लंकाकाण्ड · 13
हनुमान्जी का लौटना, लक्ष्मणजी का उठ बैठना, रावण का कुम्भकर्ण को जगाना
लंकाकाण्ड का प्रकरण 13: हनुमान्जी का लौटना, लक्ष्मणजी का उठ बैठना, रावण का कुम्भकर्ण को जगाना। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
चौपाई · 5
जथा पंख बिनु खग अति दीना। मनि बिनु फनि करिबर कर हीना॥ अस मम जिवन बंधु बिनु तोही। जौं जड़ दैव जिआवै मोही॥5॥
चौपाई · 6
जैहउँ अवध कौन मुहु लाई। नारि हेतु प्रिय भाई गँवाई॥ बरु अपजस सहतेउँ जग माहीं। नारि हानि बिसेष छति नाहीं॥6॥
चौपाई · 7
अब अपलोकु सोकु सुत तोरा। सहिहि निठुर कठोर उर मोरा॥ निज जननी के एक कुमारा। तात तासु तुम्ह प्रान अधारा॥7॥
चौपाई · 8
सौंपेसि मोहि तुम्हहि गहि पानी। सब बिधि सुखद परम हित जानी॥ उतरु काह दैहउँ तेहि जाई। उठि किन मोहि सिखावहु भाई॥8॥
चौपाई · 9
बहु बिधि सोचत सोच बिमोचन। स्रवत सलिल राजिव दल लोचन॥ उमा एक अखंड रघुराई। नर गति भगत कृपाल देखाई॥9॥
सोरठा · 61
प्रभु प्रलाप सुनि कान बिकल भए बानर निकर। आइ गयउ हनुमान जिमि करुना महँ बीर रस॥61॥
चौपाई · 1
हरषि राम भेंटेउ हनुमाना। अति कृतग्य प्रभु परम सुजाना॥ तुरत बैद तब कीन्ह उपाई। उठि बैठे लछिमन हरषाई॥1॥
चौपाई · 2
हृदयँ लाइ प्रभु भेंटेउ भ्राता। हरषे सकल भालु कपि ब्राता॥ कपि पुनि बैद तहाँ पहुँचावा। जेहि बिधि तबहिं ताहि लइ आवा॥2॥
चौपाई · 3
यह बृत्तांत दसानन सुनेऊ। अति बिषाद पुनि पुनि सिर धुनेऊ॥ ब्याकुल कुंभकरन पहिं आवा। बिबिध जतन करि ताहि जगावा॥3॥
चौपाई · 4
जागा निसिचर देखिअ कैसा। मानहुँ कालु देह धरि बैसा॥ कुंभकरन बूझा कहु भाई। काहे तव मुख रहे सुखाई॥4॥
चौपाई · 5
कथा कही सब तेहिं अभिमानी। जेहि प्रकार सीता हरि आनी॥ तात कपिन्ह सब निसिचर मारे। महा महा जोधा संघारे॥5॥
चौपाई · 6
दुर्मुख सुररिपु मनुज अहारी। भट अतिकाय अकंपन भारी॥ अपर महोदर आदिक बीरा। परे समर महि सब रनधीरा॥6॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।