उत्तरकाण्ड · 05
वानरों और निषाद की विदाई
उत्तरकाण्ड का प्रकरण 5: वानरों और निषाद की विदाई। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
दोहा · 15
ब्रह्मानंद मगन कपि सब कें प्रभु पद प्रीति। जात न जाने दिवस तिन्ह गए मास षट बीति॥15॥
चौपाई · 1
बिसरे गृह सपनेहुँ सुधि नाहीं। जिमि परद्रोह संत मन माहीं॥ तब रघुपति सब सखा बोलाए। आइ सबन्हि सादर सिरु नाए॥1॥
चौपाई · 2
परम प्रीति समीप बैठारे। भगत सुखद मृदु बचन उचारे॥ तुम्ह अति कीन्हि मोरि सेवकाई। मुख पर केहि बिधि करौं बड़ाई॥2॥
चौपाई · 3
ताते मोहि तुम्ह अति प्रिय लागे। मम हित लागि भवन सुख त्यागे॥ अनुज राज संपति बैदेही। देह गेह परिवार सनेही॥3॥
चौपाई · 4
सब मम प्रिय नहिं तुम्हहि समाना। मृषा न कहउँ मोर यह बाना॥ सब कें प्रिय सेवक यह नीती। मोरें अधिक दास पर प्रीती॥4॥
दोहा · 16
अब गृह जाहु सखा सब भजेहु मोहि दृढ़ नेम। सदा सर्बगत सर्बहित जानि करेहु अति प्रेम॥16॥
चौपाई · 1
सुनि प्रभु बचन मगन सब भए। को हम कहाँ बिसरि तन गए॥ एकटक रहे जोरि कर आगे। सकहिं न कछु कहि अति अनुरागे॥1॥
चौपाई · 2
परम प्रेम तिन्ह कर प्रभु देखा। कहा बिबिधि बिधि ग्यान बिसेषा॥ प्रभु सन्मुख कछु कहन न पारहिं। पुनि पुनि चरन सरोज निहारहिं॥2॥
चौपाई · 3
तब प्रभु भूषन बसन मगाए। नाना रंग अनूप सुहाए॥ सुग्रीवहि प्रथमहिं पहिराए। बसन भरत निज हाथ बनाए॥3॥
चौपाई · 4
प्रभु प्रेरित लछिमन पहिराए। लंकापति रघुपति मन भाए॥ अंगद बैठ रहा नहिं डोला। प्रीति देखि प्रभु ताहि न बोला॥4॥
दोहा
जामवंत नीलादि सब पहिराए रघुनाथ। हियँ धरि राम रूप सब चले नाइ पद माथ॥17क॥
दोहा
तब अंगद उठि नाइ सिरु सजल नयन कर जोरि। अति बिनीत बोलेउ बचन मनहुँ प्रेम रसबोरि॥17ख॥
चौपाई · 1
सुनु सर्बग्य कृपा सुख सिंधो। दीन दयाकर आरत बंधो॥ मरती बेर नाथ मोहि बाली। गयउ तुम्हारेहि कोंछें घाली॥1॥
चौपाई · 2
असरन सरन बिरदु संभारी। मोहि जनि तजहु भगत हितकारी॥ मोरें तुम्ह प्रभु गुर पितु माता। जाउँ कहाँ तजि पद जलजाता॥2॥
चौपाई · 3
तुम्हहि बिचारि कहहु नरनाहा। प्रभु तजि भवन काज मम काहा॥ बालक ग्यान बुद्धि बल हीना। राखहु सरन नाथ जन दीना॥3॥
चौपाई · 4
नीचि टहल गृह कै सब करिहउँ। पद पंकज बिलोकि भव तरिहउँ॥ अस कहि चरन परेउ प्रभु पाही। अब जनि नाथ कहहु गृह जाही॥4॥
दोहा
अंगद बचन बिनीत सुनि रघुपति करुना सींव। प्रभु उठाइ उर लायउ सजल नयन राजीव॥18क॥
दोहा
निज उर माल बसन मनि बालितनय पहिराइ। बिदा कीन्हि भगवान तब बहु प्रकार समुझाइ॥18ख॥
चौपाई · 1
भरत अनुज सौमित्रि समेता। पठवन चले भगत कृत चेता॥ अंगद हृदयँ प्रेम नहिं थोरा। फिरि फिरि चितव राम कीं ओरा॥1॥
चौपाई · 2
बार बार कर दंड प्रनामा। मन अस रहन कहहिं मोहि रामा॥ राम बिलोकनि बोलनि चलनी। सुमिरि सुमिरि सोचत हँसि मिलनी॥2॥
चौपाई · 3
प्रभु रुख देखि बिनय बहु भाषी। चलेउ हृदयँ पद पंकज राखी॥ अति आदर सब कपि पहुँचाए। भाइन्ह सहित भरत पुनि आए॥3॥
चौपाई · 4
तब सुग्रीव चरन गहि नाना। भाँति बिनय कीन्हे हनुमाना॥ दिन दस करि रघुपति पद सेवा। पुनि तव चरन देखिहउँ देवा॥4॥
चौपाई · 5
पुन्य पुंज तुम्ह पवनकुमारा। सेवहु जाइ कृपा आगारा॥ अस कहि कपि सब चले तुरंता। अंगद कहइ सुनहु हनुमंता॥5॥
दोहा
कहेहु दंडवत प्रभु सैं तुम्हहि कहउँ कर जोरि। बार बार रघुनायकहि सुरति कराएहु मोरि॥19क॥
दोहा
अस कहि चलेउ बालिसुत फिरि आयउ हनुमंत। तासु प्रीति प्रभु सन कही मगन भए भगवंत॥19ख॥
दोहा
कुलिसहु चाहि कठोर अति कोमल कुसुमहु चाहि। चित्त खगेस राम कर समुझि परइ कहु काहि॥19ग॥
चौपाई · 1
पुनि कृपाल लियो बोलि निषादा। दीन्हे भूषन बसन प्रसादा॥ जाहु भवन मम सुमिरन करेहू। मन क्रम बचन धर्म अनुसरेहू॥1॥
चौपाई · 2
तुम्ह मम सखा भरत सम भ्राता। सदा रहेहु पुर आवत जाता॥ बचन सुनत उपजा सुख भारी। परेउ चरन भरि लोचन बारी॥2॥
चौपाई · 3
चरन नलिन उर धरि गृह आवा। प्रभु सुभाउ परिजनन्हि सुनावा॥ रघुपति चरित देखि पुरबासी। पुनि पुनि कहहिं धन्य सुखरासी॥3॥
चौपाई · 4
राम राज बैठें त्रैलोका। हरषित भए गए सब सोका॥ बयरु न कर काहू सन कोई। राम प्रताप बिषमता खोई॥4॥
दोहा · 20
बरनाश्रम निज निज धरम निरत बेद पथ लोग। चलहिं सदा पावहिं सुखहि नहिं भय सोक न रोग॥20॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद। छवि: राजा रवि वर्मा — राम का धनुष-भंग (सार्वजनिक डोमेन)।