अरण्यकाण्ड · 13
शबरी पर कृपा, नवधा भक्ति उपदेश और पम्पासर की ओर प्रस्थान
अरण्यकाण्ड का प्रकरण 13: शबरी पर कृपा, नवधा भक्ति उपदेश और पम्पासर की ओर प्रस्थान। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
चौपाई · 1
सापत ताड़त परुष कहंता। बिप्र पूज्य अस गावहिं संता॥ पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना॥1॥
चौपाई · 2
कहि निज धर्म ताहि समुझावा। निज पद प्रीति देखि मन भावा॥ रघुपति चरन कमल सिरु नाई। गयउ गगन आपनि गति पाई॥2॥
चौपाई · 3
ताहि देइ गति राम उदारा। सबरी कें आश्रम पगु धारा॥ सबरी देखि राम गृहँ आए। मुनि के बचन समुझि जियँ भाए॥3॥
चौपाई · 4
सरसिज लोचन बाहु बिसाला। जटा मुकुट सिर उर बनमाला॥ स्याम गौर सुंदर दोउ भाई। सबरी परी चरन लपटाई॥4॥
चौपाई · 5
प्रेम मगन मुख बचन न आवा। पुनि पुनि पद सरोज सिर नावा॥ सादर जल लै चरन पखारे। पुनि सुंदर आसन बैठारे॥5॥
दोहा · 34
कंद मूल फल सुरस अति दिए राम कहुँ आनि। प्रेम सहित प्रभु खाए बारंबार बखानि॥34॥
चौपाई · 1
पानि जोरि आगें भइ ठाढ़ी। प्रभुहि बिलोकि प्रीति अति बाढ़ी॥ केहि बिधि अस्तुति करौं तुम्हारी। अधम जाति मैं जड़मति भारी॥1॥
चौपाई · 2
अधम ते अधम अधम अति नारी। तिन्ह महँ मैं मतिमंद अघारी॥ कह रघुपति सुनु भामिनि बाता। मानउँ एक भगति कर नाता॥2॥
चौपाई · 3
जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई। धन बल परिजन गुन चतुराई॥ भगति हीन नर सोहइ कैसा। बिनु जल बारिद देखिअ जैसा॥3॥
चौपाई · 4
नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरु मन माहीं॥ प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा॥4॥
दोहा · 35
गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान। चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान॥35॥
चौपाई · 1
मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा॥ छठ दम सील बिरति बहु करमा। निरत निरंतर सज्जन धरमा॥1॥
चौपाई · 2
सातवँ सम मोहि मय जग देखा। मोतें संत अधिक करि लेखा॥ आठवँ जथालाभ संतोषा। सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा॥2॥
चौपाई · 3
नवम सरल सब सन छलहीना। मम भरोस हियँ हरष न दीना॥ नव महुँ एकउ जिन्ह कें होई। नारि पुरुष सचराचर कोई॥3॥
चौपाई · 4
सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरें। सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें॥ जोगि बृंद दुरलभ गति जोई। तो कहुँ आजु सुलभ भइ सोई॥4॥
चौपाई · 5
मम दरसन फल परम अनूपा। जीव पाव निज सहज सरूपा॥ जनकसुता कइ सुधि भामिनी। जानहि कहु करिबरगामिनी॥5॥
चौपाई · 6
पंपा सरहि जाहु रघुराई। तहँ होइहि सुग्रीव मिताई॥ सो सब कहिहि देव रघुबीरा। जानतहूँ पूछहु मतिधीरा॥6॥
चौपाई · 7
बार बार प्रभु पद सिरु नाई। प्रेम सहित सब कथा सुनाई॥7॥
छन्द
कहि कथा सकल बिलोकि हरि मुख हृदय पद पंकज धरे। तजि जोग पावक देह परि पद लीन भइ जहँ नहिं फिरे॥ नर बिबिध कर्म अधर्म बहु मत सोकप्रद सब त्यागहू। बिस्वास करि कह दास तुलसी राम पद अनुरागहू॥
