लंकाकाण्ड · 15
कुंभकरण युद्ध और भगवान राम के हाथों उसकी परमगति
लंकाकाण्ड का प्रकरण 15: कुंभकरण युद्ध और भगवान राम के हाथों उसकी परमगति। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
चौपाई · 1
बंधु बचन सुनि चला बिभीषन। आयउ जहँ त्रैलोक बिभूषन॥ नाथ भूधराकार सरीरा। कुंभकरन आवत रनधीरा॥1॥
चौपाई
॥
चौपाई · 2
एतना कपिन्ह सुना जब काना। किलकिलाइ धाए बलवाना॥ लिए उठाइ बिटप अरु भूधर। कटकटाइ डारहिं ता ऊपर॥2॥
चौपाई · 3
कोटि कोटि गिरि सिखर प्रहारा। करहिं भालु कपि एक एक बारा॥ मुर्यो न मनु तनु टर्यो न टार्यो। जिमि गज अर्क फलनि को मार्यो॥3॥
चौपाई · 4
तब मारुतसुत मुठिका हन्यो। परयो धरनि ब्याकुल सिर धुन्यो॥ पुनि उठि तेहिं मारेउ हनुमंता। घुर्मित भूतल परेउ तुरंता॥4॥
चौपाई · 5
पुनि नल नीलहि अवनि पछारेसि। जहँ तहँ पटकि पटकि भट डारेसि॥ चली बलीमुख सेन पराई। अति भय त्रसित न कोउ समुहाई॥5॥
दोहा · 65
अंगदादि कपि मुरुछित करि समेत सुग्रीव। काँख दाबि कपिराज कहुँ चला अमित बल सींव॥65॥
चौपाई · 1
उमा करत रघुपति नरलीला। खेलत गरुड़ जिमि अहिगन मीला॥ भृकुटि भंग जो कालहि खाई। ताहि कि सोहइ ऐसि लराई॥1॥
चौपाई · 2
जग पावनि कीरति बिस्तरिहहिं। गाइ गाइ भवनिधि नर तरिहहिं॥ मुरुछा गइ मारुतसुत जागा। सुग्रीवहि तब खोजन लागा॥2॥
चौपाई · 3
सुग्रीवहु कै मुरुछा बीती। निबुकि गयउ तेहि मृतक प्रतीती॥ काटेसि दसन नासिका काना। गरजि अकास चलेउ तेहिं जाना॥3॥
चौपाई · 4
गहेउ चरन गहि भूमि पछारा। अति लाघवँ उठि पुनि तेहि मारा॥ पुनि आयउ प्रभु पहिं बलवाना। जयति जयति जय कृपानिधाना॥4॥
चौपाई · 5
नाक कान काटे जियँ जानी। फिरा क्रोध करि भइ मन ग्लानी॥ सहज भीम पुनि बिनु श्रुति नासा। देखत कपि दल उपजी त्रासा॥5॥
दोहा · 66
जय जय जय रघुबंस मनि धाए कपि दै हूह। एकहि बार तासु पर छाड़ेन्हि गिरि तरु जूह॥66॥
चौपाई · 1
कुंभकरन रन रंग बिरुद्धा। सन्मुख चला काल जनु क्रुद्धा॥ कोटि कोटि कपि धरि धरि खाई। जनु टीड़ी गिरि गुहाँ समाई॥1॥
चौपाई · 2
कोटिन्ह गहि सरीर सन मर्दा। कोटिन्ह मीजि मिलव महि गर्दा॥ मुख नासा श्रवनन्हि कीं बाटा। निसरि पराहिं भालु कपि ठाटा॥2॥
चौपाई · 3
रन मद मत्त निसाचर दर्पा। बिस्व ग्रसिहि जनु ऐहि बिधि अर्पा॥ मुरे सुभट सब फिरहिं न फेरे। सूझ न नयन सुनहिं नहिं टेरे॥3॥
