बालकाण्ड · 48

दशरथजी के पास जनकजी का दूत भेजना, अयोध्या से बारात का प्रस्थान

बालकाण्ड का प्रकरण 48: दशरथजी के पास जनकजी का दूत भेजना, अयोध्या से बारात का प्रस्थान। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।

व्हाट्सऐपटेलीग्राम

दोहा · 286

तदपि जाइ तुम्ह करहु अब जथा बंस ब्यवहारु। बूझि बिप्र कुलबृद्ध गुर बेद बिदित आचारु॥286॥

चौपाई · 1

दूत अवधपुर पठवहु जाई। आनहिं नृप दसरथहिं बोलाई॥ मुदित राउ कहि भलेहिं कृपाला। पठए दूत बोलि तेहि काला॥1॥

चौपाई · 2

बहुरि महाजन सकल बोलाए। आइ सबन्हि सादर सिर नाए॥ हाट बाट मंदिर सुरबासा। नगरु सँवारहु चारिहुँ पासा॥2॥

चौपाई · 3

हरषि चले निज निज गृह आए। पुनि परिचारक बोलि पठाए॥ रचहु बिचित्र बितान बनाई। सिर धरि बचन चले सचु पाई॥3॥

चौपाई · 4

पठए बोलि गुनी तिन्ह नाना। जे बितान बिधि कुसल सुजाना॥ बिधिहि बंदि तिन्ह कीन्ह अरंभा। बिरचे कनक कदलि के खंभा॥4॥

दोहा · 287

हरित मनिन्ह के पत्र फल पदुमराग के फूल। रचना देखि बिचित्र अति मनु बिरंचि कर भूल॥287॥

चौपाई · 1

बेनु हरित मनिमय सब कीन्हे। सरल सपरब परहिं नहिं चीन्हे॥ कनक कलित अहिबेलि बनाई। लखि नहिं परइ सपरन सुहाई॥1॥

चौपाई · 2

तेहि के रचि पचि बंध बनाए। बिच बिच मुकुता दाम सुहाए॥ मानिक मरकत कुलिस पिरोजा। चीरि कोरि पचि रचे सरोजा॥2॥

चौपाई · 3

किए भृंग बहुरंग बिहंगा। गुंजहिं कूजहिं पवन प्रसंगा॥ सुर प्रतिमा खंभन गढ़ि काढ़ीं। मंगल द्रब्य लिएँ सब ठाढ़ीं॥3॥

चौपाई · 4

चौकें भाँति अनेक पुराईं। सिंधुर मनिमय सहज सुहाईं॥4॥

दोहा · 288

सौरभ पल्लव सुभग सुठि किए नीलमनि कोरि। हेम बौर मरकत घवरि लसत पाटमय डोरि॥288॥

चौपाई · 1

रचे रुचिर बर बंदनिवारे। मनहुँ मनोभवँ फंद सँवारे॥ मंगल कलश अनेक बनाए। ध्वज पताक पट चमर सुहाए॥1॥

चौपाई · 2

दीप मनोहर मनिमय नाना। जाइ न बरनि बिचित्र बिताना॥ जेहिं मंडप दुलहिनि बैदेही। सो बरनै असि मति कबि केही॥2॥

चौपाई · 3

दूलहु रामु रूप गुन सागर। सो बितानु तिहुँ लोग उजागर॥ जनक भवन कै सोभा जैसी। गृह गृह प्रति पुर देखिअ तैसी॥3॥

चौपाई · 4

जेहिं तेरहुति तेहि समय निहारी। तेहि लघु लगहिं भुवन दस चारी॥ जो संपदा नीच गृह सोहा। सो बिलोकि सुरनायक मोहा॥4॥

दोहा · 289

बसइ नगर जेहिं लच्छि करि कपट नारि बर बेषु। तेहि पुर कै सोभा कहत सकुचहिं सारद सेषु॥289॥

चौपाई · 1

पहुँचे दूत राम पुर पावन। हरषे नगर बिलोकि सुहावन॥ भूप द्वार तिन्ह खबरि जनाई। दसरथ नृप सुनि लिए बोलाई॥1॥

