लंकाकाण्ड · 03
श्री रामजी का सेना सहित समुद्र पार उतरना और सुबेल पर्वत पर निवास, रावण की व्याकुलता और मन्दोदरी का समझाना
लंकाकाण्ड का प्रकरण 3: श्री रामजी का सेना सहित समुद्र पार उतरना और सुबेल पर्वत पर निवास, रावण की व्याकुलता और मन्दोदरी का समझाना। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
दोहा · 4
सेतुबंध भइ भीर अति कपि नभ पंथ उड़ाहिं। अपर जलचरन्हि ऊपर चढ़ि चढ़ि पारहि जाहिं॥4॥
चौपाई · 1
अस कौतुक बिलोकि द्वौ भाई। बिहँसि चले कृपाल रघुराई॥ सेन सहित उतरे रघुबीरा। कहि न जाइ कपि जूथप भीरा॥1॥
चौपाई · 2
सिंधु पार प्रभु डेरा कीन्हा। सकल कपिन्ह कहुँ आयसु दीन्हा॥ खाहु जाइ फल मूल सुहाए। सुनत भालू कपि जहँ तहँ धाए॥2॥
चौपाई · 3
सब तरु फरे राम हित लागी। रितु अरु कुरितु काल गति त्यागी॥ खाहिं मधुर फल बिटप हलावहिं। लंका सन्मुख सिखर चलावहिं॥3॥
चौपाई · 4
जहँ कहुँ फिरत निसाचर पावहिं। घेरि सकल बहु नाच नचावहिं॥ दसनन्हि काटि नासिका काना। कहि प्रभु सुजसु देहिं तब जाना॥4॥
चौपाई · 5
जिन्ह कर नासा कान निपाता। तिन्ह रावनहि कही सब बाता॥ सुनत श्रवन बारिधि बंधाना। दस मुख बोलि उठा अकुलाना॥5॥
दोहा · 5
बाँध्यो बननिधि नीरनिधि जलधि सिंधु बारीस। सत्य तोयनिधि कंपति उदधि पयोधि नदीस॥5॥
चौपाई · 1
निज बिकलता बिचारि बहोरी॥ बिहँसि गयउ गृह करि भय भोरी॥ मंदोदरीं सुन्यो प्रभु आयो। कौतुकहीं पाथोधि बँधायो॥1॥
चौपाई · 2
कर गहि पतिहि भवन निज आनी। बोली परम मनोहर बानी॥ चरन नाइ सिरु अंचलु रोपा। सुनहु बचन पिय परिहरि कोपा॥2॥
चौपाई · 3
नाथ बयरु कीजे ताही सों। बुधि बल सकिअ जीति जाही सों॥ तुम्हहि रघुपतिहि अंतर कैसा। खलु खद्योत दिनकरहि जैसा॥3॥
चौपाई · 4
अति बल मधु कैटभ जेहिं मारे। महाबीर दितिसुत संघारे॥ जेहिं बलि बाँधि सहस भुज मारा। सोइ अवतरेउ हरन महि भारा॥4॥
चौपाई · 5
तासु बिरोध न कीजिअ नाथा। काल करम जिव जाकें हाथा॥5॥
दोहा · 6
रामहि सौंपि जानकी नाइ कमल पद माथ। सुत कहुँ राज समर्पि बन जाइ भजिअ रघुनाथ॥6॥
चौपाई · 1
नाथ दीनदयाल रघुराई। बाघउ सनमुख गएँ न खाई॥ चाहिअ करन सो सब करि बीते। तुम्ह सुर असुर चराचर जीते॥1॥
चौपाई · 2
संत कहहिं असि नीति दसानन। चौथेंपन जाइहि नृप कानन॥ तासु भजनु कीजिअ तहँ भर्ता। जो कर्ता पालक संहर्ता॥2॥
चौपाई · 3
सोइ रघुबीर प्रनत अनुरागी। भजहु नाथ ममता सब त्यागी॥ मुनिबर जतनु करहिं जेहि लागी। भूप राजु तजि होहिं बिरागी॥3॥
चौपाई · 4
सोइ कोसलाधीस रघुराया। आयउ करन तोहि पर दाया॥ जौं पिय मानहु मोर सिखावन। सुजसु होइ तिहुँ पुर अति पावन॥4॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।