चौपाई · 4
कुंभकरन कपि फौज बिडारी। सुनि धाई रजनीचर धारी॥ देखी राम बिकल कटकाई। रिपु अनीक नाना बिधि आई॥4॥
दोहा · 67
सुनु सुग्रीव बिभीषन अनुज सँभारेहु सैन। मैं देखउँ खल बल दलहि बोले राजिवनैन॥67॥
चौपाई · 1
कर सारंग साजि कटि भाथा। अरि दल दलन चले रघुनाथा॥ प्रथम कीन्हि प्रभु धनुष टंकोरा। रिपु दल बधिर भयउ सुनि सोरा॥1॥
चौपाई · 2
सत्यसंध छाँड़े सर लच्छा। कालसर्प जनु चले सपच्छा॥ जहँ तहँ चले बिपुल नाराचा। लगे कटन भट बिकट पिसाचा॥2॥
चौपाई · 3
कटहिं चरन उर सिर भुजदंडा। बहुतक बीर होहिं सत खंडा॥ घुर्मि घुर्मि घायल महि परहीं। उठि संभारि सुभट पुनि लरहीं॥3॥
चौपाई · 4
लागत बान जलद जिमि गाजहिं। बहुतक देखि कठिन सर भाजहिं॥ रुंड प्रचंड मुंड बिनु धावहिं। धरु धरु मारु मारु धुनि गावहिं॥4॥
दोहा · 68
छन महुँ प्रभु के सायकन्हि काटे बिकट पिसाच। पुनि रघुबीर निषंग महुँ प्रबिसे सब नाराच॥68॥
चौपाई · 1
कुंभकरन मन दीख बिचारी। हति छन माझ निसाचर धारी॥ भा अति क्रुद्ध महाबल बीरा। कियो मृगनायक नाद गँभीरा॥1॥
चौपाई · 2
कोपि महीधर लेइ उपारी। डारइ जहँ मर्कट भट भारी॥ आवत देखि सैल प्रभु भारे। सरन्हि काटि रज सम करि डारे॥2॥
चौपाई · 3
पुनि धनु तानि कोपि रघुनायक। छाँड़े अति कराल बहु सायक॥ तनु महुँ प्रबिसि निसरि सर जाहीं। जिमि दामिनि घन माझ समाहीं॥3॥
चौपाई · 4
सोनित स्रवत सोह तन कारे। जनु कज्जल गिरि गेरु पनारे॥ बिकल बिलोकि भालु कपि धाए। बिहँसा जबहिं निकट कपि आए॥4॥
दोहा · 69
महानाद करि गर्जा कोटि कोटि गहि कीस। महि पटकइ गजराज इव सपथ करइ दससीस॥69॥
चौपाई · 1
भागे भालु बलीमुख जूथा। बृकु बिलोकि जिमि मेष बरूथा॥ चले भागि कपि भालु भवानी। बिकल पुकारत आरत बानी॥1॥
चौपाई · 2
यह निसिचर दुकाल सम अहई। कपिकुल देस परन अब चहई॥ कृपा बारिधर राम खरारी। पाहि पाहि प्रनतारति हारी॥2॥
चौपाई · 3
सकरुन बचन सुनत भगवाना। चले सुधारि सरासन बाना॥ राम सेन निज पाछें घाली। चले सकोप महा बलसाली॥3॥
चौपाई · 4
खैंचि धनुष सर सत संधाने। छूटे तीर सरीर समाने॥ लागत सर धावा रिस भरा। कुधर डगमगत डोलति धरा॥4॥
चौपाई · 5
लीन्ह एक तेंहि सैल उपाटी। रघुकुलतिलक भुजा सोइ काटी॥ धावा बाम बाहु गिरि धारी। प्रभु सोउ भुजा काटि महि पारी॥5॥
चौपाई · 6
