अयोध्याकाण्ड · 16
केवट का प्रेम और गंगा पार जाना
अयोध्याकाण्ड का प्रकरण 16: केवट का प्रेम और गंगा पार जाना। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
चौपाई · 1
जासु बियोग बिकल पसु ऐसें। प्रजा मातु पितु जिइहहिं कैसें॥ बरबस राम सुमंत्रु पठाए। सुरसरि तीर आपु तब आए॥1॥
चौपाई · 2
मागी नाव न केवटु आना। कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना॥ चरन कमल रज कहुँ सबु कहई। मानुष करनि मूरि कछु अहई॥2॥
चौपाई · 3
छुअत सिला भइ नारि सुहाई। पाहन तें न काठ कठिनाई॥ तरनिउ मुनि घरिनी होइ जाई। बाट परइ मोरि नाव उड़ाई॥3॥
चौपाई · 4
एहिं प्रतिपालउँ सबु परिवारू। नहिं जानउँ कछु अउर कबारू॥ जौं प्रभु पार अवसि गा चहहू। मोहि पद पदुम पखारन कहहू॥4॥
छन्द
पद कमल धोइ चढ़ाइ नाव न नाथ उतराई चहौं। मोहि राम राउरि आन दसरथसपथ सब साची कहौं॥ बरु तीर मारहुँ लखनु पै जब लगि न पाय पखारिहौं। तब लगि न तुलसीदास नाथ कृपाल पारु उतारिहौं॥
सोरठा · 100
सुनि केवट के बैन प्रेम लपेटे अटपटे। बिहसे करुनाऐन चितइ जानकी लखन तन॥100॥
चौपाई · 1
कृपासिंधु बोले मुसुकाई। सोइ करु जेहिं तव नाव न जाई॥ बेगि आनु जलपाय पखारू। होत बिलंबु उतारहि पारू॥1॥
चौपाई · 2
जासु नाम सुमिरत एक बारा। उतरहिं नर भवसिंधु अपारा॥ सोइ कृपालु केवटहि निहोरा। जेहिं जगु किय तिहु पगहु ते थोरा॥2॥
चौपाई · 3
पद नख निरखि देवसरि हरषी। सुनि प्रभु बचन मोहँ मति करषी॥ केवट राम रजायसु पावा। पानि कठवता भरि लेइ आवा॥3॥
चौपाई · 4
अति आनंद उमगि अनुरागा। चरन सरोज पखारन लागा॥ बरषि सुमन सुर सकल सिहाहीं। एहि सम पुन्यपुंज कोउ नाहीं॥4॥
दोहा · 101
पद पखारि जलु पान करि आपु सहित परिवार। पितर पारु करि प्रभुहि पुनि मुदित गयउ लेइ पार॥101॥
चौपाई · 1
उतरि ठाढ़ भए सुरसरि रेता। सीय रामुगुह लखन समेता॥ केवट उतरि दंडवत कीन्हा। प्रभुहि सकुच एहि नहिं कछु दीन्हा॥1॥
चौपाई · 2
पिय हिय की सिय जाननिहारी। मनि मुदरी मन मुदित उतारी॥ कहेउ कृपाल लेहि उतराई। केवट चरन गहे अकुलाई॥2॥
चौपाई · 3
नाथ आजु मैं काह न पावा। मिटे दोष दुख दारिद दावा॥ बहुत काल मैं कीन्हि मजूरी। आजु दीन्ह बिधि बनि भलि भूरी॥3॥
चौपाई · 4
अब कछु नाथ न चाहिअ मोरें। दीन दयाल अनुग्रह तोरें॥ फिरती बार मोहि जो देबा। सो प्रसादु मैं सिर धरि लेबा॥4॥
दोहा · 102
बहुत कीन्ह प्रभु लखन सियँ नहिं कछु केवटु लेइ। बिदा कीन्ह करुनायतन भगति बिमल बरु देइ॥102॥
चौपाई · 1
तब मज्जनु करि रघुकुलनाथा। पूजि पारथिव नायउ माथा॥ सियँ सुरसरिहि कहेउ कर जोरी। मातु मनोरथ पुरउबि मोरी॥1॥
चौपाई · 2
पति देवर सँग कुसल बहोरी। आइ करौं जेहिं पूजा तोरी॥ सुनि सिय बिनय प्रेम रस सानी। भइ तब बिमल बारि बर बानी॥2॥
चौपाई · 3
सुनु रघुबीर प्रिया बैदेही। तब प्रभाउ जग बिदित न केही॥ लोकप होहिं बिलोकत तोरें। तोहि सेवहिं सब सिधि कर जोरें॥3॥
चौपाई · 4
तुम्ह जो हमहि बड़ि बिनय सुनाई। कृपा कीन्हि मोहि दीन्हि बड़ाई॥ तदपि देबि मैं देबि असीसा। सफल होन हित निज बागीसा॥4॥
दोहा · 103
प्राननाथ देवर सहित कुसल कोसला आइ। पूजिहि सब मनकामना सुजसु रहिहि जग छाइ॥103॥
चौपाई · 1
गंग बचन सुनि मंगल मूला। मुदित सीय सुरसरि अनुकूला॥ तब प्रभु गुहहि कहेउ घर जाहू। सुनत सूख मुखु भा उर दाहू॥1॥
चौपाई · 2
दीन बचन गुह कह कर जोरी। बिनय सुनहु रघुकुलमनि मोरी॥ नाथ साथ रहि पंथु देखाई। करि दिन चारि चरन सेवकाई॥2॥
चौपाई · 3
जेहिं बन जाइ रहब रघुराई। परनकुटी मैं करबि सुहाई॥ तब मोहि कहँ जसि देब रजाई। सोइ करिहउँ रघुबीर दोहाई॥3॥
चौपाई · 4
सहज सनेह राम लखि तासू। संग लीन्ह गुह हृदयँ हुलासू॥ पुनि गुहँ ग्याति बोलि सब लीन्हे। करि परितोषु बिदा तब कीन्हे॥4॥
दोहा · 104
तब गनपति सिव सुमिरि प्रभु नाइ सुरसरिहि माथ। सखा अनुज सिय सहित बन गवनु कीन्ह रघुनाथ॥104॥
चौपाई · 1
तेहि दिन भयउ बिटप तर बासू। लखन सखाँ सब कीन्ह सुपासू॥ प्रात प्रातकृत करि रघुराई। तीरथराजु दीख प्रभु जाई॥1॥
चौपाई · 2
सचिव सत्य श्रद्धा प्रिय नारी। माधव सरिस मीतु हितकारी॥ चारि पदारथ भरा भँडारू। पुन्य प्रदेस देस अति चारू॥2॥
चौपाई · 3
छेत्रु अगम गढ़ु गाढ़ सुहावा। सपनेहुँ नहिं प्रतिपच्छिन्ह पावा॥ सेन सकल तीरथ बर बीरा। कलुष अनीक दलन रनधीरा॥3॥
चौपाई · 4
संगमु सिंहासनु सुठि सोहा। छत्रु अखयबटु मुनि मनु मोहा॥ चवँर जमुन अरु गंग तरंगा। देखि होहिं दुख दारिद भंगा॥4॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।