अयोध्याकाण्ड · 19

यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम

अयोध्याकाण्ड का प्रकरण 19: यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।

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दोहा · 111

तब रघुबीर अनेक बिधि सखहि सिखावनु दीन्ह।। राम रजायसु सीस धरि भवन गवनु तेइँ कीन्ह॥111॥

चौपाई · 1

पुनि सियँ राम लखन कर जोरी। जमुनहि कीन्ह प्रनामु बहोरी॥ चले ससीय मुदित दोउ भाई। रबितनुजा कइ करत बड़ाई॥1॥

चौपाई · 2

पथिक अनेक मिलहिं मग जाता। कहहिं सप्रेम देखि दोउ भ्राता॥ राज लखन सब अंग तुम्हारें। देखि सोचु अति हृदय हमारें॥2॥

चौपाई · 3

मारग चलहु पयादेहि पाएँ। ज्योतिषु झूठ हमारें भाएँ॥ अगमु पंथु गिरि कानन भारी। तेहि महँ साथ नारि सुकुमारी॥3॥

चौपाई · 4

करि केहरि बन जाइ न जोई। हम सँग चलहिं जो आयसु होई॥ जाब जहाँ लगि तहँ पहुँचाई। फिरब बहोरि तुम्हहि सिरु नाई॥4॥

दोहा · 112

एहि बिधि पूँछहिं प्रेम बस पुलक गात जलु नैन। कृपासिंधु फेरहिं तिन्हहि कहि बिनीत मृदु बैन॥112॥

चौपाई · 1

जे पुर गाँव बसहिं मग माहीं। तिन्हहि नाग सुर नगर सिहाहीं॥ केहि सुकृतीं केहि घरीं बसाए। धन्य पुन्यमय परम सुहाए॥1॥

चौपाई · 2

जहँ जहँ राम चरन चलि जाहीं। तिन्ह समान अमरावति नाहीं॥ पुन्यपुंज मग निकट निवासी। तिन्हहि सराहहिं सुरपुरबासी॥2॥

चौपाई · 3

जे भरि नयन बिलोकहिं रामहि। सीता लखन सहित घनस्यामहि॥ जे सर सरित राम अवगाहहिं। तिन्हहि देव सर सरित सराहहिं॥3॥

चौपाई · 4

जेहि तरु तर प्रभु बैठहिं जाई। करहिं कलपतरु तासु बड़ाई॥ परसि राम पद पदुम परागा। मानति भूमि भूरि निज भागा॥4॥

दोहा · 113

छाँह करहिं घन बिबुधगन बरषहिं सुमन सिहाहिं। देखत गिरि बन बिहग मृग रामु चले मग जाहिं॥113॥

चौपाई · 1

सीता लखन सहित रघुराई। गाँव निकट जब निकसहिं जाई॥ सुनि सब बाल बृद्ध नर नारी। चलहिं तुरत गृह काजु बिसारी॥1॥

चौपाई · 2

राम लखन सिय रूप निहारी। पाइ नयन फलु होहिं सुखारी॥ सजल बिलोचन पुलक सरीरा। सब भए मगन देखि दोउ बीरा॥2॥

चौपाई · 3

बरनि न जाइ दसा तिन्ह केरी। लहि जनु रंकन्ह सुरमनि ढेरी॥ एकन्ह एक बोलि सिख देहीं। लोचन लाहु लेहु छन एहीं॥3॥

चौपाई · 4

रामहि देखि एक अनुरागे। चितवत चले जाहिं सँग लागे॥ एक नयन मग छबि उर आनी। होहिं सिथिल तन मन बर बानी॥4॥

दोहा · 114

एक देखि बट छाँह भलि डासि मृदुल तृन पात। कहहिं गवाँइअ छिनुकु श्रमु गवनब अबहिंकि प्रात॥114॥

चौपाई · 1

एक कलस भरि आनहिं पानी। अँचइअ नाथ कहहिं मृदु बानी॥ सुनि प्रिय बचन प्रीति अति देखी। राम कृपाल सुसील बिसेषी॥1॥

चौपाई · 2

जानी श्रमित सीय मन माहीं। घरिक बिलंबु कीन्ह बट छाहीं॥ मुदित नारि नर देखहिं सोभा। रूप अनूप नयन मनु लोभा॥2॥

चौपाई · 3

एकटक सब सोहहिं चहुँ ओरा। रामचन्द्र मुख चंद चकोरा॥ तरुन तमाल बरन तनु सोहा। देखत कोटि मदन मनु मोहा॥3॥

चौपाई · 4

दामिनि बरन लखन सुठि नीके। नख सिख सुभग भावते जी के॥ मुनि पट कटिन्ह कसें तूनीरा। सोहहिं कर कमलनि धनु तीरा॥4॥