चौपाई · 2

करि प्रनामु तिन्ह पाती दीन्ही। मुदित महीप आपु उठि लीन्ही॥ बारि बिलोचन बाँचत पाती। पुलक गात आई भरि छाती॥2॥

चौपाई · 3

रामु लखनु उर कर बर चीठी। रहि गए कहत न खाटी मीठी॥ पुनि धरि धीर पत्रिका बाँची। हरषी सभा बात सुनि साँची॥3॥

चौपाई · 4

खेलत रहे तहाँ सुधि पाई। आए भरतु सहित हित भाई॥ पूछत अति सनेहँ सकुचाई। तात कहाँ तें पाती आई॥4॥

दोहा · 290

कुसल प्रानप्रिय बंधु दोउ अहहिं कहहु केहिं देस। सुनि सनेह साने बचन बाची बहुरि नरेस॥290॥

चौपाई · 1

सुनि पाती पुलके दोउ भ्राता। अधिन सनेहु समात न गाता॥ प्रीति पुनीत भरत कै देखी। सकल सभाँ सुखु लहेउ बिसेषी॥1॥

चौपाई · 2

तब नृप दूत निकट बैठारे। मधुर मनोहर बचन उचारे॥ भैया कहहु कुसल दोउ बारे। तुम्ह नीकें निज नयन निहारे॥2॥

चौपाई · 3

स्यामल गौर धरें धनु भाथा। बय किसोर कौसिक मुनि साथा॥ पहिचानहु तुम्ह कहहु सुभाऊ। प्रेम बिबस पुनि पुनि कह राऊ॥3॥

चौपाई · 4

जा दिन तें मुनि गए लवाई। तब तें आजु साँचि सुधि पाई॥ कहहु बिदेह कवन बिधि जाने। सुनि प्रिय बचन दूत मुसुकाने॥4॥

दोहा · 291

सुनहु महीपति मुकुट मनि तुम्ह सम धन्य न कोउ। रामु लखनु जिन्ह के तनय बिस्व बिभूषन दोउ॥291॥

चौपाई · 1

पूछन जोगु न तनय तुम्हारे। पुरुषसिंघ तिहु पुर उजिआरे॥ जिन्ह के जस प्रताप कें आगे। ससि मलीन रबि सीतल लागे॥1॥

चौपाई · 2

तिन्ह कहँ कहिअ नाथ किमि चीन्हे। देखिअ रबि कि दीप कर लीन्हे॥ सीय स्वयंबर भूप अनेका। समिटे सुभट एक तें एका॥2॥

चौपाई · 3

संभु सरासनु काहुँ न टारा। हारे सकल बीर बरिआरा॥ तीनि लोक महँ जे भटमानी। सभ कै सकति संभु धनु भानी॥3॥

चौपाई · 4

सकइ उठाइ सरासुर मेरू। सोउ हियँ हारि गयउ करि फेरू॥ जेहिं कौतुक सिवसैलु उठावा। सोउ तेहि सभाँ पराभउ पावा॥4॥

दोहा · 292

तहाँ राम रघुबंसमनि सुनिअ महा महिपाल। भंजेउ चाप प्रयास बिनु जिमि गज पंकज नाल॥292॥

चौपाई · 1

सुनि सरोष भृगुनायकु आए। बहुत भाँति तिन्ह आँखि देखाए॥ देखि राम बलु निज धनु दीन्हा। करिबहु बिनय गवनु बन कीन्हा॥1॥

चौपाई · 2

राजन रामु अतुलबल जैसें। तेज निधान लखनु पुनि तैसें॥ कंपहिं भूप बिलोकत जाकें। जिमि गज हरि किसोर के ताकें॥2॥

चौपाई · 3

देव देखि तव बालक दोऊ। अब न आँखि तर आवत कोऊ ॥ दूत बचन रचना प्रिय लागी। प्रेम प्रताप बीर रस पागी॥3॥

चौपाई · 4

सभा समेत राउ अनुरागे। दूतन्ह देन निछावरि लागे॥ कहि अनीति ते मूदहिं काना। धरमु बिचारि सबहिं सुखु माना॥4॥