छन्द · 36
जाति हीन अघ जन्म महि मुक्त कीन्हि असि नारि। महामंद मन सुख चहसि ऐसे प्रभुहि बिसारि॥36॥
चौपाई · 1
चले राम त्यागा बन सोऊ। अतुलित बल नर केहरि दोऊ॥ बिरही इव प्रभु करत बिषादा। कहत कथा अनेक संबादा॥1॥
चौपाई · 2
लछिमन देखु बिपिन कइ सोभा। देखत केहि कर मन नहिं छोभा॥ नारि सहित सब खग मृग बृंदा। मानहुँ मोरि करत हहिं निंदा॥2॥
चौपाई · 3
हमहि देखि मृग निकर पराहीं। मृगीं कहहिं तुम्ह कहँ भय नाहीं॥ तुम्ह आनंद करहु मृग जाए। कंचन मृग खोजन ए आए॥3॥
चौपाई · 4
संग लाइ करिनीं करि लेहीं। मानहुँ मोहि सिखावनु देहीं॥ सास्त्र सुचिंतित पुनि पुनि देखिअ। भूप सुसेवित बस नहिं लेखिअ॥4॥
चौपाई · 5
राखिअ नारि जदपि उर माहीं। जुबती सास्त्र नृपति बस नाहीं॥ देखहु तात बसंत सुहावा। प्रिया हीन मोहि भय उपजावा॥5॥
दोहा
बिरह बिकल बलहीन मोहि जानेसि निपट अकेल। सहित बिपिन मधुकर खग मदन कीन्ह बगमेल॥37 क॥
दोहा
देखि गयउ भ्राता सहित तासु दूत सुनि बात। डेरा कीन्हेउ मनहुँ तब कटकु हटकि मनजात॥37 ख॥
चौपाई · 1
बिटप बिसाल लता अरुझानी। बिबिध बितान दिए जनु तानी॥ कदलि ताल बर धुजा पताका। देखि न मोह धीर मन जाका॥1॥
चौपाई · 2
बिबिध भाँति फूले तरु नाना। जनु बानैत बने बहु बाना॥ कहुँ कहुँ सुंदर बिटप सुहाए। जनु भट बिलग बिलग होइ छाए॥2॥
चौपाई · 3
कूजत पिक मानहुँ गज माते। ढेक महोख ऊँट बिसराते॥ मोर चकोर कीर बर बाजी। पारावत मराल सब ताजी॥3॥
चौपाई · 4
तीतिर लावक पदचर जूथा। बरनि न जाइ मनोज बरूथा॥ रथ गिरि सिला दुंदुभीं झरना। चातक बंदी गुन गन बरना॥4॥
चौपाई · 5
मधुकर मुखर भेरि सहनाई। त्रिबिध बयारि बसीठीं आई॥ चतुरंगिनी सेन सँग लीन्हें। बिचरत सबहि चुनौती दीन्हें॥5॥
चौपाई · 6
लछिमन देखत काम अनीका। रहहिं धीर तिन्ह कै जग लीका॥ ऐहि कें एक परम बल नारी। तेहि तें उबर सुभट सोइ भारी॥6॥
दोहा
तात तीनि अति प्रबल खल काम क्रोध अरु लोभ। मुनि बिग्यान धाम मन करहिं निमिष महुँ छोभ॥38 क॥
दोहा
लोभ कें इच्छा दंभ बल काम कें केवल नारि। क्रोध कें परुष बचन बल मुनिबर कहहिं बिचारि॥38 ख॥
चौपाई · 1
गुनातीत सचराचर स्वामी। राम उमा सब अंतरजामी॥ कामिन्ह कै दीनता देखाई। धीरन्ह कें मन बिरति दृढ़ाई॥1॥
चौपाई · 2
क्रोध मनोज लोभ मद माया। छूटहिं सकल राम कीं दाया॥ सो नर इंद्रजाल नहिं भूला। जा पर होइ सो नट अनुकूला॥2॥
चौपाई · 3
उमा कहउँ मैं अनुभव अपना। सत हरि भजनु जगत सब सपना॥ पुनि प्रभु गए सरोबर तीरा। पंपा नाम सुभग गंभीरा॥3॥
चौपाई · 4
संत हृदय जस निर्मल बारी। बाँधे घाट मनोहर चारी॥ जहँ तहँ पिअहिं बिबिध मृग नीरा। जनु उदार गृह जाचक भीरा॥4॥
दोहा
पुरइनि सघन ओट जल बेगि न पाइअ मर्म। मायाछन्न न देखिऐ जैसें निर्गुन ब्रह्म॥39 क॥
दोहा
सुखी मीन सब एकरस अति अगाध जल माहिं। जथा धर्मसीलन्ह के दिन सुख संजुत जाहिं॥39 ख॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।