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संतोषी माता चालीसा

संतोषी माता चालीसा — संतोष की माता की हिंदी स्तुति; प्रायः शुक्रवार और सोलह शुक्रवार व्रत में पाठ।

अंतिम अद्यतन: 2026-09-18

देवी संतोषी माता
चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स (संतोषी माता)

संतोषी माता संतोष (santosha) की माता के रूप में पूजी जाती हैं — वह संतुष्टि जो कटु लालसा के बिना सच्चा उद्यम करती है। शुक्रवार उत्तर भारतीय घरों में उनकी पूजा का दिन माना जाता है। कई सोलह लगातार शुक्रवार व्रत रखते हैं — गुड़-चना का सरल भोग, खट्टा वर्जन, फिर उद्यापन। लोक-भक्ति नारी व्रत-कथा पर्चों से फैली और १९७५ की फिल्म जय संतोषी माँ से और व्यापक हुई, जो उन्हें गणेश-पुत्री कहती है; पुरानी मुद्रित व्रत-कथाएँ सदैव वह संबंध नहीं बतातीं। इस चालीसा को पर्याप्त की स्तुति समझकर पाठें — शांति, कृतज्ञता, स्थिर श्रद्धा।

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व्रत का स्वर कोमल रखें: व्रत दिन झगड़ा न करें, सामर्थ्य अनुसार अर्पण करें, और दिखावे नहीं संतोष को विधि का मापदंड बनाएँ।

चालीसा के छंद

॥ दोहा ॥

बन्दौं सन्तोषी चरण रिद्धि-सिद्धि दातार ।

भक्तन को सन्तोष दे सन्तोषी तव नाम ।

कृपा करहु जगदम्ब अब आया तेरे धाम ॥

॥ चौपाई ॥

जय सन्तोषी मात अनूपम। शान्ति दायिनी रूप मनोरम ॥१॥

सुन्दर वरण चतुर्भुज रूपा। वेश मनोहर ललित अनुपा ॥२॥

श्‍वेताम्बर रूप मनहारी। माँ तुम्हारी छवि जग से न्यारी ॥३॥

जय गणेश की सुता भवानी। रिद्धि- सिद्धि की पुत्री ज्ञानी ॥५॥

अगम अगोचर तुम्हरी माया। सब पर करो कृपा की छाया ॥६॥

नाम अनेक तुम्हारे माता। अखिल विश्‍व है तुमको ध्याता ॥७॥

तुमने रूप अनेकों धारे। को कहि सके चरित्र तुम्हारे ॥८॥

धाम अनेक कहाँ तक कहिये। सुमिरन तब करके सुख लहिये ॥९॥

विन्ध्याचल में विन्ध्यवासिनी। कोटेश्वर सरस्वती सुहासिनी ॥१०॥

कलकत्ते में तू ही काली। दुष्ट नाशिनी महाकराली ॥११॥

सम्बल पुर बहुचरा कहाती। भक्तजनों का दुःख मिटाती ॥१२॥

ज्वाला जी में ज्वाला देवी। पूजत नित्य भक्त जन सेवी ॥१३॥

नगर बम्बई की महारानी। महा लक्ष्मी तुम कल्याणी ॥१४॥

मदुरा में मीनाक्षी तुम हो। सुख दुख सबकी साक्षी तुम हो ॥१५॥

राजनगर में तुम जगदम्बे। बनी भद्रकाली तुम अम्बे ॥१६॥

पावागढ़ में दुर्गा माता। अखिल विश्‍व तेरा यश गाता ॥१७॥

काशी पुराधीश्‍वरी माता। अन्नपूर्णा नाम सुहाता ॥१८॥

सर्वानन्द करो कल्याणी। तुम्हीं शारदा अमृत वाणी ॥१९॥

तुम्हरी महिमा जल में थल में। दुःख दारिद्र सब मेटो पल में ॥२०॥

जेते ऋषि और मुनीशा। नारद देव और देवेशा ॥२१॥

जापर कृपा तुम्हारी होती। वह पाता भक्ति का मोती ॥२3॥

दुःख दारिद्र संकट मिट जाता। ध्यान तुम्हारा जो जन ध्याता ॥२४॥

जो मन राखे शुद्ध भावना। ताकी पूरण करो कामना ॥२६॥

कुमति निवारि सुमति की दात्री। जयति जयति माता जगधात्री ॥२७॥

शुक्रवार का दिवस सुहावन। जो व्रत करे तुम्हारा पावन ॥२८॥

गुड़ छोले का भोग लगावै। कथा तुम्हारी सुने सुनावै ॥२९॥

विधिवत पूजा करे तुम्हारी। फिर प्रसाद पावे शुभकारी ॥३०॥

शक्ति-सामरथ हो जो धनको। दान-दक्षिणा दे विप्रन को ॥३१॥

वे जगती के नर औ नारी। मनवांछित फल पावें भारी ॥३२॥

जो जन शरण तुम्हारी जावे। सो निश्‍चय भव से तर जावे ॥३३॥

सधवा पूजा करे तुम्हारी। अमर सुहागिन हो वह नारी ॥३५॥

जयति जयति जय संकट हरणी। विघ्न विनाशन मंगल करनी ॥३७॥

हम पर संकट है अति भारी। वेगि खबर लो मात हमारी ॥३८॥

यह चालीसा जो नित गावे। सो भवसागर से तर जावे ॥४०॥

संतोषी माँ के सदा बंदहूँ पग निश वास ।

पूर्ण मनोरथ हो सकल मात हरौ भव त्रास ॥

॥ इति श्री संतोषी माता चालीसा ॥

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

संतोषी माता चालीसा कब पढ़ें?

विशेषकर शुक्रवार, सोलह शुक्रवार व्रत में, या जब संतोष का व्रत रखें।

क्या संतोषी माता गणेश की पुत्री हैं?

लोक व फिल्म परंपरा में वह संबंध प्रचलित है। पुरानी व्रत-कथा पर्चियाँ प्रायः शुक्रवार कथा गणेश को पिता कहे बिना कहती हैं — जीवित भक्ति में दोनों धाराएँ हैं।

शुक्रवार व्रत में क्या चढ़ता है?

पारंपरिक रूप से गुड़ और भुना चना, पुष्प-धूप सहित; व्रत दिन खट्टा-कड़वा परिवार रीति अनुसार वर्जित रहता है।

इस साइट पर शुक्रवार कथा और पूजा कहाँ है?

संतोषी माता शुक्रवार कथा तथा शुक्रवार लक्ष्मी–संतोषी पूजा विधि देखें।

आज का पंचांग

इस पाठ के लिए तिथि, मुहूर्त और आज के पर्व।

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