उत्तरकाण्ड · 17

काकभुशुण्डि की आगे की कथा, काकभुशुण्डिजी का लोमशजी के पास जाना और शाप तथा अनुग्रह पाना

उत्तरकाण्ड का प्रकरण 17: काकभुशुण्डि की आगे की कथा, काकभुशुण्डिजी का लोमशजी के पास जाना और शाप तथा अनुग्रह पाना। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।

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चौपाई · 7

छूटी त्रिबिधि ईषना गाढ़ी। एक लालसा उर अति बाढ़ी॥ राम चरन बारिज जब देखौं। तब निज जन्म सफल करि लेखौं॥7॥

चौपाई · 8

जेहि पूँछउँ सोइ मुनि अस कहई। ईस्वर सर्ब भूतमय अहई॥ निर्गुन मत नहिं मोहि सोहाई। सगुन ब्रह्म रति उर अधिकाई॥8॥

दोहा

गुर के बचन सुरति करि राम चरन मनु लाग। रघुपति जस गावत फिरउँ छन छन नव अनुराग॥110क॥

दोहा

मेरु सिखर बट छायाँ मुनि लोमस आसीन। देखि चरन सिरु नायउँ बचन कहेउँ अति दीन॥110ख॥

दोहा

सुनि मम बचन बिनीत मृदु मुनि कृपाल खगराज। मोहि सादर पूँछत भए द्विज आयहु केहि काज॥110ग॥

दोहा

तब मैं कहा कृपानिधि तुम्ह सर्बग्य सुजान। सगुन ब्रह्म अवराधन मोहि कहहु भगवान॥110घ॥

चौपाई · 1

तब मुनीस रघुपति गुन गाथा। कहे कछुक सादर खगनाथा॥ ब्रह्मग्यान रत मुनि बिग्यानी। मोहि परम अधिकारी जानी॥1॥

चौपाई · 2

लागे करन ब्रह्म उपदेसा। अज अद्वैत अगुन हृदयेसा॥ अकल अनीह अनाम अरूपा। अनुभव गम्य अखंड अनूपा॥2॥

चौपाई · 3

मन गोतीत अमल अबिनासी। निर्बिकार निरवधि सुख रासी॥ सो तैं ताहि तोहि नहिं भेदा। बारि बीचि इव गावहिं बेदा॥3॥

चौपाई · 4

बिबिधि भाँति मोहि मुनि समुझावा। निर्गुन मत मम हृदयँ न आवा॥ पुनि मैं कहेउँ नाइ पद सीसा। सगुन उपासन कहहु मुनीसा॥4॥

चौपाई · 5

राम भगति जल मम मन मीना। किमि बिलगाइ मुनीस प्रबीना॥ सोइ उपदेस कहहु करि दाया। निज नयनन्हि देखौं रघुराया॥5॥

चौपाई · 6

भरि लोचन बिलोकि अवधेसा। तब सुनिहउँ निर्गुन उपदेसा॥ मुनि पुनि कहि हरिकथा अनूपा। खंडि सगुन मत अगुन निरूपा॥6॥

चौपाई · 7

तब मैं निर्गुन मत कर दूरी। सगुन निरूपउँ करि हठ भूरी॥ उत्तर प्रतिउत्तर मैं कीन्हा। मुनि तन भए क्रोध के चीन्हा॥7॥

चौपाई · 8

सुनु प्रभु बहुत अवग्या किएँ। उपज क्रोध ग्यानिन्ह के हिएँ॥ अति संघरषन जौं कर कोई। अनल प्रगट चंदन ते होई॥8॥

दोहा

बारंबार सकोप मुनि करइ निरूपन ग्यान। मैं अपनें मन बैठ तब करउँ बिबिधि अनुमान॥111क॥

दोहा

क्रोध कि द्वैतबुद्धि बिनु द्वैत कि बिनु अग्यान। मायाबस परिछिन्न जड़ जीव कि ईस समान॥111ख॥

दोहा · 1

कबहुँ कि दुःख सब कर हित ताकें। तेहि कि दरिद्र परस मनि जाकें॥ परद्रोही की होहिं निसंका। कामी पुनि कि रहहिं अकलंका॥1॥

दोहा · 2

बंस कि रह द्विज अनहित कीन्हें। कर्म की होहिं स्वरूपहि चीन्हें॥ काहू सुमति कि खल सँग जामी। सुभ गति पाव कि परत्रिय गामी॥2॥

दोहा · 3

भव कि परहिं परमात्मा बिंदक। सुखी कि होहिं कबहुँ हरि निंदक॥ राजु कि रहइ नीति बिनु जानें। अघ कि रहहिं हरि चरित बखानें॥3॥

दोहा · 4

पावन जस कि पुन्य बिनु होई। बिनु अघ अजस कि पावइ कोई॥ लाभु कि किछु हरि भगति समाना। जेहि गावहिं श्रुति संत पुराना॥4॥

दोहा · 5

हानि कि जग एहि सम किछु भाई। भजिअ न रामहि नर तनु पाई॥ अघ कि पिसुनता सम कछु आना। धर्म कि दया सरिस हरिजाना॥5॥

दोहा · 6

एहि बिधि अमिति जुगुति मन गुनऊँ। मुनि उपदेस न सादर सुनउँ॥ पुनि पुनि सगुन पच्छ मैं रोपा। तब मुनि बोलेउ बचन सकोपा॥6॥

