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उत्तरकाण्ड · 19

गरुड़जी के सात प्रश्न तथा काकभुशुण्डि के उत्तर

उत्तरकाण्ड का प्रकरण 19: गरुड़जी के सात प्रश्न तथा काकभुशुण्डि के उत्तर। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।

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चौपाई · 3

प्रबल अबिद्या तम मिटि जाई। हारहिं सकल सलभ समुदाई॥ खल कामादि निकट नहिं जाहीं। बसइ भगति जाके उर माहीं॥3॥

चौपाई · 4

गरल सुधासम अरि हित होई। तेहि मनि बिनु सुख पाव न कोई॥ ब्यापहिं मानस रोग न भारी। जिन्ह के बस सब जीव दुखारी॥4॥

चौपाई · 5

राम भगति मनि उर बस जाकें। दुख लवलेस न सपनेहुँ ताकें॥ चतुर सिरोमनि तेइ जग माहीं। जे मनि लागि सुजतन कराहीं॥5॥

चौपाई · 6

सो मनि जदपि प्रगट जग अहई। राम कृपा बिनु नहिं कोउ लहई॥ सुगम उपाय पाइबे केरे। नर हतभाग्य देहिं भटभेरे॥6॥

चौपाई · 7

पावन पर्बत बेद पुराना। राम कथा रुचिराकर नाना॥ मर्मी सज्जन सुमति कुदारी। ग्यान बिराग नयन उरगारी॥7॥

चौपाई · 8

भाव सहित खोजइ जो प्रानी। पाव भगति मनि सब सुख खानी॥ मोरें मन प्रभु अस बिस्वासा। राम ते अधिक राम कर दासा॥8॥

चौपाई · 9

राम सिंधु घन सज्जन धीरा। चंदन तरु हरि संत समीरा॥ सब कर फल हरि भगति सुहाई। सो बिनु संत न काहूँ पाई॥9॥

चौपाई · 10

अस बिचारि जोइ कर सतसंगा। राम भगति तेहि सुलभ बिहंगा॥10॥

दोहा

ब्रह्म पयोनिधि मंदर ग्यान संत सुर आहिं। कथा सुधा मथि काढ़हिं भगति मधुरता जाहिं॥120क॥

दोहा

बिरति चर्म असि ग्यान मद लोभ मोह रिपु मारि। जय पाइअ सो हरि भगति देखु खगेस बिचारि॥120ख॥

चौपाई · 1

पुनि सप्रेम बोलेउ खगराऊ। जौं कृपाल मोहि ऊपर भाऊ। नाथ मोहि निज सेवक जानी। सप्त प्रस्न मम कहहु बखानी॥1॥

चौपाई · 2

प्रथमहिं कहहु नाथ मतिधीरा। सब ते दुर्लभ कवन सरीरा॥ बड़ दुख कवन कवन सुख भारी। सोउ संछेपहिं कहहु बिचारी॥2॥

चौपाई · 3

संत असंत मरम तुम्ह जानहु। तिन्ह कर सहज सुभाव बखानहु॥ कवन पुन्य श्रुति बिदित बिसाला। कहहु कवन अघ परम कराला॥3॥

चौपाई · 4

मानस रोग कहहु समुझाई। तुम्ह सर्बग्य कृपा अधिकाई॥ तात सुनहु सादर अति प्रीती। मैं संछेप कहउँ यह नीती॥4॥

चौपाई · 5

नर तन सम नहिं कवनिउ देही। जीव चराचर जाचत तेही॥ नरक स्वर्ग अपबर्ग निसेनी। ग्यान बिराग भगति सुभ देनी॥5॥

चौपाई · 6

सो तनु धरि हरि भजहिं न जे नर। होहिं बिषय रत मंद मंद तर॥ काँच किरिच बदलें ते लेहीं। कर ते डारि परस मनि देहीं॥6॥

चौपाई · 7

नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं। संत मिलन सम सुख जग नाहीं॥ पर उपकार बचन मन काया। संत सहज सुभाउ खगराया॥7॥

चौपाई · 8

संत सहहिं दुख पर हित लागी। पर दुख हेतु असंत अभागी॥ भूर्ज तरू सम संत कृपाला। पर हित निति सह बिपति बिसाला॥8॥

चौपाई · 9

सन इव खल पर बंधन करई। खाल कढ़ाई बिपति सहि मरई॥ खल बिनु स्वारथ पर अपकारी। अहि मूषक इव सुनु उरगारी॥9॥

चौपाई · 10

पर संपदा बिनासि नसाहीं। जिमि ससि हति हिम उपल बिलाहीं॥ दुष्ट उदय जग आरति हेतू। जथा प्रसिद्ध अधम ग्रह केतू॥10॥

चौपाई · 11

संत उदय संतत सुखकारी। बिस्व सुखद जिमि इंदु तमारी॥ परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा। पर निंदा सम अघ न गरीसा॥11॥

चौपाई · 12

हर गुर निंदक दादुर होई। जन्म सहस्र पाव तन सोई॥ द्विज निंदक बहु नरक भोग करि। जग जनमइ बायस सरीर धरि॥12॥

चौपाई · 13

सुर श्रुति निंदक जे अभिमानी। रौरव नरक परहिं ते प्रानी॥ होहिं उलूक संत निंदा रत। मोह निसा प्रिय ग्यान भानु गत॥13॥

चौपाई · 14

सब कै निंदा जे जड़ करहीं। ते चमगादुर होइ अवतरहीं॥ सुनहु तात अब मानस रोगा। जिन्ह ते दुख पावहिं सब लोगा॥14॥

चौपाई · 15

मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला। तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला॥ काम बात कफ लोभ अपारा। क्रोध पित्त नित छाती जारा॥15॥

चौपाई · 16

प्रीति करहिं जौं तीनिउ भाई। उपजइ सन्यपात दुखदाई॥ बिषय मनोरथ दुर्गम नाना। ते सब सूल नाम को जाना॥16॥

चौपाई · 17

ममता दादु कंडु इरषाई। हरष बिषाद गरह बहुताई॥ पर सुख देखि जरनि सोइ छई। कुष्ट दुष्टता मन कुटिलई॥17॥

चौपाई · 18

अहंकार अति दुखद डमरुआ। दंभ कपट मद मान नेहरुआ॥ तृस्ना उदरबृद्धि अति भारी। त्रिबिधि ईषना तरुन तिजारी॥18॥

चौपाई · 19

जुग बिधि ज्वर मत्सर अबिबेका। कहँ लगि कहौं कुरोग अनेका॥19॥

दोहा

एक ब्याधि बस नर मरहिं ए असाधि बहु ब्याधि। पीड़हिं संतत जीव कहुँ सो किमि लहै समाधि॥121क॥

दोहा

नेम धर्म आचार तप ग्यान जग्य जप दान। भेषज पुनि कोटिन्ह नहिं रोग जाहिं हरिजान॥121ख॥

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गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद। छवि: राजा रवि वर्मा — राम का धनुष-भंग (सार्वजनिक डोमेन)।