दोहा · 293

तब उठि भूप बसिष्ट कहुँ दीन्हि पत्रिका जाई। कथा सुनाई गुरहि सब सादर दूत बोलाइ॥293॥

चौपाई · 1

सुनि बोले गुर अति सुखु पाई। पुन्य पुरुष कहुँ महि सुख छाई॥ जिमि सरिता सागर महुँ जाहीं। जद्यपि ताहि कामना नाहीं॥1॥

चौपाई · 2

तिमि सुख संपति बिनहिं बोलाएँ। धरमसील पहिं जाहिं सुभाएँ॥ तुम्ह गुर बिप्र धेनु सुर सेबी। तसि पुनीत कौसल्या देबी॥2॥

चौपाई · 3

सुकृती तुम्ह समान जग माहीं। भयउ न है कोउ होनेउ नाहीं॥ तुम्ह ते अधिक पुन्य बड़ काकें। राजन राम सरिस सुत जाकें॥3॥

चौपाई · 4

बीर बिनीत धरम ब्रत धारी। गुन सागर बर बालक चारी॥ तुम्ह कहुँ सर्ब काल कल्याना। सजहु बरात बजाइ निसाना॥4॥

दोहा · 294

चलहु बेगि सुनि गुर बचन भलेहिं नाथ सिरु नाई। भूपति गवने भवन तब दूतन्ह बासु देवाइ॥294॥

चौपाई · 1

राजा सबु रनिवास बोलाई। जनक पत्रिका बाचि सुनाई॥ सुनि संदेसु सकल हरषानीं। अपर कथा सब भूप बखानीं॥1॥

चौपाई · 2

प्रेम प्रफुल्लित राजहिं रानी। मनहुँ सिखिनि सुनि बारिद बानी॥ मुदित असीस देहिं गुर नारीं। अति आनंद मगन महतारीं॥2॥

चौपाई · 3

लेहिं परस्पर अति प्रिय पाती। हृदयँ लगाई जुड़ावहिं छाती॥ राम लखन कै कीरति करनी। बारहिं बार भूपबर बरनी॥3॥

चौपाई · 4

मुनि प्रसादु कहि द्वार सिधाए। रानिन्ह तब महिदेव बोलाए॥ दिए दान आनंद समेता। चले बिप्रबर आसिष देता॥4॥

सोरठा · 295

जाचक लिए हँकारि दीन्हि निछावरि कोटि बिधि। चिरु जीवहुँ सुत चारि चक्रबर्ति दसरत्थ के॥295॥

चौपाई · 1

कहत चले पहिरें पट नाना। हरषि हने गहगहे निसाना॥ समाचार सब लोगन्ह पाए। लागे घर-घर होन बधाए॥1॥

चौपाई · 2

भुवन चारिदस भरा उछाहू। जनकसुता रघुबीर बिआहू॥ सुनि सुभ कथा लोग अनुरागे। मग गृह गलीं सँवारन लागे॥2॥

चौपाई · 3

जद्यपि अवध सदैव सुहावनि। रामपुरी मंगलमय पावनि॥ तदपि प्रीति कै प्रीति सुहाई। मंगल रचना रची बनाई॥3॥

चौपाई · 4

ध्वज पताक पट चामर चारू। छावा परम बिचित्र बजारू॥ कनक कलस तोरन मनि जाला। हरद दूब दधि अच्छत माला॥4॥

दोहा · 296

मंगलमय निज निज भवन लोगन्ह रचे बनाइ। बीथीं सींचीं चतुरसम चौकें चारु पुराइ॥296॥

चौपाई · 1

जहँ तहँ जूथ जूथ मिलि भामिनि। सजि नव सप्त सकल दुति दामिनि॥ बिधुबदनीं मृग सावक लोचनि। निज सरूप रति मानु बिमोचनि॥1॥

चौपाई · 2

गावहिं मंगल मंजुल बानीं। सुनि कल रव कलकंठि लजानीं॥ भूप भवन किमि जाइ बखाना। बिस्व बिमोहन रचेउ बिताना॥2॥

चौपाई · 3

मंगल द्रब्य मनोहर नाना। राजत बाजत बिपुल निसाना॥ कतहुँ बिरिद बंदी उच्चरहीं। कतहुँ बेद धुनि भूसुर करहीं॥3॥