दोहा · 7

मूढ़ परम सिख देउँ न मानसि। उत्तर प्रतिउत्तर बहु आनसि॥ सत्य बचन बिस्वास न करही। बायस इव सबही ते डरही॥7॥

दोहा · 8

सठ स्वपच्छ तव हृदयँ बिसाला। सपदि होहि पच्छी चंडाला॥ लीन्ह श्राप मैं सीस चढ़ाई। नहिं कछु भय न दीनता आई॥8॥

दोहा

तुरत भयउँ मैं काग तब पुनि मुनि पद सिरु नाइ। सुमिरि राम रघुबंस मनि हरषित चलेउँ उड़ाइ॥112क॥

दोहा

उमा जे राम चरन रत बिगत काम मद क्रोध। निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध॥112ख॥

चौपाई · 1

सुनु खगेस नहिं कछु रिषि दूषन। उर प्रेरक रघुबंस बिभूषन॥ कृपासिंधु मुनि मति करि भोरी। लीन्ही प्रेम परिच्छा मोरी॥1॥

चौपाई · 2

मन बच क्रम मोहि निज जन जाना। मुनि मति पुनि फेरी भगवाना॥ रिषि मम महत सीलता देखी। राम चरन बिस्वास बिसेषी॥2॥

चौपाई · 3

अति बिसमय पुनि पुनि पछिताई। सादर मुनि मोहि लीन्ह बोलाई॥ मम परितोष बिबिधि बिधि कीन्हा। हरषित राममंत्र तब दीन्हा॥3॥

चौपाई · 4

बालक रूप राम कर ध्याना। कहेउ मोहि मुनि कृपानिधाना॥ सुंदर सुखद मोहि अति भावा। सो प्रथमहिं मैं तुम्हहि सुनावा॥4॥

चौपाई · 5

मुनि मोहि कछुक काल तहँ राखा। रामचरितमानस तब भाषा॥ सादर मोहि यह कथा सुनाई। पुनि बोले मुनि गिरा सुहाई॥5॥

चौपाई · 6

रामचरित सर गुप्त सुहावा। संभु प्रसाद तात मैं पावा॥ तोहि निज भगत राम कर जानी। ताते मैं सब कहेउँ बखानी॥6॥

चौपाई · 7

राम भगति जिन्ह कें उर नाहीं। कबहुँ न तात कहिअ तिन्ह पाहीं॥ मुनि मोहि बिबिधि भाँति समुझावा। मैं सप्रेम मुनि पद सिरु नावा॥7॥

चौपाई · 8

निज कर कमल परसि मम सीसा। हरषित आसिष दीन्ह मुनीसा॥ राम भगति अबिरल उर तोरें। बसिहि सदा प्रसाद अब मोरें॥8॥

दोहा

सदा राम प्रिय होहु तुम्ह सुभ गुन भवन अमान। कामरूप इच्छा मरन ग्यान बिराग निधान॥113क॥

दोहा

जेहिं आश्रम तुम्ह बसब पुनि सुमिरत श्रीभगवंत। ब्यापिहि तहँ न अबिद्या जोजन एक प्रजंत॥113ख॥

चौपाई · 1

काल कर्म गुन दोष सुभाऊ। कछु दुख तुम्हहि न ब्यापिहि काऊ॥ राम रहस्य ललित बिधि नाना। गुप्त प्रगट इतिहास पुराना॥1॥

चौपाई · 2

बिनु श्रम तुम्ह जानब सब सोऊ। नित नव नेह राम पद होऊ॥ जो इच्छा करिहहु मन माहीं। हरि प्रसाद कछु दुर्लभ नाहीं॥2॥

चौपाई · 3

सुनि मुनि आसिष सुनु मतिधीरा। ब्रह्मगिरा भइ गगन गँभीरा॥ एवमस्तु तव बच मुनि ग्यानी। यह मम भगत कर्म मन बानी॥3॥

चौपाई · 4

सुनि नभगिरा हरष मोहि भयऊ। प्रेम मगन सब संसय गयऊ॥ करि बिनती मुनि आयसु पाई। पद सरोज पुनि पुनि सिरु नाई॥4॥

चौपाई · 5

हरष सहित एहिं आश्रम आयउँ। प्रभु प्रसाद दुर्लभ बर पायउँ॥ इहाँ बसत मोहि सुनु खग ईसा। बीते कलप सात अरु बीसा॥5॥

चौपाई · 6

करउँ सदा रघुपति गुन गाना। सादर सुनहिं बिहंग सुजाना॥ जब जब अवधपुरीं रघुबीरा। धरहिं भगत हित मनुज सरीरा॥6॥

चौपाई · 7

तब तब जाइ राम पुर रहऊँ। सिसुलीला बिलोकि सुख लहऊँ॥ पुनि उर राखि राम सिसुरूपा। निज आश्रम आवउँ खगभूपा॥7॥

चौपाई · 8

कथा सकल मैं तुम्हहि सुनाई। काग देहि जेहिं कारन पाई॥ कहिउँ तात सब प्रस्न तुम्हारी। राम भगति महिमा अति भारी॥8॥

दोहा

ताते यह तन मोहि प्रिय भयउ राम पद नेह। निज प्रभु दरसन पायउँ गए सकल संदेह॥114क॥

दोहा

भगति पच्छ हठ करि रहेउँ दीन्हि महारिषि साप। मुनि दुर्लभ बर पायउँ देखहु भजन प्रताप॥114ख॥

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गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।