लंकाकाण्ड · 28

पुष्पक विमान पर चढ़कर श्री सीता-रामजी का अवध के लिए प्रस्थान, श्री रामचरित्र की महिमा- Lord Ram and Sita ji leave for Ayodhya on the aerial car, Pushpak. The glory of Lord Ram’s story

लंकाकाण्ड का प्रकरण 28: पुष्पक विमान पर चढ़कर श्री सीता-रामजी का अवध के लिए प्रस्थान, श्री रामचरित्र की महिमा- Lord Ram and Sita ji leave for Ayodhya on the aerial car, Pushpak. The glory of Lord Ram’s story। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।

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दोहा

मुनि जेहि ध्यान न पावहिं नेति नेति कह बेद। कृपासिंधु सोइ कपिन्ह सन करत अनेक बिनोद॥117 क॥

दोहा

उमा जोग जप दान तप नाना मख ब्रत नेम। राम कृपा नहिं करहिं तसि जसि निष्केवल प्रेम॥117 ख॥

चौपाई · 1

भालु कपिन्ह पट भूषन पाए। पहिरि पहिरि रघुपति पहिं आए॥ नाना जिनस देखि सब कीसा। पुनि पुनि हँसत कोसलाधीसा॥1॥

चौपाई · 2

चितइ सबन्हि पर कीन्ही दाया। बोले मृदुल बचन रघुराया॥ तुम्हरें बल मैं रावनु मार्‌यो। तिलक बिभीषन कहँ पुनि सार्‌यो॥2॥

चौपाई · 3

निज निज गृह अब तुम्ह सब जाहू। सुमिरेहु मोहि डरपहु जनि काहू॥ सुनत बचन प्रेमाकुल बानर। जोरि पानि बोले सब सादर॥3॥

चौपाई · 4

प्रभु जोइ कहहु तुम्हहि सब सोहा। हमरें होत बचन सुनि मोहा॥ दीन जानि कपि किए सनाथा। तुम्ह त्रैलोक ईस रघुनाथा॥4॥

चौपाई · 5

सुनि प्रभु बचन लाज हम मरहीं। मसक कहूँ खगपति हित करहीं॥ देखि राम रुख बानर रीछा। प्रेम मगन नहिं गृह कै ईछा॥5॥

दोहा

प्रभु प्रेरित कपि भालु सब राम रूप उर राखि। हरष बिषाद सहित चले बिनय बिबिध बिधि भाषि॥118 क॥

दोहा

कपिपति नील रीछपति अंगद नल हनुमान। सहित बिभीषन अपर जे जूथप कपि बलवान॥118 ख॥

दोहा

कहि न सकहिं कछु प्रेम बस भरि भरि लोचन बारि॥ सन्मुख चितवहिं राम तन नयन निमेष निवारि॥118 ग॥

चौपाई · 1

अतिसय प्रीति देखि रघुराई। लीन्हे सकल बिमान चढ़ाई॥ मन महुँ बिप्र चरन सिरु नायो। उत्तर दिसिहि बिमान चलायो॥1॥

चौपाई · 2

चलत बिमान कोलाहल होई। जय रघुबीर कहइ सबु कोई॥ सिंहासन अति उच्च मनोहर। श्री समेत प्रभु बैठे ता पर॥2॥

चौपाई · 3

राजत रामु सहित भामिनी। मेरु सृंग जनु घन दामिनी॥ रुचिर बिमानु चलेउ अति आतुर। कीन्ही सुमन बृष्टि हरषे सुर॥3॥

चौपाई · 4

परम सुखद चलि त्रिबिध बयारी। सागर सर सरि निर्मल बारी॥ सगुन होहिं सुंदर चहुँ पासा। मन प्रसन्न निर्मल नभ आसा॥4॥

चौपाई · 5

कह रघुबीर देखु रन सीता। लछिमन इहाँ हत्यो इँद्रजीता॥ हनूमान अंगद के मारे। रन महि परे निसाचर भारे॥5॥

चौपाई · 6

कुंभकरन रावन द्वौ भाई। इहाँ हते सुर मुनि दुखदाई॥6॥

दोहा

इहाँ सेतु बाँध्यों अरु थापेउँ सिव सुख धाम। सीता सहित कृपानिधि संभुहि कीन्ह प्रनाम॥119 क॥

