अयोध्याकाण्ड · 43
श्री सीताजी का शील, जनक-सुनयना संवाद, भरतजी की महिमा
अयोध्याकाण्ड का प्रकरण 43: श्री सीताजी का शील, जनक-सुनयना संवाद, भरतजी की महिमा। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
दोहा · 285
अस कहि पग परि प्रेम अति सिय हित बिनय सुनाइ। सिय समेत सियमातु तब चली सुआयसु पाइ॥285॥
चौपाई · 1
प्रिय परिजनहि मिली बैदेही। जो जेहि जोगु भाँति तेहि तेही॥ तापस बेष जानकी देखी। भा सबु बिकल बिषाद बिसेषी॥1॥
चौपाई · 2
जनक राम गुर आयसु पाई। चले थलहि सिय देखी आई॥ लीन्हि लाइ उर जनक जानकी। पाहुनि पावन प्रेम प्रान की॥2॥
चौपाई · 3
उर उमगेउ अंबुधि अनुरागू। भयउ भूप मनु मनहुँ पयागू॥ सिय सनेह बटु बाढ़त जोहा। ता पर राम पेम सिसु सोहा॥3॥
चौपाई · 4
चिरजीवी मुनि ग्यान बिकल जनु। बूड़त लहेउ बाल अवलंबनु॥ मोह मगन मति नहिं बिदेह की। महिमा सिय रघुबर सनेह की॥4॥
दोहा · 286
सिय पितु मातु सनेह बस बिकल न सकी सँभारि। धरनिसुताँ धीरजु धरेउ समउ सुधरमु बिचारि॥286॥
चौपाई · 1
तापस बेष जनक सिय देखी। भयउ पेमु परितोषु बिसेषी॥ पुत्रि पबित्र किए कुल दोऊ। सुजस धवल जगु कह सबु कोऊ॥1॥
चौपाई · 2
जिति सुरसरि कीरति सरि तोरी। गवनु कीन्ह बिधि अंड करोरी॥ गंग अवनि थल तीनि बड़ेरे। एहिं किए साधु समाज घनेरे॥2॥
चौपाई · 3
पितु कह सत्य सनेहँ सुबानी। सीय सकुच महुँ मनहुँ समानी॥ पुनि पितु मातु लीन्हि उर लाई। सिख आसिष हित दीन्हि सुहाई॥3॥
चौपाई · 4
कहति न सीय सकुचि मन माहीं। इहाँ बसब रजनीं भल नाहीं॥ लखि रुख रानि जनायउ राऊ। हृदयँ सराहत सीलु सुभाऊ॥4॥
दोहा · 287
बार बार मिलि भेंटि सिय बिदा कीन्हि सनमानि। कही समय सिर भरत गति रानि सुबानि सयानि॥287॥
चौपाई · 1
सुनि भूपाल भरत ब्यवहारू। सोन सुगंध सुधा ससि सारू॥ मूदे सजन नयन पुलके तन। सुजसु सराहन लगे मुदित मन॥1॥
चौपाई · 2
सावधान सुनु सुमुखि सुलोचनि। भरत कथा भव बंध बिमोचनि॥ धरम राजनय ब्रह्मबिचारू। इहाँ जथामति मोर प्रचारू॥2॥
चौपाई · 3
सो मति मोरि भरत महिमाही। कहै काह छलि छुअति न छाँही॥ बिधि गनपति अहिपति सिव सारद। कबि कोबिद बुध बुद्धि बिसारद॥3॥
चौपाई · 4
भरत चरित कीरति करतूती। धरम सील गुन बिमल बिभूती॥ समुझत सुनत सुखद सब काहू। सुचि सुरसरि रुचि निदर सुधाहू॥4॥
दोहा · 288
निरवधि गुन निरुपम पुरुषु भरतु भरत सम जानि। कहिअ सुमेरु कि सेर सम कबिकुल मति सकुचानि॥288॥
चौपाई · 1
अगम सबहि बरनत बरबरनी। जिमि जलहीन मीन गमु धरनी॥ भरत अमित महिमा सुनु रानी। जानहिं रामु न सकहिं बखानी॥1॥
चौपाई · 2
बरनि सप्रेम भरत अनुभाऊ। तिय जिय की रुचि लखि कह राऊ॥ बहुरहिं लखनु भरतु बन जाहीं। सब कर भल सब के मन माहीं॥2॥
चौपाई · 3
देबि परन्तु भरत रघुबर की। प्रीति प्रतीति जाइ नहिं तरकी॥ भरतु अवधि सनेह ममता की। जद्यपि रामु सीम समता की॥3॥
चौपाई · 4
परमारथ स्वारथ सुख सारे। भरत न सपनेहुँ मनहुँ निहारे॥ साधन सिद्धि राम पग नेहू। मोहि लखि परत भरत मत एहू॥4॥
दोहा · 289
भोरेहुँ भरत न पेलिहहिं मनसहुँ राम रजाइ। करिअ न सोचु सनेह बस कहेउ भूप बिलखाइ॥289॥
चौपाई · 1
राम भरत गुन गनत सप्रीती। निसि दंपतिहि पलक सम बीती॥ राज समाज प्रात जुग जागे। न्हाइ न्हाइ सुर पूजन लागे॥1॥
चौपाई · 2
गे नहाइ गुर पहिं रघुराई। बंदि चरन बोले रुख पाई॥ नाथ भरतु पुरजन महतारी। सोक बिकल बनबास दुखारी॥2॥
चौपाई · 3
सहित समाज राउ मिथिलेसू। बहुत दिवस भए सहत कलेसू॥ उचित होइ सोइ कीजिअ नाथा। हित सबही कर रौरें हाथा॥3॥
चौपाई · 4
अस कहि अति सकुचे रघुराऊ। मुनि पुल के लखि सीलु सुभाऊ॥ तुम्ह बिनु राम सकल सुख साजा। नरक सरिस दुहु राज समाजा॥4॥
दोहा · 290
प्रान-प्रान के जीव के जिव सुख के सुख राम। तुम्ह तजि तात सोहात गृह जिन्हहि तिन्हहि बिधि बाम॥290॥
चौपाई · 1
सो सुखु करमु धरमु जरि जाऊ। जहँ न राम पद पंकज भाऊ॥ जोगु कुजोगु ग्यानु अग्यानू। जहँ नहिं राम प्रेम परधानू॥1॥
चौपाई · 2
तुम्ह बिनु दुखी सुखी तुम्ह तेहीं। तुम्ह जानहु जिय जो जेहि केहीं॥ राउर आयसु सिर सबही कें। बिदित कृपालहि गति सब नीकें॥2॥
चौपाई · 3
आपु आश्रमहि धारिअ पाऊ। भयउ सनेह सिथिल मुनिराऊ॥ करि प्रनामु तब रामु सिधाए। रिषि धरि धीर जनक पहिं आए॥3॥
चौपाई · 4
राम बचन गुरु नृपहि सुनाए। सील सनेह सुभायँ सुहाए॥ महाराज अब कीजिअ सोई। सब कर धरम सहित हित होई॥4॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।