अयोध्याकाण्ड · 44

जनक-वशिष्ठादि संवाद, इंद्र की चिंता, सरस्वती का इंद्र को समझाना

अयोध्याकाण्ड का प्रकरण 44: जनक-वशिष्ठादि संवाद, इंद्र की चिंता, सरस्वती का इंद्र को समझाना। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।

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दोहा · 291

ग्यान निधान सुजान सुचि धरम धीर नरपाल। तुम्ह बिनु असमंजस समन को समरथ एहि काल॥291॥

चौपाई · 1

सुनि मुनि बचन जनक अनुरागे। लखि गति ग्यानु बिरागु बिरागे॥ सिथिल सनेहँ गुनत मन माहीं। आए इहाँ कीन्ह भल नाहीं॥1॥

चौपाई · 2

रामहि रायँ कहेउ बन जाना। कीन्ह आपु प्रिय प्रेम प्रवाना॥ हम अब बन तें बनहि पठाई। प्रमुदित फिरब बिबेक बड़ाई॥2॥

चौपाई · 3

तापस मुनि महिसुर सुनि देखी। भए प्रेम बस बिकल बिसेषी॥ समउ समुझि धरि धीरजु राजा। चले भरत पहिं सहित समाजा॥3॥

चौपाई · 4

भरत आइ आगें भइ लीन्हे। अवसर सरिस सुआसन दीन्हे॥ तात भरत कह तेरहुति राऊ। तुम्हहि बिदित रघुबीर सुभाऊ॥4॥

दोहा · 292

राम सत्यब्रत धरम रत सब कर सीलु स्नेहु। संकट सहत सकोच बस कहिअ जो आयसु देहु ॥292॥

चौपाई · 1

सुनि तन पुलकि नयन भरि बारी। बोले भरतु धीर धरि भारी॥ प्रभु प्रिय पूज्य पिता सम आपू। कुलगुरु सम हित माय न बापू॥1॥

चौपाई · 2

कौसिकादि मुनि सचिव समाजू। ग्यान अंबुनिधि आपुनु आजू॥ सिसु सेवकु आयसु अनुगामी। जानि मोहि सिख देइअ स्वामी॥2॥

चौपाई · 3

एहिं समाज थल बूझब राउर। मौन मलिन मैं बोलब बाउर॥ छोटे बदन कहउँ बड़ि बाता। छमब तात लखि बाम बिधाता॥3॥

चौपाई · 4

आगम निगम प्रसिद्ध पुराना। सेवाधरमु कठिन जगु जाना॥ स्वामि धरम स्वारथहि बिरोधू। बैरु अंध प्रेमहि न प्रबोधू॥4॥

दोहा · 293

राखि राम रुख धरमु ब्रतु पराधीन मोहि जानि। सब कें संमत सर्ब हित करिअ प्रेमु पहिचानि॥293॥

चौपाई · 1

भरत बचन सुनि देखि सुभाऊ। सहित समाज सराहत राऊ॥ सुगम अगम मृदु मंजु कठोरे। अरथु अमित अति आखर थोरे॥1॥

चौपाई · 2

ज्यों मुखु मुकुर मुकुरु निज पानी। गहि न जाइ अस अदभुत बानी॥ भूप भरतू मुनि सहित समाजू। गे जहँ बिबुध कुमुद द्विजराजू॥2॥

चौपाई · 3

सुनि सुधि सोच बिकल सब लोगा। मनहुँ मीनगन नव जल जोगा॥ देवँ प्रथम कुलगुर गति देखी। निरखि बिदेह सनेह बिसेषी॥3॥

चौपाई · 4

राम भगतिमय भरतु निहारे। सुर स्वारथी हहरि हियँ हारे॥ सब कोउ राम प्रेममय पेखा। भए अलेख सोच बस लेखा॥4॥

दोहा · 294

रामु सनेह सकोच बस कह ससोच सुरराजु। रचहु प्रपंचहि पंच मिलि नाहिं त भयउ अकाजु॥294॥

चौपाई · 1

सुरन्ह सुमिरि सारदा सराही। देबि देव सरनागत पाही॥ फेरि भरत मति करि निज माया। पालु बिबुध कुल करि छल छाया॥1॥

चौपाई · 2

बिबुध बिनय सुनि देबि सयानी। बोली सुर स्वारथ जड़ जानी॥ मो सन कहहु भरत मति फेरू। लोचन सहस न सूझ सुमेरू॥2॥

चौपाई · 3

बिधि हरि हर माया बड़ि भारी। सोउ न भरत मति सकइ निहारी॥ सो मति मोहि कहत करु भोरी। चंदिनि कर कि चंडकर चोरी॥3॥

चौपाई · 4

भरत हृदयँ सिय राम निवासू। तहँ कि तिमिर जहँ तरनि प्रकासू॥ अस कहि सारद गइ बिधि लोका। बिबुध बिकल निसि मानहुँ कोका॥4॥

दोहा · 295

सुर स्वारथी मलीन मन कीन्ह कुमंत्र कुठाटु। रचि प्रपंच माया प्रबल भय भ्रम अरति उचाटु॥295॥

चौपाई · 1

करि कुचालि सोचत सुरराजू। भरत हाथ सबु काजु अकाजू॥ गए जनकु रघुनाथ समीपा। सनमाने सब रबिकुल दीपा॥1॥

चौपाई · 2

समय समाज धरम अबिरोधा। बोले तब रघुबंस पुरोधा॥ जनक भरत संबादु सुनाई। भरत कहाउति कही सुहाई॥2॥

चौपाई · 3

तात राम जस आयसु देहू। सो सबु करै मोर मत एहू॥ सुनि रघुनाथ जोरि जुग पानी। बोले सत्य सरल मृदु बानी॥3॥

चौपाई · 4

बिद्यमान आपुनि मिथिलेसू। मोर कहब सब भाँति भदेसू॥ राउर राय रजायसु होई। राउरि सपथ सही सिर सोई॥4॥

दोहा · 296

राम सपथ सुनि मुनि जनकु सकुचे सभा समेत। सकल बिलोकत भरत मुखु बनइ न ऊतरु देत॥296॥

चौपाई · 1

सभा सकुच बस भरत निहारी। राम बंधु धरि धीरजु भारी॥ कुसमउ देखि सनेहु सँभारा। बढ़त बिंधि जिमि घटज निवारा॥1॥

चौपाई · 2

सोक कनकलोचन मति छोनी। हरी बिमल गुन गन जगजोनी॥ भरत बिबेक बराहँ बिसाला। अनायास उधरी तेहि काला॥2॥

चौपाई · 3

करि प्रनामु सब कहँ कर जोरे। रामु राउ गुर साधु निहोरे॥ छमब आजु अति अनुचित मोरा। कहउँ बदन मृदु बचन कठोरा॥3॥

चौपाई · 4

हियँ सुमिरी सारदा सुहाई। मानस तें मुख पंकज आई॥ बिमल बिबेक धरम नय साली। भरत भारती मंजु मराली॥4॥

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गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।