौर सुबिप्रबर अस उपदेसेउ मोहि॥72॥

चौपाई · 1

करहि जाइ तपु सैलकुमारी। नारद कहा सो सत्य बिचारी॥ मातु पितहि पुनि यह मत भावा। तपु सुखप्रद दुख दोष नसावा॥1॥

चौपाई · 2

तपबल रचइ प्रपंचु बिधाता। तपबल बिष्नु सकल जग त्राता॥ तपबल संभु करहिं संघारा। तपबल सेषु धरइ महिभारा॥2॥

चौपाई · 3

तप अधार सब सृष्टि भवानी। करहि जाइ तपु अस जियँ जानी॥ सुनत बचन बिसमित महतारी। सपन सुनायउ गिरिहि हँकारी॥3॥

चौपाई · 4

मातु पितहि बहुबिधि समुझाई। चलीं उमा तप हित हरषाई॥ प्रिय परिवार पिता अरु माता। भए बिकल मुख आव न बाता॥4॥

दोहा · 73

बेदसिरा मुनि आइ तब सबहि कहा समुझाइ। पारबती महिमा सुनत रहे प्रबोधहि पाइ॥73॥

चौपाई · 1

उर धरि उमा प्रानपति चरना। जाइ बिपिन लागीं तपु करना॥ अति सुकुमार न तनु तप जोगू। पति पद सुमिरि तजेउ सबु भोगू॥1॥

चौपाई · 2

नित नव चरन उपज अनुरागा। बिसरी देह तपहिं मनु लागा॥ संबत सहस मूल फल खाए। सागु खाइ सत बरष गवाँए॥2॥

चौपाई · 3

कछु दिन भोजनु बारि बतासा। किए कठिन कछु दिन उपबासा॥ बेल पाती महि परइ सुखाई। तीनि सहस संबत सोइ खाई॥3॥

चौपाई · 4

पुनि परिहरे सुखानेउ परना। उमहि नामु तब भयउ अपरना॥ देखि उमहि तप खीन सरीरा। ब्रह्मगिरा भै गगन गभीरा॥4॥

दोहा · 74

भयउ मनोरथ सुफल तव सुनु गिरिराजकुमारि। परिहरु दुसह कलेस सब अब मिलिहहिं त्रिपुरारि॥74॥

चौपाई · 1

अस तपु काहुँ न कीन्ह भवानी। भए अनेक धीर मुनि ग्यानी॥ अब उर धरहु ब्रह्म बर बानी। सत्य सदा संतत सुचि जानी॥1॥

चौपाई · 2

आवै पिता बोलावन जबहीं। हठ परिहरि घर जाएहु तबहीं॥ मिलहिं तुम्हहि जब सप्त रिषीसा। जानेहु तब प्रमान बागीसा॥2॥

चौपाई · 3

सुनत गिरा बिधि गगन बखानी। पुलक गात गिरिजा हरषानी॥ उमा चरित सुंदर मैं गावा। सुनहु संभु कर चरित सुहावा॥3॥

चौपाई · 4

जब तें सतीं जाइ तनु त्यागा। तब तें सिव मन भयउ बिरागा॥ जपहिं सदा रघुनायक नामा। जहँ तहँ सुनहिं राम गुन ग्रामा॥4॥

दोहा · 75

चिदानंद सुखधाम सिव बिगत मोह मद काम। बिचरहिं महि धरि हृदयँ हरि सकल लोक अभिराम॥75॥

चौपाई · 1

कतहुँ मुनिन्ह उपदेसहिं ग्याना। कतहुँ राम गुन करहिं बखाना॥ जदपि अकाम तदपि भगवाना। भगत बिरह दुख दुखित सुजाना॥1॥

चौपाई · 2

एहि बिधि गयउ कालु बहु बीती। नित नै होइ राम पद प्रीती॥ नेमु प्रेमु संकर कर देखा। अबिचल हृदयँ भगति कै रेखा॥2॥

चौपाई · 3

प्रगटे रामु कृतग्य कृपाला। रूप सील निधि तेज बिसाला॥ बहु प्रकार संकरहि सराहा। तुम्ह बिनु अस ब्रतु को निरबाहा॥3॥

चौपाई · 4

बहुबिधि राम सिवहि समुझावा। पारबती कर जन्मु सुनावा॥ अति पुनीत गिरिजा कै करनी। बिस्तर सहित कृपानिधि बरनी॥4॥

दोहा · 76

अब बिनती मम सुनहु सिव जौं मो पर निज नेहु। जाइ बिबाहहु सैलजहि यह मोहि मागें देहु॥76॥

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गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।