बालकाण्ड · 17
सती जी का दक्ष यज्ञ में जाना और योगाग्नि से जल जाना- Sati ji visits Daksh’s yajna and Her self immolation
बालकाण्ड का प्रकरण 17: सती जी का दक्ष यज्ञ में जाना और योगाग्नि से जल जाना- Sati ji visits Daksh’s yajna and Her self immolation। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
चौपाई · 1
कहेहु नीक मोरेहूँ मन भावा। यह अनुचित नहिं नेवत पठावा॥ दच्छ सकल निज सुता बोलाईं। हमरें बयर तुम्हउ बिसराईं॥1॥
चौपाई · 2
ब्रह्मसभाँ हम सन दुखु माना। तेहि तें अजहुँ करहिं अपमाना॥ जौं बिनु बोलें जाहु भवानी। रहइ न सीलु सनेहु न कानी॥2॥
चौपाई · 3
जदपि मित्र प्रभु पितु गुर गेहा। जाइअ बिनु बोलेहुँ न सँदेहा॥ तदपि बिरोध मान जहँ कोई। तहाँ गएँ कल्यानु न होई॥3॥
चौपाई · 4
भाँति अनेक संभु समुझावा। भावी बस न ग्यानु उर आवा॥ कह प्रभु जाहु जो बिनहिं बोलाएँ। नहिं भलि बात हमारे भाएँ॥4॥
दोहा · 62
कहि देखा हर जतन बहु रहइ न दच्छकुमारि। दिए मुख्य गन संग तब बिदा कीन्ह त्रिपुरारि॥62॥
चौपाई · 1
पिता भवन जब गईं भवानी। दच्छ त्रास काहुँ न सनमानी॥ सादर भलेहिं मिली एक माता। भगिनीं मिलीं बहुत मुसुकाता॥1॥
चौपाई · 2
दच्छ न कछु पूछी कुसलाता। सतिहि बिलोकी जरे सब गाता॥ सतीं जाइ देखेउ तब जागा। कतहूँ न दीख संभु कर भागा॥2॥
चौपाई · 3
तब चित चढ़ेउ जो संकर कहेऊ। प्रभु अपमानु समुझि उर दहेऊ॥ पाछिल दुखु न हृदयँ अस ब्यापा। जस यह भयउ महा परितापा॥3॥
चौपाई · 4
जद्यपि जग दारुन दुख नाना। सब तें कठिन जाति अवमाना॥ समुझि सो सतिहि भयउ अति क्रोधा। बहु बिधि जननीं कीन्ह प्रबोधा॥4॥
दोहा · 63
सिव अपमानु न जाइ सहि हृदयँ न होइ प्रबोध। सकल सभहि हठि हटकि तब बोलीं बचन सक्रोध॥63॥
चौपाई · 1
सुनहु सभासद सकल मुनिंदा। कही सुनी जिन्ह संकर निंदा॥ सो फलु तुरत लहब सब काहूँ। भली भाँति पछिताब पिताहूँ॥1॥
चौपाई · 2
संत संभु श्रीपति अपबादा। सुनिअ जहाँ तहँ असि मरजादा॥ काटिअ तासु जीभ जो बसाई। श्रवन मूदि न त चलिअ पराई॥2॥
चौपाई · 3
जगदातमा महेसु पुरारी। जगत जनक सब के हितकारी॥ पिता मंदमति निंदत तेही। दच्छ सुक्र संभव यह देही॥3॥
चौपाई · 4
तजिहउँ तुरत देह तेहि हेतू। उर धरि चंद्रमौलि बृषकेतू॥ अस कहि जोग अगिनि तनु जारा। भयउ सकल मख हाहाकारा॥4॥
दोहा · 64
सती मरनु सुनि संभु गन लगे करन मख खीस। जग्य बिधंस बिलोकि भृगु रच्छा कीन्हि मुनीस॥64॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।