दोहा

जहँ जहँ कृपासिंधु बन कीन्ह बास बिश्राम। सकल देखाए जानकिहि कहे सबन्हि के नाम॥119 ख॥

चौपाई · 1

तुरत बिमान तहाँ चलि आवा। दंडक बन जहँ परम सुहावा॥ कुंभजादि मुनिनायक नाना। गए रामु सब कें अस्थाना॥1॥

चौपाई · 2

सकल रिषिन्ह सन पाइ असीसा। चित्रकूट आए जगदीसा॥ तहँ करि मुनिन्ह केर संतोषा। चला बिमानु तहाँ ते चोखा॥2॥

चौपाई · 3

बहुरि राम जानकिहि देखाई। जमुना कलि मल हरनि सुहाई॥ पुनि देखी सुरसरी पुनीता। राम कहा प्रनाम करु सीता॥3॥

चौपाई · 4

तीरथपति पुनि देखु प्रयागा। निरखत जन्म कोटि अघ भागा॥ देखु परम पावनि पुनि बेनी। हरनि सोक हरि लोक निसेनी॥4॥

चौपाई · 5

पुनि देखु अवधपुरि अति पावनि। त्रिबिध ताप भव रोग नसावनि॥5॥

दोहा

सीता सहित अवध कहुँ कीन्ह कृपाल प्रनाम। सजल नयन तन पुलकित पुनि पुनि हरषित राम॥120 क॥

दोहा

पुनि प्रभु आइ त्रिबेनीं हरषित मज्जनु कीन्ह। कपिन्ह सहित बिप्रन्ह कहुँ दान बिबिध बिधि दीन्ह॥120 ख॥

चौपाई · 1

प्रभु हनुमंतहि कहा बुझाई। धरि बटु रूप अवधपुर जाई॥ भरतहि कुसल हमारि सुनाएहु। समाचार लै तुम्ह चलि आएहु॥1॥

चौपाई · 2

तुरत पवनसुत गवनत भयऊ। तब प्रभु भरद्वाज पहिं गयऊ॥ नाना बिधि मुनि पूजा कीन्ही। अस्तुति करि पुनि आसिष दीन्ही॥2॥

चौपाई · 3

मुनि पद बंदि जुगल कर जोरी। चढ़ि बिमान प्रभु चले बहोरी॥ इहाँ निषाद सुना प्रभु आए। नाव नाव कहँ लोग बोलाए॥3॥

चौपाई · 4

सुरसरि नाघि जान तब आयो। उतरेउ तट प्रभु आयसु पायो॥ तब सीताँ पूजी सुरसरी। बहु प्रकार पुनि चरनन्हि परी॥4॥

चौपाई · 5

दीन्हि असीस हरषि मन गंगा। सुंदरि तव अहिवात अभंगा॥ सुनत गुहा धायउ प्रेमाकुल। आयउ निकट परम सुख संकुल॥5॥

चौपाई · 6

प्रभुहि सहित बिलोकि बैदेही। परेउ अवनि तन सुधि नहिं तेही॥ प्रीति परम बिलोकि रघुराई। हरषि उठाइ लियो उर लाई॥6॥

छन्द · 1

- : लियो हृदयँ लाइ कृपा निधान सुजान रायँ रमापति। बैठारि परम समीप बूझी कुसल सो कर बीनती॥ अब कुसल पद पंकज बिलोकि बिरंचि संकर सेब्य जे। सुख धाम पूरनकाम राम नमामि राम नमामि ते॥1॥

छन्द · 2

सब भाँति अधम निषाद सो हरि भरत ज्यों उर लाइयो। मतिमंद तुलसीदास सो प्रभु मोह बस बिसराइयो॥ यह रावनारि चरित्र पावन राम पद रतिप्रद सदा। कामादिहर बिग्यानकर सुर सिद्ध मुनि गावहिं मुदा॥2॥

दोहा

समर बिजय रघुबीर के चरित जे सुनहिं सुजान। बिजय बिबेक बिभूति नित तिन्हहि देहिं भगवान॥121 क॥

दोहा

यह कलिकाल मलायतन मन करि देखु बिचार। श्री रघुनाथ नाम तजि नाहिन आन अधार॥121 ख॥

दोहा

इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने षष्ठः सोपानः समाप्तः।

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गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।