अयोध्याकाण्ड · 15
श्री राम-सीता से सुमन्त्र का संवाद, सुमंत्र का लौटना
अयोध्याकाण्ड का प्रकरण 15: श्री राम-सीता से सुमन्त्र का संवाद, सुमंत्र का लौटना। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
चौपाई · 1
सखा समुझि अस परिहरि मोहू। सिय रघुबीर चरन रत होहू॥ कहत राम गुन भा भिनुसारा। जागे जग मंगल सुखदारा॥1॥
चौपाई
सकल सौच करि राम नहावा। सुचि सुजान बट छीर मगावा॥ अनुज सहित सिर जटा बनाए। देखि सुमंत्र नयन जल छाए॥
चौपाई · 3
हृदयँ दाहु अति बदन मलीना। कह कर जोर बचन अति दीना॥ नाथ कहेउ अस कोसलनाथा। लै रथु जाहु राम कें साथा॥3॥
चौपाई · 4
बनु देखाइ सुरसरि अन्हवाई। आनेहु फेरि बेगि दोउ भाई॥ लखनु रामु सिय आनेहु फेरी। संसय सकल सँकोच निबेरी॥4॥
दोहा · 94
नृप अस कहेउ गोसाइँ जस कहइ करौं बलि सोइ। करि बिनती पायन्ह परेउ दीन्ह बाल जिमि रोइ॥94॥
चौपाई · 1
तात कृपा करि कीजिअ सोई। जातें अवध अनाथ न होई॥ मंत्रिहि राम उठाइ प्रबोधा। तात धरम मतु तुम्ह सबु सोधा॥1॥
चौपाई · 2
सिबि दधीच हरिचंद नरेसा। सहे धरम हित कोटि कलेसा॥ रंतिदेव बलि भूप सुजाना। धरमु धरेउ सहि संकट नाना॥2॥
चौपाई · 3
धरमु न दूसर सत्य समाना। आगम निगम पुरान बखाना॥ मैं सोइ धरमु सुलभ करि पावा। तजें तिहूँ पुर अपजसु छावा॥3॥
चौपाई · 4
संभावित कहुँ अपजस लाहू। मरन कोटि सम दारुन दाहू॥ तुम्ह सन तात बहुत का कहउँ। दिएँ उतरु फिरि पातकु लहऊँ॥4॥
दोहा · 95
पितु पद गहि कहि कोटि नति बिनय करब कर जोरि। चिंता कवनिहु बात कै तात करिअ जनि मोरि॥95॥
चौपाई · 1
तुम्ह पुनि पितु सम अति हित मोरें। बिनती करउँ तात कर जोरें॥ सब बिधि सोइ करतब्य तुम्हारें। दुख न पाव पितु सोच हमारें॥1॥
चौपाई · 2
सुनि रघुनाथ सचिव संबादू। भयउ सपरिजन बिकल निषादू॥ पुनि कछु लखन कही कटु बानी। प्रभु बरजे बड़ अनुचित जानी॥2॥
चौपाई · 3
सकुचि राम निज सपथ देवाई। लखन सँदेसु कहिअ जनि जाई॥ कह सुमंत्रु पुनि भूप सँदेसू। सहि न सकिहि सिय बिपिन कलेसू॥3॥
चौपाई · 4
जेहि बिधि अवध आव फिरि सीया। होइ रघुबरहि तुम्हहि करनीया॥ नतरु निपट अवलंब बिहीना। मैं न जिअब जिमि जल बिनु मीना॥4॥
दोहा · 96
मइकें ससुरें सकल सुख जबहिं जहाँ मनु मान। तहँ तब रहिहि सुखेन सिय जब लगि बिपति बिहान॥96॥
चौपाई · 1
बिनती भूप कीन्ह जेहि भाँती। आरति प्रीति न सो कहि जाती॥ पितु सँदेसु सुनि कृपानिधाना। सियहि दीन्ह सिख कोटि बिधाना॥1॥
चौपाई · 2
सासु ससुर गुर प्रिय परिवारू। फिरहु त सब कर मिटै खभारू॥ सुनि पति बचन कहति बैदेही। सुनहु प्रानपति परम सनेही॥2॥
चौपाई · 3
प्रभु करुनामय परम बिबेकी। तनु तजि रहति छाँह किमि छेंकी॥ प्रभा जाइ कहँ भानु बिहाई। कहँ चंद्रिका चंदु तजि जाई॥3॥
चौपाई · 4
पतिहि प्रेममय बिनय सुनाई। कहति सचिव सन गिरा सुहाई॥ तुम्ह पितु ससुर सरिस हितकारी। उतरु देउँ फिरि अनुचित भारी॥4॥
दोहा · 97
आरति बस सनमुख भइउँ बिलगु न मानब तात। आरजसुत पद कमल बिनु बादि जहाँ लगि नात॥97॥
चौपाई · 1
पितु बैभव बिलास मैं डीठा। नृप मनि मुकुट मिलित पद पीठा॥ सुखनिधान अस पितु गृह मोरें। पिय बिहीन मन भाव न भोरें॥1॥
चौपाई · 2
ससुर चक्कवइ कोसल राऊ। भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ॥ आगें होइ जेहि सुरपति लेई। अरध सिंघासन आसनु देई॥2॥
चौपाई · 3
ससुरु एतादृस अवध निवासू। प्रिय परिवारु मातु सम सासू॥ बिनु रघुपति पद पदुम परागा। मोहि केउ सपनेहुँ सुखद न लागा॥3॥
चौपाई · 4
अगम पंथ बनभूमि पहारा। करि केहरि सर सरित अपारा॥ कोल किरात कुरंग बिहंगा। मोहि सब सुखद प्रानपति संगा॥4॥
दोहा · 98
सासु ससुर सन मोरि हुँति बिनय करबि परि पायँ। मोर सोचु जनि करिअ कछु मैं बन सुखी सुभायँ॥98॥
चौपाई · 1
प्राननाथ प्रिय देवर साथा। बीर धुरीन धरें धनु भाथा॥ नहिं मग श्रमु भ्रमु दुख मन मोरें। मोहि लगि सोचु करिअ जनि भोरें॥1॥
चौपाई · 2
सुनि सुमंत्रु सिय सीतलि बानी। भयउ बिकल जनु फनि मनि हानी॥ नयन सूझ नहिं सुनइ न काना। कहि न सकइ कछु अति अकुलाना॥2॥
चौपाई · 3
राम प्रबोधु कीन्ह बहु भाँती। तदपि होति नहिं सीतलि छाती॥ जतन अनेक साथ हित कीन्हे। उचित उतर रघुनंदन दीन्हे॥3॥
चौपाई · 4
मेटि जाइ नहिं राम रजाई। कठिन करम गति कछु न बसाई॥ राम लखन सिय पद सिरु नाई। फिरेउ बनिक जिमि मूर गवाँई॥4॥
दोहा · 99
रथु हाँकेउ हय राम तन हेरि हेरि हिहिनाहिं। देखि निषाद बिषाद बस धुनहिं सीस पछिताहिं॥99॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।