दोहा · 115

जटा मुकुट सीसनि सुभग उर भुज नयन बिसाल। सरद परब बिधु बदन बर लसत स्वेद कन जाल॥115॥

चौपाई · 1

बरनि न जाइ मनोहर जोरी। सोभा बहुत थोरि मति मोरी॥ राम लखन सिय सुंदरताई। सब चितवहिं चित मन मति लाई॥1॥

चौपाई · 2

थके नारि नर प्रेम पिआसे। मनहुँ मृगी मृग देखि दिआ से॥ सीय समीप ग्रामतिय जाहीं। पूँछत अति सनेहँ सकुचाहीं॥2॥

चौपाई · 3

बार बार सब लागहिं पाएँ। कहहिं बचन मृदु सरल सुभाएँ॥ राजकुमारि बिनय हम करहीं। तिय सुभायँ कछु पूँछत डरहीं॥3॥

चौपाई · 4

स्वामिनि अबिनय छमबि हमारी। बिलगु न मानब जानि गवाँरी॥ राजकुअँर दोउ सहज सलोने। इन्ह तें लही दुति मरकत सोने॥4॥

दोहा · 116

स्यामल गौर किसोर बर सुंदर सुषमा ऐन। सरद सर्बरीनाथ मुखु सरद सरोरुह नैन॥116॥

चौपाई · 1

कोटि मनोज लजावनिहारे। सुमुखि कहहु को आहिं तुम्हारे॥ सुनि सनेहमय मंजुल बानी। सकुची सिय मन महुँ मुसुकानी॥1॥

चौपाई · 2

तिन्हहि बिलोकि बिलोकति धरनी। दुहुँ सकोच सकुचति बरबरनी॥ सकुचि सप्रेम बाल मृग नयनी। बोली मधुर बचन पिकबयनी॥2॥

चौपाई · 3

सहज सुभाय सुभग तन गोरे। नामु लखनु लघु देवर मोरे॥ बहुरि बदनु बिधु अंचल ढाँकी। पिय तन चितइ भौंह करि बाँकी॥3॥

चौपाई · 4

खंजन मंजु तिरीछे नयननि। निज पति कहेउ तिन्हहि सियँ सयननि॥ भईं मुदित सब ग्रामबधूटीं। रंकन्ह राय रासि जनु लूटीं॥4॥

दोहा · 117

अति सप्रेम सिय पाँय परि बहुबिधि देहिं असीस। सदा सोहागिनि होहु तुम्ह जब लगि महि अहि सीस॥117॥

चौपाई · 1

पारबती सम पतिप्रिय होहू। देबि न हम पर छाड़ब छोहू॥ पुनि पुनि बिनय करिअ कर जोरी। जौं एहि मारग फिरिअ बहोरी॥1॥

चौपाई · 2

दरसनु देब जानि निज दासी। लखीं सीयँ सब प्रेम पिआसी॥ मधुर बचन कहि कहि परितोषीं। जनु कुमुदिनीं कौमुदीं पोषीं॥2॥

चौपाई · 3

तबहिं लखन रघुबर रुख जानी। पूँछेउ मगु लोगन्हि मृदु बानी॥ सुनत नारि नर भए दुखारी। पुलकित गात बिलोचन बारी॥3॥

चौपाई · 4

मिटा मोदु मन भए मलीने। बिधि निधि दीन्ह लेत जनु छीने॥ समुझि करम गति धीरजु कीन्हा। सोधि सुगम मगु तिन्ह कहि दीन्हा॥4॥

दोहा · 118

लखन जानकी सहित तब गवनु कीन्ह रघुनाथ। फेरे सब प्रिय बचन कहि लिए लाइ मन साथ॥118॥

चौपाई · 1

फिरत नारि नर अति पछिताहीं। दैअहि दोषु देहिं मन माहीं॥ सहित बिषाद परसपर कहहीं। बिधि करतब उलटे सब अहहीं॥1॥

चौपाई · 2

निपट निरंकुस निठुर निसंकू। जेहिं ससि कीन्ह सरुज सकलंकू॥ रूख कलपतरु सागरु खारा। तेहिं पठए बन राजकुमारा॥2॥

चौपाई · 3

जौं पै इन्हहिं दीन्ह बनबासू। कीन्ह बादि बिधि भोग बिलासू॥ ए बिचरहिं मग बिनु पदत्राना। रचे बादि बिधि बाहन नाना॥3॥

चौपाई · 4

ए महि परहिं डासि कुस पाता। सुभग सेज कत सृजत बिधाता॥ तरुबर बास इन्हहि बिधि दीन्हा। धवल धाम रचि रचि श्रमु कीन्हा॥4॥

