अयोध्याकाण्ड · 18
यमुनातीर निवासियों का प्रेम, तापस प्रकरण
अयोध्याकाण्ड का प्रकरण 18: यमुनातीर निवासियों का प्रेम, तापस प्रकरण। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
दोहा · 108
राम कीन्ह बिश्राम निसि प्रात प्रयाग नहाइ। चले सहितसिय लखन जन मुदित मुनिहि सिरु नाइ॥108॥
चौपाई · 1
राम सप्रेम कहेउ मुनि पाहीं। नाथ कहिअ हम केहि मग जाहीं॥ मुनि मन बिहसि राम सन कहहीं। सुगम सकल मग तुम्ह कहुँ अहहीं॥1॥
चौपाई · 2
साथ लागि मुनि सिष्य बोलाए। सुनि मन मुदित पचासक आए॥ सबन्हि राम पर प्रेम अपारा। सकल कहहिं मगु दीख हमारा॥2॥
चौपाई · 3
मुनि बटु चारि संग तब दीन्हे। जिन्ह बहु जनम सुकृत सब कीन्हे॥ करि प्रनामु रिषि आयसु पाई। प्रमुदित हृदयँ चले रघुराई॥3॥
चौपाई · 4
ग्राम निकट जब निकसहिं जाई। देखहिं दरसु नारि नर धाई॥ होहिं सनाथ जनम फलु पाई। फिरहिं दुखित मनु संग पठाई॥4॥
दोहा · 109
बिदा किए बटु बिनय करि फिरे पाइ मन काम। उतरि नहाए जमुन जल जो सरीर सम स्याम॥109॥
चौपाई · 1
सुनत तीरबासी नर नारी। धाए निज निज काज बिसारी॥ लखन राम सिय सुंदरताई। देखि करहिं निज भाग्य बड़ाई॥1॥
चौपाई · 2
अति लालसा बसहिं मन माहीं। नाउँ गाउँ बूझत सकुचाहीं॥ जे तिन्ह महुँ बयबिरिध सयाने। तिन्ह करि जुगुति रामु पहिचाने॥2॥
चौपाई · 3
सकल कथा तिन्ह सबहि सुनाई। बनहि चले पितु आयसु पाई॥ सुनि सबिषाद सकल पछिताहीं। रानी रायँ कीन्ह भल नाहीं॥3॥
चौपाई · 4
तेहि अवसर एक तापसु आवा। तेजपुंज लघुबयस सुहावा॥ कबि अलखित गति बेषु बिरागी। मन क्रम बचन राम अनुरागी॥4॥
दोहा · 110
सजल नयन तन पुलकि निज इष्टदेउ पहिचानि। परेउ दंड जिमि धरनितल दसा न जाइ बखानि॥110॥
चौपाई · 1
राम सप्रेम पुलकि उर लावा। परम रंक जनु पारसु पावा॥ मनहुँ प्रेमु परमारथु दोऊ। मिलत धरें तन कह सबु कोऊ॥1॥
चौपाई · 2
बहुरि लखन पायन्ह सोइ लागा। लीन्ह उठाइ उमगि अनुरागा॥ पुनि सिय चरन धूरि धरि सीसा। जननि जानि सिसु दीन्हि असीसा॥2॥
चौपाई · 3
कीन्ह निषाद दंडवत तेही। मिलेउ मुदित लखि राम सनेही॥ पिअत नयन पुट रूपु पियुषा। मुदित सुअसनु पाइ जिमि भूखा॥3॥
चौपाई · 4
ते पितु मातु कहहु सखि कैसे। जिन्ह पठए बन बालक ऐसे॥ राम लखन सिय रूपु निहारी। होहिं सनेह बिकल नर नारी॥4॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।