चौपाई · 4

गावहिं सुंदरि मंगल गीता। लै लै नामु रामु अरु सीता॥ बहुत उछाहु भवनु अति थोरा। मानहुँ उमगि चला चहु ओरा॥4॥

दोहा · 297

सोभा दसरथ भवन कइ को कबि बरनै पार। जहाँ सकल सुर सीस मनि राम लीन्ह अवतार॥297॥

चौपाई · 1

भूप भरत पुनि लिए बोलाई। हय गयस्यंदन साजहु जाई॥ चलहु बेगि रघुबीर बराता। सुनत पुलक पूरे दोउ भ्राता॥1॥

चौपाई · 2

भरत सकल साहनी बोलाए। आयसु दीन्ह मुदित उठि धाए॥ रचि रुचि जीन तुरग तिन्ह साजे। बरन बरन बर बाजि बिराजे॥2॥

चौपाई · 3

सुभग सकल सुठि चंचल करनी। अय इव जरत धरत पग धरनी॥ नाना जाति न जाहिं बखाने। निदरि पवनु जनु चहत उड़ाने॥3॥

चौपाई · 4

तिन्ह सब छयल भए असवारा। भरत सरिस बय राजकुमारा॥ सब सुंदर सब भूषनधारी। कर सर चाप तून कटि भारी॥4॥

दोहा · 298

छरे छबीले छयल सब सूर सुजान नबीन। जुग पदचर असवार प्रति जे असिकला प्रबीन॥298॥

चौपाई · 1

बाँधें बिरद बीर रन गाढ़े। निकसि भए पुर बाहेर ठाढ़े॥ फेरहिं चतुर तुरग गति नाना। हरषहिं सुनि सुनि पनव निसाना॥1॥

चौपाई · 2

रथ सारथिन्ह बिचित्र बनाए। ध्वज पताक मनि भूषन लाए॥ चवँर चारु किंकिनि धुनि करहीं। भानु जान सोभा अपहरहीं॥2॥

चौपाई · 3

सावँकरन अगनित हय होते। ते तिन्ह रथन्ह सारथिन्ह जोते॥ सुंदर सकल अलंकृत सोहे। जिन्हहि बिलोकत मुनि मन मोहे॥3॥

चौपाई · 4

जे जल चलहिं थलहि की नाईं। टाप न बूड़ बेग अधिकाईं॥ अस्त्र सस्त्र सबु साजु बनाई। रथी सारथिन्ह लिए बोलाई॥4॥

दोहा · 299

चढ़ि चढ़ि रथ बाहेर नगर लागी जुरन बरात। होत सगुन सुंदर सबहि जो जेहि कारज जात॥299॥

चौपाई

कलित करिबरन्हि परीं अँबारीं। कहि न जाहिं जेहि भाँति सँवारीं॥ चले मत्त गज घंट बिराजी। मनहुँ सुभग सावन घन राजी॥1।

चौपाई · 2

बाहन अपर अनेक बिधाना। सिबिका सुभग सुखासन जाना॥ तिन्ह चढ़ि चले बिप्रबर बृंदा। जनु तनु धरें सकल श्रुति छंदा॥2॥

चौपाई · 3

मागध सूत बंधि गुनगायक। चले जान चढ़ि जो जेहि लायक॥ बेसर ऊँट बृषभ बहु जाती। चले बस्तु भरि अगनित भाँती॥3॥

चौपाई · 4

कोटिन्ह काँवरि चले कहारा। बिबिध बस्तु को बरनै पारा॥ चले सकल सेवक समुदाई। निज निज साजु समाजु बनाई॥4॥

दोहा · 300

सब कें उर निर्भर हरषु पूरित पुलक सरीर। कबहिं देखिबे नयन भरि रामु लखनु दोउ बीर॥300॥

चौपाई · 1

गरजहिं गज घंटा धुनि घोरा। रथ रव बाजि हिंस चहु ओरा॥ निदरि घनहि घुर्म्मरहिं निसाना। निज पराइ कछु सुनिअ न काना॥1॥