दोहा · 119

जौं ए मुनि पट धर जटिल सुंदर सुठि सुकुमार। बिबिध भाँति भूषन बसन बादि किए करतार॥119॥

चौपाई · 1

जौं ए कंदमूल फल खाहीं। बादि सुधादि असन जग माहीं॥ एक कहहिं ए सहज सुहाए। आपु प्रगट भए बिधि न बनाए॥1॥

चौपाई · 2

जहँ लगिबेद कही बिधि करनी। श्रवन नयन मन गोचर बरनी॥ देखहु खोजि भुअन दस चारी। कहँ अस पुरुष कहाँ असि नारी॥2॥

चौपाई · 3

इन्हहि देखि बिधि मनु अनुरागा। पटतर जोग बनावै लागा॥ कीन्ह बहुत श्रम ऐक न आए। तेहिं इरिषा बन आनि दुराए॥3॥

चौपाई · 4

एक कहहिं हम बहुत न जानहिं। आपुहि परम धन्य करि मानहिं॥ ते पुनि पुन्यपुंज हम लेखे। जे देखहिं देखिहहिं जिन्ह देखे॥4॥

दोहा · 120

एहि बिधि कहि कहि बचन प्रिय लेहिं नयन भरि नीर। किमि चलिहहिं मारग अगम सुठि सुकुमार सरीर॥120॥

चौपाई · 1

नारि सनेह बिकल बस होहीं। चकईं साँझ समय जनु सोहीं॥ मृदु पद कमल कठिन मगु जानी। गहबरि हृदयँ कहहिं बर बानी॥1॥

चौपाई · 2

परसत मृदुल चरन अरुनारे। सकुचति महि जिमि हृदय हमारे॥ जौं जगदीस इन्हहि बनु दीन्हा। कस न सुमनमय मारगु कीन्हा॥2॥

चौपाई · 3

जौं मागा पाइअ बिधि पाहीं। ए रखिअहिं सखि आँखिन्ह माहीं॥ जे नर नारि न अवसर आए। तिन्ह सिय रामु न देखन पाए॥3॥

चौपाई · 4

सुनि सुरूपु बूझहिं अकुलाई। अब लगि गए कहाँ लगि भाई॥ समरथ धाइ बिलोकहिं जाई। प्रमुदित फिरहिं जनमफलु पाई॥4॥

दोहा · 121

अबला बालक बृद्ध जन कर मीजहिं पछिताहिं। होहिं प्रेमबस लोग इमि रामु जहाँ जहँ जाहिं॥121॥

चौपाई · 1

गाँव गाँव अस होइ अनंदू। देखि भानुकुल कैरव चंदू॥ जे कछु समाचार सुनि पावहिं। ते नृप रानिहि दोसु लगावहिं॥1॥

चौपाई · 2

कहहिं एक अति भल नरनाहू। दीन्ह हमहि जोइ लोचन लाहू॥ कहहिं परसपर लोग लोगाईं। बातें सरल सनेह सुहाईं॥2॥

चौपाई · 3

ते पितु मातु धन्य जिन्ह जाए। धन्य सो नगरु जहाँ तें आए॥ धन्य सो देसु सैलु बन गाऊँ। जहँ-जहँ जाहिं धन्य सोइ ठाऊँ॥3॥

चौपाई · 4

सुखु पायउ बिरंचि रचि तेही। ए जेहि के सब भाँति सनेही॥ राम लखन पथि कथा सुहाई। रही सकल मग कानन छाई॥4॥

दोहा · 122

एहि बिधि रघुकुल कमल रबि मग लोगन्ह सुख देत। जाहिं चले देखत बिपिन सिय सौमित्रि समेत॥122॥

चौपाई · 1

आगें रामु लखनु बने पाछें। तापस बेष बिराजत काछें॥ उभय बीच सिय सोहति कैसें। ब्रह्म जीव बिच माया जैसें॥1॥

चौपाई · 2

बहुरि कहउँ छबि जसि मन बसई। जनु मधु मदन मध्य रति लसई॥ उपमा बहुरि कहउँ जियँ जोही। जनु बुध बिधु बिच रोहिनि सोही॥2॥

चौपाई · 3

प्रभु पद रेख बीच बिच सीता। धरति चरन मग चलति सभीता॥ सीय राम पद अंक बराएँ। लखन चलहिं मगु दाहिन लाएँ॥3॥

चौपाई · 4

राम लखन सिय प्रीति सुहाई। बचन अगोचर किमि कहि जाई॥ खग मृग मगन देखि छबि होहीं। लिए चोरि चित राम बटोहीं॥4॥

व्हाट्सऐपटेलीग्राम

गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।