काटें भुजा सोह खल कैसा। पच्छहीन मंदर गिरि जैसा॥ उग्र बिलोकनि प्रभुहि बिलोका। ग्रसन चहत मानहुँ त्रैलोका॥6॥
दोहा · 70
करि चिक्कार घोर अति धावा बदनु पसारि। गगन सिद्ध सुर त्रासित हा हा हेति पुकारि॥70॥
चौपाई · 1
सभय देव करुनानिधि जान्यो। श्रवन प्रजंत सरासुन तान्यो॥ बिसिख निकर निसिचर मुख भरेऊ। तदपि महाबल भूमि न परेऊ॥1॥
चौपाई · 2
सरन्हि भरा मुख सन्मुख धावा। काल त्रोन सजीव जनु आवा॥ तब प्रभु कोपि तीब्र सर लीन्हा। धर ते भिन्न तासु सिर कीन्हा॥2॥
चौपाई · 3
सो सिर परेउ दसानन आगें। बिकल भयउ जिमि फनि मनि त्यागें॥ धरनि धसइ धर धाव प्रचंडा। तब प्रभु काटि कीन्ह दुइ खंडा॥3॥
चौपाई · 4
परे भूमि जिमि नभ तें भूधर। हेठ दाबि कपि भालु निसाचर॥ तासु तेज प्रभु बदन समाना। सुर मुनि सबहिं अचंभव माना॥4॥
चौपाई · 5
सुर दुंदुभीं बजावहिं हरषहिं। अस्तुति करहिं सुमन बहु बरषहिं॥ करि बिनती सुर सकल सिधाए। तेही समय देवरिषि आए॥5॥
चौपाई · 6
गगनोपरि हरि गुन गन गाए। रुचिर बीररस प्रभु मन भाए॥ बेगि हतहु खल कहि मुनि गए। राम समर महि सोभत भए॥6॥
छन्द
संग्राम भूमि बिराज रघुपति अतुल बल कोसल धनी। श्रम बिंदु मुख राजीव लोचन अरुन तन सोनित कनी॥ भुज जुगल फेरत सर सरासन भालु कपि चहु दिसि बने। कह दास तुलसी कहि न सक छबि सेष जेहि आनन घने॥
दोहा · 71
निसिचर अधम मलाकर ताहि दीन्ह निज धाम। गिरिजा ते नर मंदमति जे न भजहिं श्रीराम॥71॥
चौपाई · 1
दिन के अंत फिरीं द्वौ अनी। समर भई सुभटन्ह श्रम घनी॥ राम कृपाँ कपि दल बल बाढ़ा। जिमि तृन पाइ लाग अति डाढ़ा॥1॥
चौपाई · 2
छीजहिं निसिचर दिनु अरु राती। निज मुख कहें सुकृत जेहि भाँती॥ बहु बिलाप दसकंधर करई। बंधु सीस पुनि पुनि उर धरई॥2॥
चौपाई · 3
रोवहिं नारि हृदय हति पानी। तासु तेज बल बिपुल बखानी॥ मेघनाद तेहि अवसर आयउ। कहि बहु कथा पिता समुझायउ॥3॥
चौपाई · 4
देखेहु कालि मोरि मनुसाई। अबहिं बहुत का करौं बड़ाई॥ इष्टदेव सैं बल रथ पायउँ। सो बल तात न तोहि देखायउँ॥4॥
चौपाई · 5
एहि बिधि जल्पत भयउ बिहाना। चहुँ दुआर लागे कपि नाना॥ इति कपि भालु काल सम बीरा। उत रजनीचर अति रनधीरा॥5॥
चौपाई · 6
लरहिं सुभट निज निज जय हेतू। बरनि न जाइ समर खगकेतू॥6॥
दोहा · 72
मेघनाद मायामय रथ चढ़ि गयउ अकास। गर्जेउ अट्टहास करि भइ कपि कटकहि त्रास॥72॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।