अरण्यकाण्ड · 12
अशोक वाटिका में सीताजी को रखना, श्री रामजी का विलाप, जटायु का प्रसंग, कबन्ध उद्धार
अरण्यकाण्ड का प्रकरण 12: अशोक वाटिका में सीताजी को रखना, श्री रामजी का विलाप, जटायु का प्रसंग, कबन्ध उद्धार। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
चौपाई · 12
सीतहि जान चढ़ाइ बहोरी। चला उताइल त्रास न थोरी॥ करति बिलाप जाति नभ सीता। ब्याध बिबस जनु मृगी सभीता॥12॥
चौपाई · 13
गिरि पर बैठे कपिन्ह निहारी। कहि हरि नाम दीन्ह पट डारी॥ एहि बिधि सीतहि सो लै गयऊ। बन असोक महँ राखत भयऊ॥13॥
दोहा
हारि परा खल बहु बिधि भय अरु प्रीति देखाइ। तब असोक पादप तर राखिसि जतन कराइ॥29 क॥
दोहा
जेहि बिधि कपट कुरंग सँग धाइ चले श्रीराम। सो छबि सीता राखि उर रटति रहति हरिनाम॥29 ख॥
चौपाई · 1
रघुपति अनुजहि आवत देखी। बाहिज चिंता कीन्हि बिसेषी॥ जनकसुता परिहरिहु अकेली। आयहु तात बचन मम पेली॥1॥
चौपाई · 2
निसिचर निकर फिरहिं बन माहीं। मम मन सीता आश्रम नाहीं॥ गहि पद कमल अनुज कर जोरी। कहेउ नाथ कछु मोहि न खोरी॥2॥
चौपाई · 3
अनुज समेत गए प्रभु तहवाँ। गोदावरि तट आश्रम जहवाँ॥ आश्रम देखि जानकी हीना। भए बिकल जस प्राकृत दीना॥3॥
चौपाई · 4
हा गुन खानि जानकी सीता। रूप सील ब्रत नेम पुनीता॥ लछिमन समुझाए बहु भाँति। पूछत चले लता तरु पाँती॥4॥
चौपाई · 5
हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी। तुम्ह देखी सीता मृगनैनी॥ खंजन सुक कपोत मृग मीना। मधुप निकर कोकिला प्रबीना॥5॥
चौपाई · 6
कुंद कली दाड़िम दामिनी। कमल सरद ससि अहिभामिनी॥ बरुन पास मनोज धनु हंसा। गज केहरि निज सुनत प्रसंसा॥6॥
चौपाई · 7
श्री फल कनक कदलि हरषाहीं। नेकु न संक सकुच मन माहीं॥ सुनु जानकी तोहि बिनु आजू। हरषे सकल पाइ जनु राजू॥7॥
चौपाई · 8
किमि सहि जात अनख तोहि पाहीं। प्रिया बेगि प्रगटसि कस नाहीं॥ एहि बिधि खोजत बिलपत स्वामी। मनहुँ महा बिरही अति कामी॥8॥
चौपाई · 9
पूरन काम राम सुख रासी। मनुजचरित कर अज अबिनासी॥ आगें परा गीधपति देखा। सुमिरत राम चरन जिन्ह रेखा॥9॥
दोहा · 30
कर सरोज सिर परसेउ कृपासिंधु रघुबीर। निरखि राम छबि धाम मुख बिगत भई सब पीर॥30॥
चौपाई · 1
तब कह गीध बचन धरि धीरा। सुनहु राम भंजन भव भीरा॥ नाथ दसानन यह गति कीन्ही। तेहिं खल जनकसुता हरि लीन्ही॥1॥
चौपाई · 2
लै दच्छिन दिसि गयउ गोसाईं। बिलपति अति कुररी की नाईं॥ दरस लाग प्रभु राखेउँ प्राना। चलन चहत अब कृपानिधाना॥2॥
चौपाई · 3
राम कहा तनु राखहु ताता। मुख मुसुकाइ कही तेहिं बाता॥ जाकर नाम मरत मुख आवा। अधमउ मुकुत होइ श्रुति गावा॥3॥
चौपाई · 4
सो मम लोचन गोचर आगें। राखौं देह नाथ केहि खाँगें॥ जल भरि नयन कहहिं रघुराई। तात कर्म निज तें गति पाई॥4॥
चौपाई · 5
परहित बस जिन्ह के मन माहीं। तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीं॥ तनु तिज तात जाहु मम धामा। देउँ काह तुम्ह पूरनकामा॥5॥
दोहा · 31
सीता हरन तात जनि कहहु पिता सन जाइ। जौं मैं राम त कुल सहित कहिहि दसानन आइ॥31॥
चौपाई · 1
गीध देह तजि धरि हरि रूपा। भूषन बहु पट पीत अनूपा॥ स्याम गात बिसाल भुज चारी। अस्तुति करत नयन भरि बारी॥1॥
छन्द · 1
जय राम रूप अनूप निर्गुन सगुन गुन प्रेरक सही। दससीस बाहु प्रचंड खंडन चंड सर मंडन मही॥ पाथोद गात सरोज मुख राजीव आयत लोचनं। नित नौमि रामु कृपाल बाहु बिसाल भव भय मोचनं॥1॥
छन्द · 2
बलमप्रमेयमनादिमजमब्यक्तमेकमगोचरं। गोबिंद गोपर द्वंद्वहर बिग्यानघन धरनीधरं॥ जे राम मंत्र जपंत संत अनंत जन मन रंजनं। नित नौमि राम अकाम प्रिय कामादि खल दल गंजनं॥2॥
छन्द · 3
जेहि श्रुति निरंजन ब्रह्म ब्यापक बिरज अज कहि गावहीं। करि ध्यान ग्यान बिराग जोग अनेक मुनि जेहि पावहीं॥ सो प्रगट करुना कंद सोभा बृंद अग जग मोहई। मम हृदय पंकज भृंग अंग अनंग बहु छबि सोहई॥3॥
छन्द · 4
जो अगम सुगम सुभाव निर्मल असम सम सीतल सदा। पस्यंति जं जोगी जतन करि करत मन गो बस सदा॥ सो राम रमा निवास संतत दास बस त्रिभुवन धनी। मम उर बसउ सो समन संसृति जासु कीरति पावनी॥4॥
दोहा · 32
अबिरल भगति मागि बर गीध गयउ हरिधाम। तेहि की क्रिया जथोचित निज कर कीन्ही राम॥32॥
चौपाई · 1
कोमल चित अति दीनदयाला। कारन बिनु रघुनाथ कृपाला॥ गीध अधम खग आमिष भोगी। गति दीन्ही जो जाचत जोगी॥1॥
चौपाई · 2
सुनहू उमा ते लोग अभागी। हरि तजि होहिं बिषय अनुरागी। पुनि सीतहि खोजत द्वौ भाई। चले बिलोकत बन बहुताई॥2॥
चौपाई · 3
संकुल लता बिटप घन कानन। बहु खग मृग तहँ गज पंचानन॥ आवत पंथ कबंध निपाता। तेहिं सब कही साप कै बाता॥3॥
चौपाई · 4
दुरबासा मोहि दीन्ही सापा। प्रभु पद पेखि मिटा सो पापा॥ सुनु गंधर्ब कहउँ मैं तोही। मोहि न सोहाइ ब्रह्मकुल द्रोही॥4॥
दोहा · 33
मन क्रम बचन कपट तजि जो कर भूसुर सेव। मोहि समेत बिरंचि सिव बस ताकें सब देव॥33॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।