उत्तरकाण्ड · 09
श्री रामजी का प्रजा को उपदेश (श्री रामगीता), पुरवासियों की कृतज्ञता
उत्तरकाण्ड का प्रकरण 9: श्री रामजी का प्रजा को उपदेश (श्री रामगीता), पुरवासियों की कृतज्ञता। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
दोहा · 41
सुनहु तात माया कृत गुन अरु दोष अनेक। गुन यह उभय न देखिअहिं देखिअ सो अबिबेक॥41॥
चौपाई · 1
श्रीमुख बचन सुनत सब भाई। हरषे प्रेम न हृदयँ समाई॥ करहिं बिनय अति बारहिं बारा। हनूमान हियँ हरष अपारा॥1॥
चौपाई · 2
पुनि रघुपति निज मंदिर गए। एहि बिधि चरित करत नित नए॥ बार बार नारद मुनि आवहिं। चरित पुनीत राम के गावहिं॥2॥
चौपाई · 3
नित नव चरित देखि मुनि जाहीं। ब्रह्मलोक सब कथा कहाहीं॥ सुनि बिरंचि अतिसय सुख मानहिं। पुनि पुनि तात करहु गुन गानहिं॥3॥
चौपाई · 4
सनकादिक नारदहि सराहहिं। जद्यपि ब्रह्म निरत मुनि आहहिं॥ सुनि गुन गान समाधि बिसारी। सादर सुनहिं परम अधिकारी॥4॥
दोहा · 42
जीवनमुक्त ब्रह्मपर चरित सुनहिं तजि ध्यान। जे हरि कथाँ न करहिं रति तिन्ह के हिय पाषान॥42॥
चौपाई · 1
एक बार रघुनाथ बोलाए। गुर द्विज पुरबासी सब आए॥ बैठे गुर मुनि अरु द्विज सज्जन। बोले बचन भगत भव भंजन॥1॥
चौपाई · 2
सुनहु सकल पुरजन मम बानी। कहउँ न कछु ममता उर आनी॥ नहिं अनीति नहिं कछु प्रभुताई। सुनहु करहु जो तुम्हहि सोहाई॥2॥
चौपाई · 3
सोइ सेवक प्रियतम मम सोई। मम अनुसासन मानै जोई॥ जौं अनीति कछु भाषौं भाई। तौ मोहि बरजहु भय बिसराई॥3॥
चौपाई · 4
बड़ें भाग मानुष तनु पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा॥ साधन धाम मोच्छ कर द्वारा। पाइ न जेहिं परलोक सँवारा॥4॥
दोहा · 43
सो परत्र दुख पावइ सिर धुनि धुनि पछिताई। कालहि कर्महि ईस्वरहि मिथ्या दोष लगाइ॥43॥
चौपाई · 1
एहि तन कर फल बिषय न भाई। स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई॥ नर तनु पाइ बिषयँ मन देहीं। पलटि सुधा ते सठ बिष लेहीं॥1॥
चौपाई · 2
ताहि कबहुँ भल कहइ न कोई। गुंजा ग्रहइ परस मनि खोई॥ आकर चारि लच्छ चौरासी। जोनि भ्रमत यह जिव अबिनासी॥2॥
चौपाई · 3
फिरत सदा माया कर प्रेरा। काल कर्म सुभाव गुन घेरा॥ कबहुँक करि करुना नर देही। देत ईस बिनु हेतु सनेही॥3॥
चौपाई · 4
नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो। सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो॥ करनधार सदगुर दृढ़ नावा। दुर्लभ साज सुलभ करि पावा॥4॥
दोहा · 44
जो न तरै भव सागर नर समाज अस पाइ। सो कृत निंदक मंदमति आत्माहन गति जाइ॥44॥
चौपाई · 1
जौं परलोक इहाँ सुख चहहू। सुनि मम बचन हृदयँ दृढ़ गहहू॥ सुलभ सुखद मारग यह भाई। भगति मोरि पुरान श्रुति गाई॥1॥
चौपाई · 2
ग्यान अगम प्रत्यूह अनेका। साधन कठिन न मन कहुँ टेका॥ करत कष्ट बहु पावइ कोऊ। भक्ति हीन मोहि प्रिय नहिं सोऊ॥2॥
चौपाई · 3
भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी। बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी॥ पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता। सतसंगति संसृति कर अंता॥3॥
चौपाई · 4
पुन्य एक जग महुँ नहिं दूजा। मन क्रम बचन बिप्र पद पूजा॥ सानुकूल तेहि पर मुनि देवा। जो तजि कपटु करइ द्विज सेवा॥4॥
दोहा · 45
औरउ एक गुपुत मत सबहि कहउँ कर जोरि। संकर भजन बिना नर भगति न पावइ मोरि॥45॥
चौपाई · 1
कहहु भगति पथ कवन प्रयासा। जोग न मख जप तप उपवासा। सरल सुभाव न मन कुटिलाई। जथा लाभ संतोष सदाई॥1॥
चौपाई · 2
मोर दास कहाइ नर आसा। करइ तौ कहहु कहा बिस्वासा॥ बहुत कहउँ का कथा बढ़ाई। एहि आचरन बस्य मैं भाई॥2॥
चौपाई · 3
बैर न बिग्रह आस न त्रासा। सुखमय ताहि सदा सब आसा॥ अनारंभ अनिकेत अमानी। अनघ अरोष दच्छ बिग्यानी॥3॥
चौपाई · 4
प्रीति सदा सज्जन संसर्गा। तृन सम बिषय स्वर्ग अपबर्गा॥ भगति पच्छ हठ नहिं सठताई। दुष्ट तर्क सब दूरि बहाई॥4॥
दोहा · 46
– मम गुन ग्राम नाम रत गत ममता मद मोह। ता कर सुख सोइ जानइ परानंद संदोह॥46॥
चौपाई · 1
- सुनत सुधा सम बचन राम के । गहे सबनि पद कृपाधाम के॥ जननि जनक गुर बंधु हमारे। कृपा निधान प्रान ते प्यारे॥1॥
चौपाई · 2
तनु धनु धाम राम हितकारी। सब बिधि तुम्ह प्रनतारति हारी॥ असि सिख तुम्ह बिनु देइ न कोऊ। मातु पिता स्वारथ रत ओऊ॥2॥
चौपाई · 3
हेतु रहित जग जुग उपकारी। तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी॥ स्वारथ मीत सकल जग माहीं। सपनेहुँ प्रभु परमारथ नाहीं॥3॥
चौपाई · 4
सब के बचन प्रेम रस साने। सुनि रघुनाथ हृदयँ हरषाने॥ निज निज गृह गए आयसु पाई। बरनत प्रभु बतकही सुहाई॥4॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।