चौपाई · 2

महा भीर भूपति के द्वारें। रज होइ जाइ पषान पबारें॥ चढ़ी अटारिन्ह देखहिं नारीं। लिएँ आरती मंगल थारीं॥2॥

चौपाई · 3

गावहिं गीत मनोहर नाना। अति आनंदु न जाइ बखाना॥ तब सुमंत्र दुइ स्यंदन साजी। जोते रबि हय निंदक बाजी॥3॥

चौपाई · 4

दोउ रथ रुचिर भूप पहिं आने। नहिं सारद पहिं जाहिं बखाने॥ राज समाजु एक रथ साजा। दूसर तेज पुंज अति भ्राजा॥4॥

दोहा · 301

तेहिं रथ रुचिर बसिष्ठ कहुँ हरषि चढ़ाई नरेसु। आपु चढ़ेउ स्यंदन सुमिरि हर गुर गौरि गनेसु॥301॥

चौपाई · 1

सहित बसिष्ठ सोह नृप कैसें। सुर गुर संग पुरंदर जैसें॥ करि कुल रीति बेद बिधि राऊ। देखि सबहि सब भाँति बनाऊ॥1॥

चौपाई · 2

सुमिरि रामु गुर आयसु पाई। चले महीपति संख बजाई॥ हरषे बिबुध बिलोकि बराता। बरषहिं सुमन सुमंगल दाता॥2॥

चौपाई · 3

भयउ कोलाहल हय गय गाजे। ब्योम बरात बाजने बाजे॥ सुर नर नारि सुमंगल गाईं। सरस राग बाजहिं सहनाईं॥3॥

चौपाई · 4

घंट घंटि धुनि बरनि न जाहीं। सरव करहिं पाइक फहराहीं॥ करहिं बिदूषक कौतुक नाना। हास कुसल कल गान सुजाना॥4॥

दोहा · 302

तुरग नचावहिं कुअँर बर अकनि मृदंग निसान। नागर नट चितवहिं चकित डगहिं न ताल बँधान॥302॥

चौपाई · 1

बनइ न बरनत बनी बराता। होहिं सगुन सुंदर सुभदाता॥ चारा चाषु बाम दिसि लेई। मनहुँ सकल मंगल कहि देई॥1॥

चौपाई · 2

दाहिन काग सुखेत सुहावा। नकुल दरसु सब काहूँ पावा॥ सानुकूल बह त्रिबिध बयारी। सघट सबाल आव बर नारी॥2॥

चौपाई · 3

लोवा फिरि फिरि दरसु देखावा। सुरभी सनमुख सिसुहि पिआवा॥ मृगमाला फिरि दाहिनि आई। मंगल गन जनु दीन्हि देखाई॥3॥

चौपाई · 4

छेमकरी कह छेम बिसेषी। स्यामा बाम सुतरु पर देखी॥ सनमुख आयउ दधि अरु मीना। कर पुस्तक दुइ बिप्र प्रबीना॥4॥

दोहा · 303

मंगलमय कल्यानमय अभिमत फल दातार। जनु सब साचे होन हित भए सगुन एक बार॥303॥

चौपाई · 1

मंगल सगुन सुगम सब ताकें। सगुन ब्रह्म सुंदर सुत जाकें॥ राम सरिस बरु दुलहिनि सीता। समधी दसरथु जनकु पुनीता॥1॥

चौपाई · 2

सुनि अस ब्याहु सगुन सब नाचे। अब कीन्हे बिरंचि हम साँचे॥ एहि बिधि कीन्ह बरात पयाना। हय गय गाजहिं हने निसाना॥2॥

चौपाई · 3

आवत जानि भानुकुल केतू। सरितन्हि जनक बँधाए सेतू॥ बीच-बीच बर बास बनाए। सुरपुर सरिस संपदा छाए॥3॥

चौपाई · 4

असन सयन बर बसन सुहाए। पावहिं सब निज निज मन भाए॥ नित नूतन सुख लखि अनुकूले। सकल बरातिन्ह मंदिर भूले॥4॥

दोहा · 304

आवत जानि बरात बर सुनि गहगहे निसान। सजि गज रथ पदचर तुरग लेन चले अगवान॥304॥

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